भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१३० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ केवलस्य शुष्कान्नस्य दोषमाह-विशुष्कमन्नमित्यादि । विशुष्कमन्नमभ्यस्तं न पाकं साधु गच्छति ॥१४६॥ केवल शुष्क अन्न सम्बन्धी दोष को 'विशुष्कमन्नम्' इत्यादि से कहते हैं- केवल जो शुष्क अन्न होता है वही भोजन करने पर भलीभाँति परिपक्व नहीं होता है ॥१४६॥ अथ शुष्कादीनां वैगुण्यमाह- शुष्कं निरुद्धं विष्टम्भि वह्निव्यापादकृद्भवेत्' ॥१४७॥ शुष्कादि द्रव्यों के भोजन से दोष- शुष्क, विरुद्ध और विष्टम्भि इन सब द्रव्यों के भोजन करने से अग्नि मन्द हो जाती है ॥१४७॥ शुष्कं चिपिटकादि, विरुद्धं क्षीरमत्स्यादि, विष्टम्भि-चणकमसूरादि, (वह्निव्यापादकृद्²) वह्निमान्द्यं कुर्यात् ॥१४७॥ यहाँ 'शुष्क' पद से 'चिउड़ा' आदि, 'विरुद्ध' पद से 'दूध मछली' आदि और 'विष्टम्भि' पद से 'चना मसूर' आदि पदार्थों का और 'वह्निव्यापादकृद्' इस पद से 'अग्नि को मन्द कर देता है' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥१४७॥ अथ सक्तुभक्षणविधिमाह- न भुक्त्वा न रदैश्छित्त्वा न निशायां न वा बहून् । न जलान्तरितान्द्विः सक्तूनद्यान्न केवलान् । सत्तू खाने की विधि-भोजन कर चुकने के बाद और दाँतों से चबा कर तथा रात्रि में एवं यदा कदा अधिक सत्तू नहीं खाना चाहिये एवं जल से अन्तरित करके अर्थात् एकबार जल दूसरी बार सत्तू फिर तीसरी बार जल इस क्रम से सत्तू नहीं खाना चाहिये । और केवल जलसे अर्थात् केवल सूखा सत्तू को मुख में रख कर फिर जल के साथ नहीं निगलना चाहिये ॥१४८॥ अथ सक्तुभक्षणे वर्जनीयानि सप्त कर्माण्यिाह- पुनर्दानं पृथक्पानं सामिषं वयसा निशि । दन्तच्छेदमुष्णं च सप्त सक्तुषु वर्जयेत् ।।१४९।। सत्तू खाने में वर्ज्य कर्म - सत्तू भोजन करने के समय सात कर्मों को छोड़ना चाहिये, जैसे- (१) सत्तू भोजन किये हुए को पुनः सत्तू देकर भोजन कराना, (२) सत्तू खाकर अलग जलपान करना, (३) मांस के साथ सत्तू खाना, (४) दूध के साथ-साथ सत्तू खाना (५) रात्रि में सत्तू खाना, (६) दाँतों से चबाकर सत्तू खाना और (७) गरम सत्तू खाना ॥१४९॥ सुश्रुतः-सक्तूनामाशु जीर्येत मृदुत्वादवलेहिका ।१५०।। सत्तू भोजन के विषय में 'सुश्रुत' का मत यह है कि सत्तू को अवलेह (चटनी की भाँति) बनाकर खाना चाहिये । क्योंकि सत्तू का अवलेह मृदु होने से जल्दी पच जाता है ।।१५०।। ३अथ विषमाशनस्य लक्षणमाह- यथाकालेऽतिमात्रं यत् तद्भवेद्विषमाशनम् । बहुस्तोकमकाले वा ज्ञेयं तद्विषमाशनम् ।। १५१ ।। १. 'वह्निव्यापदमावहेदिति पा. । २. कोष्ठस्थः पा. क्वाचित्कः । ३. कोष्ठस्थः पा. क्वाचित्कः ।