भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१२६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भोजने प्रथमभोज्यपदार्थमाह- भोजनाग्रे सदा पथ्यं लवणार्द्रकभक्षणम्। अग्निसन्दीपनं रुच्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम् ॥ १३०॥ भोजन के समय सबसे पहले भोज्य वस्तु-भोजन के समय सबसे पहले सदा नमक और अदरख भक्षण करना हितकारी है क्योंकि वह अग्निको दीपन करने वाला, रुचिकारक, जिह्वा और कण्ठ का शोधन करने वाला है ॥१३०॥ ❖ ननु लवणस्य पित्तजनकत्वाद् आर्द्रकस्य कटुकत्वेन पित्तलत्वाद् बुभुक्षितस्य वृद्धपित्तस्य कथं प्रथमं लवणार्द्रकभक्षणमुचितम् । उच्यते- 'लवणं सैन्धवं ज्ञेयं चन्दनं रक्तचन्दनम्' । इति वचनाल्लवणमत्र सैन्धवम्, तत् त्रिदोषघ्नम् । यत आह गुणग्रन्थे- सैन्धवं लवणं स्वादु दीपनं पाचनं लघु । स्निग्धं रुच्यं हिमं वृष्यं सूक्ष्मं नेत्र्यं त्रिदोषहृत् ॥१॥ यहाँ शंका यह होती है कि नमक पित्तजनक एवं अदरख कडुबा होने से पित्त कारक होता है तब भूख लगने के समय जब कि मनुष्य का पित्त स्वतः बढ़ा रहता है तब स्वतः बढ़े हुये पित्त वाले मनुष्य को भोजन के पहले पित्त- वर्धक नमक के साथ अदरख खाना किस प्रकार उचित है ? इसका उत्तर यह है कि-परिभाषा प्रकरण में 'लवण' का अर्थ सेंधानमक और 'चन्दन' का 'रक्त चन्दन' अर्थ किया गया है। अतः पूर्वोक्त श्लोक में भी लवण पद से सेंधा नमक ही ग्रहण होता है जो तीनों दोषों का नाशक है । ओषधियों के गुण बतलाने वाले ग्रन्थों में भी कहा है कि-सेंधा नमक- स्वादु, अग्निदीपक, अन्नपाचक, लघु, स्निग्ध, रुचिकारक, शीतल, वृष्ण (वीर्य वर्धक) सूक्ष्म, नेत्रों के लिये हितकर तथा तीनों दोषों का नाशक हैं ॥१॥ आर्द्रकं तु कटुकमपि न पित्तविरोधि मधुरपाकित्वान् । यत आह तत्रैव- आर्द्रिका भेदिनी गुर्वी तीक्ष्णोष्णा दीपनी च सा। कटुका मधुरा पाके सूक्ष्मा वातकफापहा ॥२॥ भोजन के प्रथम अदरख तो भक्षण करने लायक है ही क्योंकि अदरख के विषय में गुण ग्रन्थ में भी कहा है कि- 'अदरख-भेदक, गुरु, तीक्ष्ण, उष्ण-वीर्य, अग्नि दीपक, कटु रस युक्त, पाक समय में मधुर रस युक्त, सूक्ष्म, वात और कफ का नाशक है' ॥२॥ ❖ अथ चान्यदपि लवणमार्द्रकं च नात्र पित्तविरोधि संयोगस्वभावात् । संयोगस्वरूपं१ चैतादृशम् । भोजनस्य पूर्वं लवणार्द्रकभक्षणबोधकवचनमेव प्रमाणयति ॥१३०॥ इसके अतिरिक्त यह भी कहा है कि, यद्यपि लवण और अदरख पृथक्-पृथक् रूप से भले ही पित्त विरोधी हैं तथापि परस्पर दोनों के संयोग होने पर विलक्षण हो जाने से पित्तविरोधी नहीं होते हैं। क्योंकि इन दोनों के संयोग होने पर पित्त के साथ विरोध न करना ऐसा स्वभाव ही हो जाता है और भी इस बात को 'भोजन के पहले लवण और अदरख एक साथ खाना चाहिये' यह उपर्युक्त वचन भी प्रमाणित करता है ॥१३०॥ (अथ २भोजनादौ) दृष्टिदोषविनाशाय ब्रह्मादीनां स्मरणमाह, तद्यथा- अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोक्ता देवो महेश्वरः । इति सञ्चिन्त्य भुञ्जानं दृष्टिदोषो न बाधते ॥१३१॥ ३अञ्जनागर्भसम्भूतं कुमारं ब्रह्मचारिणम् । दृष्टिदोषविनाशाय हनुमन्तं स्मराम्यहम् ॥ १३२॥ १. 'स्वभावे' इति पा. । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ३. 'अञ्जनी'ति पा.।