भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १९९. स्नान करते ही तुरन्त जठराग्नि दीप्त हो उठती है। शीतल जल से स्नान रक्तपित्त को शान्त करता है वही स्नान यदि गर्म जल से किया जाय तो बलदायक तथा वात और कफ का नाशक होता है। यदि शिर पर डाल कर अत्यन्त गर्म जल से सदा स्नान किया जाय तो नेत्रों के लिये अहितकर होता है किन्तु वात कफ के प्रकुपित होने पर उसी को ऋषियों ने हितकारी बतलाया है ॥८१-८४॥ अशीतेनाम्भसा स्नानं पयःपानं नवाःस्त्रियः । एतद्भो मानवाः पथ्यं स्निग्धमल्पं च भोजनम् ॥८५॥ उष्णजल से स्नान करना, दूध पीना, नवीन स्त्री के साथ संभोग करना, स्निग्ध (घृतादि पदार्थ मिश्रित) और स्वल्प भोजन करना लोगों के लिये हितकर है ॥८५॥ हरिश्चन्द्रस्यैतत् ॥८५॥ यह (८५) श्लोकोक्ति 'हरिश्चन्द्र' का है ॥८५॥ अथामलकैः स्नानस्य गुणानाह- यः सदाऽऽमलकैः स्नानं करोति स विनिश्चितम् । बलीपलितनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः ॥८६॥ आँवला मिश्रित जल के गुण—जो मनुष्य आँवला मिले हुये जल से अथवा आँवला लगा कर सदा स्नान करता है वह निश्चय बली और पलित से मुक्त होकर सौ वर्ष जीता है ॥८६॥ अथ स्नानानर्हजनानाह- स्नानं ज्वरेऽतिसारे च नेत्रकर्णानिलार्तिषु । आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम् ॥८७॥ स्नान करने के अयोग्य जन—जिनको ज्वर या अतिसार हो या नेत्र तथा कानों में पीड़ा होती हो अथवा वात सम्बन्धी पीड़ा होती हो किंवा आध्मान (अफारा), पीनस अथवा अजीर्ण रोग हुआ हो और जो भोजन कर चुका हो, ऐसे लोगों के लिये स्नान करना अनुचित है ॥८७॥ अथ स्नानोत्तरं वस्त्रेणाङ्गमार्जनस्य गुणानाह- स्नानस्यानन्तरं सम्यग्वस्त्रेणाङ्गस्य मार्जनम्। कान्तिप्रदं शरीरस्य कण्डूत्वग्दोषनाशनम् ॥८८॥ स्नान करने के बाद अँगोछे से देह पोंछने के गुण—स्नान के बाद वस्त्र (अँगोछे) से अच्छी तरह अङ्गों का पोंछना—शरीर में कान्ति उत्पन्न करनेवाला तथा खुजली, एवं त्वग् गत दोषों को दूर करने वाला होता है ॥८८॥ अथ वस्त्रधारणगुणानाह, तत्रादौ शीतकाले धारणार्हवस्त्राणि तद गुणवर्णनपूर्वकमाह- कौशेयोर्णिकवस्त्रं च रक्तवस्त्रं तथैव च। वातश्लेष्महरं तत्तु शीतकाले विधारयेत् ॥८९॥ वस्त्र धारण करने का विधान—शीत ऋतु में कौशेय वस्त्र (पीताम्बर और तसर) तथा ऊनी वस्त्र एवं लाल वस्त्र ये सब वात तथा कफ को दूर करनेवाले हैं अत एव शीत काल में इन सबों को धारण करना चाहिये ॥८९॥ कौशेयं=पट्टाम्बरं तसरवस्त्रं च ॥८९॥ 'कौशेय' पद से पट्टवस्त्र (पीताम्बर) और 'तसर वस्त्र' का ग्रहण होता है ॥८९॥ अथोष्णकाले धारणार्हवस्त्राणि तद्गुणाँश्चाह- मेध्यं सुशीतं पित्तघ्नं कषायं वस्त्रमुच्यते । तद्धारयेदुष्णकाले तत्रापि लघु शस्यते ॥९०॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA