भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् ११७ ❖ गन्धतैलं=गन्धद्रव्याणामगुर्वादीनामग्नियोगेन निष्कासितः स्नेहः ।।६७।। 'गन्धतैल' से सुगन्ध युक्त जो अगर आदि द्रव्य हैं, उनका अग्नि के योग से निकाला हुआ तेल' यह अर्थ समझना चाहिये ।।६८।। अथ सर्वाङ्गेष्वभ्यङ्गगुणानाह- अभ्यङ्गो वातकफहच्छ्रमशान्तिबलं सुखम्। निद्रावर्णमृदुत्वायुष्कुरुते देहपुष्टिकृत् ।।६८।। सर्वाङ्ग में तैल लगाने के गुण—सम्पूर्ण अङ्गों में अभ्यङ्ग करना वात, कफ का हरण करने वाला, श्रम को दूर करने वाला तथा शरीर बल, सुख, निद्रा, वर्ण, कोमलता और आयु को करने वाला एवं अङ्गों को पुष्ट करनेवाला होता है ।।६८।। अथ शिरस्यभ्यङ्गगुणानाह- अभ्यङ्गः शीलितो मूर्ध्नि सकलेन्द्रियतर्पकः। दृष्टितुष्टिकरो हन्ति शिरोभूमिगतानगदान् ।। केशानां बहुतां दार्ढ्यं मृदुतां दीर्घतां तथा। कृष्णतां कुरुते कुर्याच्छिरसः पूर्णतामपि ।।७०।। शिर में तेल लगाने के गुण—शिर में नित्य तैल लगाने से सम्पूर्ण इन्द्रियों का सन्तर्पण करने वाला, दर्शनशक्ति को पुष्ट करनेवाला और शिर में होने वाले सभी रोगों को दूर करने वाला तथा केशों की अधिकता, दृढ़ता, कोमलता, दीर्घता (लम्बे होना), कृष्णता (काला होना) तथा मस्तिष्क की पूर्णता भी करता है ।।६९-७०।। अथ कर्णयोस्तैलपूरणगुणानाह- न कर्णरोगा न मलं न च मन्याहनुग्रहः। नोच्चैः श्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णपूरणात् ।।७१।। कानों में तेल डालने के गुण—कानों में नित्य तेल डालने से कान में कोई फुन्सी आदि रोग नहीं होते हैं, न मैल रहता है और न मन्याग्रह (मन्यानामकं शिराओं का जकड़ जाना) अथवा हनुग्रह (हनुका जकड़जाना) नामक रोग उत्पन्न होता है एवं ऊँचे सुनना अथवा बाधिर्य (बहरापन) ये सब रोग नहीं होते हैं ।।७१।। अथ कर्णयोस्तैलादिपूरणस्य योग्यसमयमाह- रताद्यैः पूरणं कर्ण भोजनात्प्राक्प्रशस्यते। तैलाद्यैः पूरणं कर्णे भास्करेऽस्तमुपागते ।।७२।। कान में तेल डालने का समय—कान में किसी द्रव्य का रस डालना भोजन करने के पहले और सूर्य के अस्त होने पर (रात में) ही उत्तम होता है ।।७२।। अथ पादाभ्यङ्गगुणानाह- पादाभ्यङ्गश्च तत्स्थैर्यनिद्रादृष्टिप्रसादकृत् । पादसुप्तिश्रमस्तम्भसङ्कोचस्फुटनप्रणुत् ।।७३।। व्यायामक्ष्णुणवपुषं पद्भ्यां सम्मर्दितं तथा। व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयमिवोरगाः ।।७४।। पैरों में तेल लगाने के गुण—पैरों में तेल लगाना पैरों की स्थिरता, निद्रा तथा नेत्र की प्रसन्नता (निर्मलता) करता है और पैर का सुन्न हो जाना, श्रान्ति (थकावट), जकड़ जाना, सङ्कुचित हो जाना, बेवाय फटना इन सबों को दूर करता है। पैरों से व्यायाम (बैठकी) करने से तथा शरीर के थक जाने पर पैरों में तेल की मालिश कराने से रोग इस भाँति पास नहीं आते जैसे गरुड़ के पास सर्प नहीं आते हैं ।।७३-७४।। अथ स्नेहयुक्तावगाहनगुणानाह- लोमकूपशिराजालधमनीभिः१ कलेवरे। तर्पयेद्बलमाधत्ते २स्नेहयुक्तोऽवगाहने ।।७५।। अद्भिः संसिक्तमूलानां तरूणां पल्लवादयः। बर्द्धन्ते हि तथा नृणां स्नेहसंसिक्तधातवः ।।७६।। १. 'लोमकूपं शिराजालं धमनीभि'रिति पा. । २. 'स्नेहे' इति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA