भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२५ अन्यच्च- आहारनिर्हारविहारयोगाः सदैव सद्भिर्विजने विधेयाः ॥१२१॥ और भी कहा है कि—भोजन, मल, मूत्रादि का परित्याग तथा विहार (स्त्रीभोगादि) ये सब सद्विवेकी को सदा एकान्त ही में करना चाहिये ॥१२१॥ १अथभोजन काले शुभाशुभदृष्टिमाह- पितृमातृसुहृद्वैद्यपाककृद्धंसबर्हिणाम्। सारसस्य चकोरस्य भोजने दृष्टिरुत्तमा ॥१२२॥ दीनहीनक्षुधाऽऽर्त्तानां पापपाषण्डरोगिणाम्। कुक्कुटादेः शुनो दृष्टिर्भोजने नैव शोभना ॥१२३॥ भोजन के समय शुभाशुभ दृष्टि—भोजन करते समय पिता, माता, मित्र, वैद्य, पाककर्त्ता एवं हंस, मयूर, सारस तथा चकोर इन सबों की दृष्टि उत्तम होती है और दीन, हीन, भूख से व्याकुल, पापी, पाखण्डी, रोगी तथा कुक्कुर, कुक्कुट (मुर्गा) आदि की दृष्टि पड़ना अशुभ (निषिद्ध) कहा गया है ॥१२२-१२३॥ अथ भोजनपात्रमाह- दोषहृद् दृष्टिदं पथ्यं हैमं भोजनभाजनम्। रौप्यं भवति चक्षुष्यं पित्तहृत्कफवातकृत् ॥१२४॥ कांस्यं बुद्धिप्रदं रुच्यं रक्तपित्तप्रसादनम्। पैत्तलं वातकृद्रूक्षमुष्णं कृमिकफप्रणुत् ॥१२५॥ आयसे काचपात्रे च भोजनं सिद्धिकारकम्। शोथपाण्डुहरं बल्यं कामलाऽपहमुत्तमम् ॥१२६॥ शैलेये मृण्मये पात्रे भोजनं श्रीनिवारणम्। दारूद्भवे विशेषेण रुचिदं श्लेष्मकारि च ॥ पात्रं पत्रमयं रुच्यं दीनं विषपापनुत् ॥१२७॥ भोजन करने योग्य पात्र—सुवर्ण का भोजन पात्र दोषों का नाशक, दृष्टिप्रद, (दर्शन शक्ति को देनेवाला) और पथ्य (स्वास्थ्यप्रद) होता है। चाँदी का भोजन पात्र आँख के लिये हितकारी, पित्त का हरण करने वाला, कफ और वातरोग करने वाला होता है। काँसे का भोजन पात्र बुद्धिप्रद, रुचि कर तथा रक्त पित्त का शान्त करने वाला होता है। पित्तल का भोजन पात्र वात जनक, रूक्षता कारक, उष्ण—वीर्य एवं कृमि तथा कफ का नाश करने वाला होता है। लोहा तथा काच का बना भोजन पात्र—दृष्टि सिद्धि कारक और शोथ तथा पाण्डुरोग को हरण करनेवाला, बलकारी एवं कामला रोग को नष्ट करने वाला अतएव उत्तम होता है। पत्थर तथा मिट्टी का बना भोजन पात्र लक्ष्मी (धन) नाशक होता है। काठ का बना भोजनपात्र रुचि उत्पन्न करने वाला किन्तु उससे कफ की वृद्धि होती है और पत्तों से बना भोजन पात्र (पत्तल) हो तो वह भोजन में रुचि बढ़ाने वाला, अग्नि दीपक, विष तथा पाप को नष्ट करने वाला (उत्तम) होता है ॥१२४-१२७॥ अथ जलपात्रमाह- जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम् ॥१२८॥ पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्। काचेन रचितं तद्वत्तथा वैदूर्यसम्भवम् ॥१२९॥ जलपात्र का विधान—जल के लिये तामे का जल पात्र उत्तम है, उसके अभाव में मिट्टी का भी जलपात्र हितकारी है। स्फटिक का बना हुआ जलपात्र पवित्र तथा शीतल होता है। उसी प्रकार काच तथा वैदूर्य रत्न का हुआ जलपात्र भी पवित्र तथा शीतल होता है ॥१२८-१२९॥ १. कोष्ठस्थः क्वाचित्कः पा.।