भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषय-सूची १३ पृष्ठ | पृष्ठ कटीकतरुण मर्म ७० | कण्डराओं के स्वरूप और स्थान ८३ नितम्ब मर्म ७० | रन्ध्रों की संख्या और स्थान ८३ विकलता करने वाले मर्मस्थल ७० | स्रोतों के लक्षण ८४ लोहिताक्ष मर्म ७० | जालों के लक्षण और संख्या ८४ आणि मर्म ७० | कूर्चों के लक्षण और संख्या ८४ जानु मर्म ७१ | रज्जुओँ के लक्षण और संख्या ८५ ऊर्वी मर्म ७१ | सेवनियों के लक्षण और संख्या ८५ कूर्च मर्म ७१ | सङ्घातों की संख्या ८५ विटप मर्म ७१ | सीमन्तों के लक्षण और संख्या ८५ कूर्परमर्म ७१ | त्वचाओं के लक्षण और संख्या ८५ कुकुन्दर मर्म ७१ | रोम तथा रोमकूप ८७ कक्षधर मर्म ७१ | प्रत्येक मास में गर्भ की अवस्था ८७ विधुर मर्म ७१ | गर्भिणी की इच्छा विशेष ८९ कृकाटिका मर्म ७२ | गर्भ में अङ्गोत्पत्ति ९० अंस मर्म ७२ | पितृज-मातृज शरीराकृति ९१ अंसफलक मर्म ७२ | गर्भ के विशेष उपकारक ९१ अपाङ्ग मर्म ७२ | गर्भ के जीवित रहने के हेतु ९२ नीला और मन्या मर्म ७२ | दृष्टिमण्डल तथा रोमकूपों की वृद्धि निषेध ९३ फण मर्म ७२ | नख और केशों की वृद्धि में हेतु ९३ आवर्त्त मर्म ७३ | शरीर में चेतन तथा अचेतन अङ्ग ९३ गुल्फ मर्म ७३ | गर्भ में मलादि त्याग न करने में कारण ९३ मणिबन्ध मर्म ७३ | गर्भस्थ सन्तान के रोदन न करने के कारण ९४ कूर्चशिरा मर्म ७३ | गर्भवती स्त्रियों के कर्म ९४ विशल्यघ्न मर्म ७३ | गर्भिणी के न करने योग्य कर्म ९४ उत्क्षेप मर्म ७३ | प्रसव का समय ९५ स्थपनी मर्म ७४ | प्रसूतिकार्गृह का स्वरूप ९५ सन्धियों के लक्षण तथा संख्या ७४ | आसन्नप्रसवा के लक्षण ९५ कोष्ठगत सन्धियाँ ७५ | आसन्नप्रसवा स्त्री के उपचार ९५ ग्रीवा तथा उसके ऊपर की सन्धियाँ ७५ | आसन्नप्रसवा की परिचारिका ९६ आठ प्रकार की सन्धियाँ ७५ | जनयित्री स्त्रियों के करने योग्य कर्म ९६ शिराओं का वर्णन ७६ | प्रसवव्यथा से रहित गर्भिणी के कांखने से वैगुण्य ९६ शिराओं के भेद ७७ | ४. बालप्रकरणम् स्नायु के स्वरूप तथा संख्या ७९ | बालक के जन्म होने के बाद की विधि ९७ धमनियों की संख्या और स्थान ८० | प्रसूता स्त्री के नियम ९७ | प्रसूता स्त्री के नियम पालन का समय ९७