भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१२२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सूर्यादि नवग्रहों को प्रसन्न करने वाले रत्न—सूर्यग्रह का माणिक्य (मानिक), चन्द्रग्रह का मोती, मङ्गलग्रह का मूँगा, बुधग्रह का मरकतमणि (पन्ना), गुरुग्रह का पोखराज, शुक्रग्रह का हीरा, शनिग्रह का नीलम एवं राहु और केतु का क्रम से गोमेद और वैदूर्यमणि है। इन रत्नों के धारण करने से पूर्वोक्त नवग्रह प्रसन्न होते हैं॥१०१॥ अथ वस्त्रशृङ्गाररत्नानां धारणगुणानाह- वासःशृङ्गाररत्नानां धारणं प्रीतिबर्धकम्। रक्षोघ्नमर्थ्यभोजस्यं१ सौभाग्यकरमुत्तमम्॥१०२॥ सुन्दर वस्त्रादि धारण करने के गुण—वस्त्र तथा शृङ्गार (शोभा) प्रयोजक चिह्न सुगन्ध, माला, चन्दनादि अथवा शोभाप्रयोजक रत्नों का धारण, प्रसन्नता बढ़ाने वाला, राक्षसबाधा को दूर करने वाला, धन देने वाला, प्रयोजन सिद्ध करने वाला, ओज उत्पन्न करने वाला और उत्तम सौभाग्य करने वाला होता है॥१०२॥ अथ सिद्धमन्त्रमहौषध्यादिधारणगुणानाह- सततं सिद्धमन्त्रस्य महौषध्यास्तथैव च। रोचनासर्षपादीनां २मङ्गल्यानां च धारणम्॥ वायुर्लक्ष्मीकरं रक्षोहरं मङ्गलदं शुभम्। हिंस्रादिभयविध्वंसि वशीकरणकारणम्॥१०४॥ सिद्ध मन्त्र, महौषधादि धारण करने के गुण—सिद्ध मन्त्र, महौषधि, मङ्गलप्रद गोरोचन और सफेद सरसों आदि द्रव्यों का धारण, आयु तथा लक्ष्मी को बढ़ाने वाला, राक्षस बाधा दूर करने वाला, मङ्गल-प्रद, शुभजनक, हिंस्र-जीव व्याघ्रादि के भय को दूर करने वाला और वशीकरण का कारण है॥१०३-१०४॥ अथ भोजनविधिमाह, तत्रादौ भोजनकाले मङ्गलवस्तुदर्शनगुणानाह- ततो भोजनवेलायां कुर्यान्म ३मङ्गल्यदर्शनम्। तस्य प्रदर्शनं नित्यमायुर्धर्मविवर्धनम्॥१०५॥ मङ्गल वस्तुओं के दर्शन के गुण—स्नानोपरान्त वस्त्र-धारणादि कार्य कर चुकने के बाद भोजन करने के समय मङ्गलप्रद वस्तुओं का दर्शन करना चाहिये क्योंकि उन सबों का नित्य दर्शन आयु तथा धर्म को बढ़ाने वाला होता है॥१०५॥ अथ मङ्गलवस्तून्याह- लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्राह्मणो गौर्हुताशनः। पुष्पस्रक्सर्पिरादित्य आयो राजा तथाऽष्टमः॥१०६॥ मङ्गलप्रद वस्तु—इस लोक में (१) ब्राह्मण, (२) गौ, (३) अग्नि, (४) पुष्पमाला, (५) घृत, (६) सूर्य, (७) जल तथा (८) राजा ये सब मङ्गलप्रद हैं॥१०६॥ अथ पादुकाधारणगुणानाह- पादुकाधारणं कुर्यात्पूर्व भोजनतः परम्। पादरोगहरं वृष्यं चक्षुष्यं चायुषो हितम्॥१०७॥ खड़ाऊँ धारण करने के गुण—भोजन के पहले और पीछे खड़ाऊँ पहिनना चाहिये क्योंकि यह पैर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, वृष्य (वीर्यवर्धक), नेत्र के लिये हितकर और आयु को बढ़ाने बाला है॥१०७॥ अथ क्षुत्तृडाद्यवरोधे हानिमाह- शरीरे जायते नित्यं वाञ्छा नृणां चतुर्विधा। बुभुक्षा च पिपासा च सुषुप्सा च रतिस्पृहा॥१०८॥ १. 'ओजस्यामि'ति पा.। २. 'माङ्गल्यानामि'ति पा.। ३. 'माङ्गल्ये'ति पा.।