भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीष्म ऋतु में वस्त्र धारण करने का विधान—कषाय वस्त्र-पवित्र, सुशीतल और पित्त का नाशक कहा हुआ है, अतएव इसे उष्ण काल में धारण करना चाहिये। उसमें भी जो लघु अर्थात् पतला कषाय वस्त्र हो वह ग्रीष्मकाल में अधिक प्रशस्त होता है ॥९०॥ ❖ कषायं=कौङ्कुमी इति लोके। कषायरागरक्तं वा ॥९०॥ 'कषाय' पद से 'कौङ्कुमी' (कुमकुम) नाम से प्रसिद्ध अथवा जोगिया रंग का ग्रहण करना चाहिये ॥९०॥ अथ वर्षाकाले धारणार्हवस्त्राणि तद्गुणाँश्चाह- शुक्लं तु शुभदं वस्त्रं शीतातपनिवारणम्। न चोष्णं न च वा शीतं तत्तुवर्षासु धारयेत् ।।९१।। वर्षाकाल में धारण करने योग्य वस्त्र—(सफेद) शुक्ल शुभ को देने वाला, शीत तथा आतप का निवारण करने वाला है। यह न तो उष्ण है और न शीतल ही है अत एव ऐसा ही वस्त्र वर्षा काल में धारण करना चाहिये ॥९१॥ **अथ नवनि