भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१२४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ उभयोःकालयोः = प्रातःसायं च ।।१९५।। 'उभयोःकालयोः' से 'प्रातःकाल तथा सायंकाल में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१९५।। तथा च- सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं श्रुतिबोधितम्। नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः ।।१९६।। प्रातः और सायंकाल मनुष्यों के लिये भोजन करना वेद से अनुमोदित है। इन दो कालों के मध्यकाल में भोजन नहीं करना चाहिये, क्योंकि वेदानुमोदित अग्निहोत्र के समान भोजन करने की भी विधि है अर्थात् जिस प्रकार अग्निहोत्र प्रातः तथा सायंकाल ही में किया जाता है, उसी प्रकार भोजन भी प्रातः तथा सायंकाल ही में करना चाहिये ।।१९६।। प्रातः-प्रथमयामादुपरि द्वितीययामादवार्क् (तदेवोत्तरत्राह¹) तथा च- याममध्ये न भोक्तव्यं यामयुग्मं न लङ्घयेत्। याममध्ये रसोत्पत्तिर्यामयुग्माद्वलक्षयः ।।१९७।। प्रातःकालीन भोजन का समय—प्रातःकाल एक प्रहर के मध्य और दो प्रहर के बाद भोजन करना उचित नहीं, क्योंकि एक प्रहार के अन्दर भोजन न करने से रसोत्पत्ति होती है और दूसरे प्रहार के व्यतीत होने पर भोजन करने से बल की हानि होती है (तस्मात् एक प्रहर के बाद दो प्रहर के मध्य (९ से १२ के अन्दर) भोजन करना चाहिये) ।।१९७।। अन्यच्च- क्षुत्सम्भवति पक्वेषु रसदोषमलेषु च। काले वा यदि वाऽकाले सोऽन्नकाल उदाहृतः ।।१९८।। भूख लगने पर भोजन का अनियमित समय—वचन-रस, दोष और मल के परिपक्व होने पर ही भूख लगती है, अतः चाहे भोजन का समय हुआ हो या न हुआ हो किन्तु जभी भूख मालूम पड़े तभी भोजन का समय समझना चाहिये ।।१९८।। अथ जीर्णाहारस्य लक्षणमाह- उद्गारशुद्धिरुत्साहो वेगोत्सर्गो यथोचितः। लघुता क्षुत्पिपासा च जीर्णाहारस्य लक्षणम् ।।१९९।। आहार परिपाक के लक्षण—जब शुद्ध उद्गार (डकार), चित्त में उत्साह, यथोचित रीति से मल मूत्रादि का वेग तथा उनका यथोचित त्याग एवं शरीर में हल्कापन, भूख और प्यास भी मालूम पड़ने लगे तब भोजन किया हुआ पदार्थ पच गया है, ऐसा समझना चाहिये ।।१९९।। अंथाहारस्थानमाह- आहारं तु रहः² कुर्यान्निर्हारमपि सर्वदा। उभाभ्यां लक्ष्म्युपेतः स्यात्प्रकाशे³ हीयते श्रिया⁴ ।।१२००।। भोजन करने योग्य स्थान—भोजन तथा मल-मूत्र का त्याग सर्वदा एकान्त (निर्जन) स्थान में करना चाहिये, क्योंकि इस प्रकार करने से मनुष्य लक्ष्मी से युक्त होता है और इसके विपरीत (प्रकाश में, सब के सामने) करने पर लक्ष्मी से रहित दरिद्र होता है ।।१२००।। निर्हारो=मलमूत्रोत्सर्गः ।।१२००।। 'निर्हार' पद से 'मल मूत्र का त्याग करना' अर्थ समझना चाहिये ।।१२००।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः। २. 'विजने' इति पा.। ३. 'प्रकाशो' इति पा.। ४. 'श्रिया' इति पा.।