भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२३ स्वाभाविक मानुषी इच्छा—मनुष्यों के शरीर में नित्य—(१) भोजन करने की इच्छा, (२) जल पीने की इच्छा, (३) सोने की इच्छा और (४) मैथुन करने की इच्छा उत्पन्न होती रहती है ॥११०८॥ अथ भोजनेच्छाविघाते हानिमाह- भोजनेच्छाविघातात्स्यादङ्गमर्दोऽरुचिः श्रमः। तन्द्रा लोचनदौर्बल्यं धातुदाहो बलक्षयः ॥११०९॥ भोजन की इच्छा रोकने से हानि—भोजन की इच्छा रोकने से शरीर टूटना, भोजन में अरुचि, श्रम, तन्द्रा, नेत्रों में दुर्बलता, धातुओं का दाह (जठराग्नि के द्वारा रसादिकों का जलना) और बल का क्षय होता है ॥११०९॥ अथ जलपानेच्छाविघाते हानिमाह- विघातेन पिपासायाः शोषः कण्ठास्ययोर्भवेत् । श्रवणस्यावरोधश्च रक्तशोषो हृदि व्यथा ।। ११० ।। प्यास रोकने से हानि—प्यास रोकने से कण्ठ और मुख सूखने लगता है तथा कान से शब्द नहीं सुनाई पड़ता और रक्त सूखने लगता है एवं हृदय में पीड़ा होने लगती है ॥१११०॥ अथ स्वापेक्षाविघाते हानिमाह- निद्राविघाततो जृम्भा शिरोलोचनगौरवम् । अङ्गमर्दस्तथा तन्द्रा स्यादन्नपाक एव च ।।१११।। नींद रोकने से हानि—नींद रोकने से जँभाई, आँख तथा शिर में भार मालूम पड़ना, शरीर का टूटना, तन्द्रा तथा अन्न का परिपाक न होना ये सब होने लगते हैं ।।१११।। अथ बुभुक्षायां सत्यामपि भोजनाकरणे दोषमाह- बुभुक्षितो न योऽश्नाति तस्याहारेन्धनक्षयात् । मन्दीभवति कायाग्निर्यथा चाग्निरिन्धनः ॥१११२।। आहारं पचति शिखी दोषानाहारवर्जितः । पचेद्¹ दोषक्षये धातून्प्राणान्यातुक्षयेऽपि च ।। ११३ ।। भूख लगने पर भोजन न करने से हानि—भूख लगने पर जो भोजन नहीं करता उसकी जठराग्नि भोज्य पदार्थ रूपी ईंधन के न रहने से, उसी तरह मन्द हो जाती है जैसे-लोक में इन्धन (लकड़ी) के न रहने पर अग्नि मन्द हो जाती है। जठराग्नि आहार (खाये हुए भोज्य पदार्थ) को पचाती है परन्तु आहार न मिलने पर पहले वातादि दोषों को पचाती है तत्पश्चात् दोषों का क्षय होने पर रस रक्तादि धातुओं को पचाती है और धातुओं का क्षय होने पर प्राणों को पचाती है अर्थात् भूख लगने पर भोजन न करने से क्रमशः प्राण तक नष्ट हो जाते हैं ॥१११२-११३।। अथ भोजनकरणे गुणानाह- आहारःप्रीणनः सद्यो बलकृद् देहधारणः । स्मृत्यायुःशक्तिवर्णौजःसत्त्वशोभाविवर्धनः ।।११४।। भूख लगने पर भोजन करने का गुण—भूख लगने पर भोजन प्रसन्नता को देने वाला, तत्काल बल उत्पन्न करने वाला, शरीर को स्थिर रखने वाला, स्मरण शक्ति, आयु, सामर्थ्य, शरीर का वर्ण, ओज, सत्त्व (वीर्यातिशय) और शोभा को बढ़ाने वाला होता है ॥११४॥ यथोक्तगुणसम्पन्नं नरः सेवेत भोजनम् । विचार्य दोषकालादीन्कालयोरुभयोरपि ।। ११५ ।। भोजन का समय—मनुष्य को उचित है कि वह दोष, कालादि का विचार कर दोनों कालों में अन्न का भोजन करे ।।११५।। १. 'पचती'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA