भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२९ अथ स्वभावगुरुसंस्कारगुरुणोः स्वभावलघुनश्च भक्ष्यस्य भोजनपरिमाणमाह- गुरूणामर्धसौहित्यं लघूनां तृप्तिरिष्यते । द्रवो द्रवोत्तरश्चापि न मात्रागुरुरिष्यते ।।१४५।। स्वभाव और संस्कार से गुरु तथा स्वभाव से लघु भोज्य पदार्थों के परिमाण-जितनी मात्रा से भोजन करने पर आधी तृप्ति हो, उतनी ही मात्रा से गुरु द्रव्यों का और जितनी मात्रा से भोजन करने पर भली भाँति तृप्ति हो, उतनी ही मात्रा से लघुद्रव्यों का भोजन करना चाहिये । केवल द्रव तथा द्रवबहुल ये दोनों द्रव्य भोजन करने में मात्रा से अधिक होने पर भी 'मात्रा गुरु' नहीं माने जाते अर्थात् मुगादि की भाँति 'मात्रा गुरु' नहीं होते हैं ।।१४५।। ❖ अयमर्थः-माषपिष्टान्नादिभिरर्धसौहित्यं कर्त्तव्यं मुगादिभिः स्वभावादेव लघुभिर्मात्रया तृप्तिः, कर्त्तव्येत्यर्थः । द्रवः=पेयादिः, द्रवोत्तरः=तक्राद्यधिक ओदनादिः । मात्रातोऽधिकोऽपि मात्रागुरुर्न मन्तव्यः, पेयस्य सर्वतो लघुत्वात् ।। उपर्युक्त श्लोक का सारार्थ यह है कि-उड़द, पिष्टान्न (पिसा हुआ) आदि सब 'स्वभाव गुरु' द्रव्य हैं, उन सबों का आधी तृप्ति होने पर्यन्त भोजन करना चाहिये । मूँग आदि जितने 'स्वभाव से लघु' द्रव्य हैं उन सबों का भली भाँति तृप्ति होने पर्यन्त भोजन करना चाहिये । द्रव अर्थात् पेयादि तथा द्रवोत्तर अर्थात् जिसमें तक्र (माठा) आदि द्रव- द्रव्य अधिक रूप से युक्त हुये हों ऐसे भात आदि मात्रा से अधिक होने पर भी 'मात्रा गुरु' नहीं होते क्योंकि पेय द्रव्य सभी प्रकार के भक्ष्य द्रव्यों की अपेक्षा लघु होते हैं । ❖ उक्तं च सुश्रुतेन-पेयलेह्मादिभक्ष्याणां गुरुर्विद्याद्यथोत्तरम् ।।३।। पेयं=पेयादि । लेह्यं=रसालादि । आदिशब्दाद्भोज्यमोदनसूपादि । भक्ष्यं-मोदकादि ।।१४५।। 'सुश्रुत' ने भी कहा है कि- 'पेय और लेह्यादि भोज्य पदार्थों के मध्य में पेयादि उत्तरोत्तर एक की अपेक्षा दूसरे गुरु होते हैं । अतः सुतरां पेय, लेह्यादि भक्ष्य पदार्थों के मध्य में पेय ही सब से लघु हुआ' इस सुश्रुतोक्त वचन में 'पेय' से 'पेया' दूध आदि का तथा 'लेह्य' से 'सिखरन' आदि का ग्रहण होता है और 'पेयलेह्मादिभक्ष्याणाम्' इस में स्थित 'आदि' शब्द से 'भोज्य'-भात, दाल आदि का तथा भक्ष्य लड्डू आदि का भी ग्रहण करना चाहिये ।।३/१४५।। द्रवाढ्यमपि शुष्कं तु सम्यगेवोपपद्यते ।। शुष्क द्रव्य यदि अधिक द्रव पदार्थ से युक्त हो तो भलीभाँति उसका भोजन कर सकते हैं। ❖ अयमर्थः-शुष्कमपि स्रोतोरोधकमपि द्रवाढ्यं सम्यक्पाकं याति ।। भावार्थ यह है कि-शुष्क द्रव्य स्रोतोरोधक होने पर भी बहुत द्रव द्रव्यों से संयुक्त हो जाने पर भोजन करने से परिपक्व हो जाता है। अपक्वं तत्किम्भवतीत्यपेक्षामाह- पिण्डीकृतमसंक्लिन्नं विदाहमुपगच्छति । द्रव रूप पदार्थों से भली प्रकार नहीं भीजा हुआ शुष्क अन्न अपरिपक्व होकर पिंड के सदृश अर्ध परिपक्व अवस्था को प्राप्त हो जाता है ।। ❖ पिण्डीकृतमष्ठीलावद्भूतम् । असंक्लिन्नं=न सम्यगार्द्रम् । विदाहमुपगच्छति=विदग्धं भवतीत्यर्थः ।। यहाँ 'पिंडीकृत' से 'पिंड के सदृश अष्ठीला (गाँठ) की भाँति हुआ और 'असंक्लिन्न' से 'द्रव रूप पदार्थों से भली प्रकार नहीं गीला हुआ' तथा 'विदाहमुपगच्छति' से 'विदग्ध (अर्ध परिपक्व) अवस्था को प्राप्त हो जाता है' ऐसा समझना चाहिये ।।१४६।। १२ भाव.I