भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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११६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे भवन्ति शीघ्रं नैतस्य देहे शिथिलतादयः । न चैवं सहसाऽऽक्रम्य जरा समधिरोहति ।।५९।। न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित्स्थौल्यापकर्षकम् । स सदा गुणमाधत्ते वलिनां स्निग्धभोजिनाम् ।।६०।। वसन्ते शीतसमये सुतरां स हितो मतः । अन्यदाऽपि च कर्त्तव्यो बलार्धेन यथा बलम् ।।६१।। व्यायाम (कसरत) के गुण-व्यायाम करने से शरीर की लघुता, कार्य करने में सामर्थ्य, शरीर के प्रत्येक अवयव दृढ़ एवं परस्पर सुविभक्त, बढ़े हुये दोषों का क्षय तथा जठराग्नि की वृद्धि होती है । व्यायाम करने से जिनके अङ्ग दृढ़ हो गये हैं उन्हें कभी कोई व्याधियाँ नहीं उत्पन्न होतीं और भोजन किया हुआ अन्न चाहे वह विरुद्ध अथवा विदग्ध (अर्धपरिपक्व) हो सभी प्रकार का शीघ्र पच जाता है । उसके शरीर में शीघ्रता से शिथिलता आदि नहीं उत्पन्न होती, उसे जरा (वृद्धावस्था) भी सहसा आकर नहीं दबाती । व्यायाम के समान स्थूलता को दूर करनेवाला दूसरा कोई उपाय नहीं है । व्यायाम सदैव बलवान् तथा घृतादि स्निग्ध पदार्थ भक्षण करनेवाले पुरुषों के लिये गुण दायक होता है । बसन्त तथा शीत काल में व्यायाम अत्यन्त हितकारी माना गया है । किन्तु अन्य काल में भी बलानुसार बलार्ध से व्यायाम अवश्य करना चाहिये ।।५७-६१।। अथ बलार्धस्य लक्षणमाह- हृदयस्थो यदा वायुर्वक्त्रं शीघ्रं प्रपद्यते । मुखं च शोषं लभते तद्बलार्धस्य लक्षणम् ।।६२।। किं वा ललाटे नासायां गात्रसन्धिषु कक्षयोः । यदा सञ्जायते स्वेदो बलार्धं तु तदादिशेत् ।।६३।। बलार्ध का लक्षण-हृदयस्थित प्राण वायु जब मुख की ओर शीघ्र-शीघ्र आने लगे तथा मुख सूखने लगे तब बलार्ध का लक्षण हुआ समझना चाहिये, अथवा जब ललाट, नासिका तथा शरीर को सन्धियों में एवं काँखों में पसीना होने लगे तब बलार्ध का लक्षण समझना चाहिये । अतः इन सब लक्षणों के प्रकट होने पर व्यायाम बन्द कर देवें ।।६२- ६३।। अथ व्यायामायोग्यजनानाह- भुक्तवान्कृतसम्भोगः कासी श्वासी कृशः क्षयी । रक्तपित्ती क्षती शोषी न तं कुर्यात्कदाचन ।। व्यायाम करने के अयोग्य जन-जो लोग भोजन तथा स्त्री के साथ संभोग किये हुए हों और कास, श्वास तथा क्षय रोग से युक्त एवं दुर्बल हों तथा रक्तपित्त, क्षत (घाव) तथा शोष रोग से युक्त हों वे कभी व्यायाम न करें ।।६४।। अथातिव्यायामदोषनाह- अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिः श्रमः क्लमः । तृष्णाक्षयः प्रतमको रक्तपित्तं च जायते ।।६५।। अत्यन्त व्यायाम करने से दोष-अत्यन्त व्यायाम करने से कास, ज्वर, श्रम, क्लान्ति, प्यास, क्षय, प्रतमकश्वास और रक्त-पित्त में रोग उत्पन्न होते हैं ।।६५।। अथाभ्यङ्गगुणानाह- अभ्यङ्गं कारयेन्नित्यं सर्वेष्वङ्गेषु पुष्टिदम् । शिरः श्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत् ।।६६।। तेल लगाने के गुण-सम्पूर्ण अङ्गों में अभ्यङ्ग (तेल की मालिश) नित्य कराना चाहिये, क्योंकि यह पुष्टिकारक है, उसमें भी विशेष कर शिर, कान और पैर में तो अवश्य नित्य तैल लगाना तथा डालना चाहिये ।।६६।। सार्षपं गन्धतैलं च यत्तैलं पुष्पवासितम् । अन्यद्रव्ययुतं तैलं न दुष्यति कदाचन ।।६७।। सरसों का तेल, गन्ध तैल, (सुगन्धित द्रव्यों से निकाला हुआ तैल) और जो तैल फूलों से बसाया हुआ हो जैसे बेला, चमेली आदि का तैल अथवा जो अन्य द्रव्य से युक्त तैल हो वह कभी दोष कारक नहीं होता है ।।६७।।