भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पृष्ठ पृष्ठ दूध का स्वरूप ९७ अधोवायु रोकने से हानि १११ स्तनों से दूध उतरने का समय ९८ मूत्र के वेग को रोकने से हानि १११ दूध निकलने के कारण ९८ दातौन करने की विधि ११२ दूध के कम निकलने के कारण ९८ जीभ सफा करने की विधि ११३ दूध के बढ़ने के कारण ९८ कुल्ला करने की विधि ११४ कलम नामक धान्यविशेष का लक्षण ९८ नस्य लेने की विधि ११४ दूध के दूषित होने के कारण ९९ अंजन लगाने की विधि ११४ दूषित दूध के लक्षण ९९ अंजन लगाने के अयोग्य व्यक्ति ११५ दूषित दुग्ध की शोधन विधि ९९ नाखून कटाने और बाल बनवाने की विधि ११५ शुद्ध दूध के लक्षण ९९ नाक के बाल उखाड़ने में दोष ११५ धात्री के लक्षण १०० बालों में कंघी लगाने के गुण ११५ दूध पिलाने के अयोग्य धात्री के लक्षण १०० दर्पण में मुख देखने के गुण ११५ बालकों को दूध पिलाने की विधि १०० व्यायाम के गुण ११६ अविधि स्तनपान कराने का दोष १०१ बलार्ध का लक्षण ११६ स्तन्य के अभाव में गो अथवा बकरी के दुग्ध १०१ व्यायाम करने के अयोग्य व्यक्ति ११६ अन्नप्राशन का समय १०१ अत्यन्त व्यायाम करने से दोष ११६ बालक की परिचर्या १०१ तेल लगाने के गुण ११६ बालकों के लिये हितकर १०२ सर्वाङ्ग में तेल लगाने के गुण ११७ बालकों के कवलादि करने का समय १०२ शिर में तेल लगाने के गुण ११७ बाल्यादि अवस्थाओं की सीमा १०२ कानों में तेल डालने के गुण ११७ प्रकृतियों के लक्षण १०४ कान में तेल डालने का समय ११७ वात-पित्त-कफ प्रकृति के लक्षण १०४ पैरों में तेल लगाने के गुण ११७ द्वन्द्वज तथा त्रिदोषज प्रकृति के लक्षण १०५ शरीर में तेल लगाकर स्नान के गुण ११८ वाग्भटोक्त वात-पित्त-कफ प्रकृति के लक्षण १०५ अभ्यङ्ग के अयोग्य जन ११८ ५. दिनचर्यादिप्रकरणम् उबटन लगाने के गुण ११८ देशों के भेद १०९ स्नान की विधि ११८ अनूपदेश के लक्षण १०९ आँवला मिश्रित जल के गुण ११९ जांगल देश के लक्षण १०९ स्नान करने के अयोग्य जन ११९ साधारण देश के लक्षण १०९ स्नानोत्तर देह पोंछने के गुण ११९ दिनादिचर्या ११० वस्त्रधारण करने का विधान ११९ स्वस्थ पुरुष का लक्षण ११० ग्रीष्म ऋतु में वस्त्र धारण विधान १२० दिनचर्या-विधि ११० वर्षारितु में वस्त्रधारण विधान १२० पुरीषोत्सर्ग के वेग को रोकने से हानि १११ नवीन वस्त्रधारण करने के गुण १२० मलिन वस्त्रधारण करने के दोष १२० CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA