भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३१ विषमाशन के लक्षण—भोजन के समय अतिमात्रा से जो भोजन किया जाता है उसे अथवा कभी ज्यादा कभी कम और कभी असमय में जो भोजन किया जाता है उसे 'विषमाशन' कहते हैं ॥१५१॥ अथ बहुनोऽल्पस्य भक्षितस्य दोषमाह- आलस्यगौरवाटोपसादांश्च कुरुतेऽधिकम्। हीनमात्रं तनोःकार्श्यं करोति च बलक्षयम् ।।१५२।। बहुत तथा कम भोजन करने के दोष—बहुत भोजन करने से शरीर में आलस्य, गुरुता (भारी पन), आटोप (पेट में पीड़ा युक्त गुड़-गुड़ शब्द) और अवसाद (अवसन्न होना) ये सब दोष उत्पन्न होते हैं और कम भोजन करने से शरीर में कृशता तथा बलक्षय होता है ।।१५२।। अधिकम्=अन्नमिति यावत् ।।१५२।। 'अधिक' से 'अधिक अन्न भोजन करना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१५२॥ अथाकाले भुक्तस्य दोषमाह- अप्राप्तकाले भुञ्जानो ह्यसमर्थतनुर्नरः । तांस्तान् व्याधीनवाप्नोति मरणं चाधिगच्छति ।।१५३।। असमय में भोजन करने के दोष—असमय में भोजन करने से मनुष्य का शरीर असमर्थ हो जाता है और उसे अ समय अ में भोजन करने से उत्पन्न होने वाली व्याधियाँ होती हैं जिससे उसकी मृत्यु भी हो जाती है ।।१५३।। ❖ अप्राप्तकाले कालादतिप्राग् भुञ्जानोऽसमर्थशरीरो भवति। तथा सति तांस्तान् व्याधीन् शिरोव्यथाविषूचिकाऽलसकविलम्बिकाऽऽदीन् प्राप्नोति। तेषामाधिक्ये मरणमपि प्राप्नोतीत्यर्थः ।।१५३।। भावार्थ यह है कि—भोजन करने के समय से बहुत पहले प्रतिदिन भोजन करने से मनुष्य असमर्थ शरीर हो जाता है और इससे उसे सिरदर्द, हैजा, अलसक और विलम्बिका आदि व्याधियाँ हो जाती हैं तथा उन व्याधियों के बढ़ने से अन्त में उसकी मृत्यु हो जाती है ।।१५३।। अथ भोजनकालेऽतीते सति भोजन करणे दोषानाह- कालेतीतेश्नतो जन्तोर्वायुनोपहतेनले । कृच्छ्राद्विपच्यते भुक्तं न स्याद्भोक्तुं पुनः स्पृहा ।।१५४।। भोजन का समय व्यतीत होने पर भोजन करने से दोष—भोजन का समय व्यतीत होने पर भोजन करने वाले की जठराग्नि वायु से नष्ट (मन्द) हो जाती है। अत एव उसका भोजन किया हुआ अन्न कठिनाई से परिपक्व होता है तथा पुनः उसे खाने की इच्छा नहीं होती है ।।१५४।। अथ भोजनप्रमाणमाह- कुक्षेर्भागद्वयं भोज्यैस्तृतीये वारि पूरयेत्। वायोः सञ्चारणार्थाय चतुर्थमवशेषयेत् ।।१५५।। रसेनान्नस्य रसना प्रथमेनोपतर्पिता। न तथा स्वादमाप्नोति ततः शोध्याम्बुनान्तर ।।१५६।। भोजन का प्रमाण—उदर का दो भाग भोज्य पदार्थों से तथा तीसरा भाग जल से पूर्ण करना चाहिये और चौथा भाग वायु के सञ्चारण के लिये खाली छोड़ देना चाहिये। भोजन के समय प्रथम जो खाया जाता है उसके रस से जिह्वा तृप्त हो जाती है अतः जिह्वा जैसा पहले रस का स्वाद जानती वैसा बाद के रस का स्वाद नहीं जानती है। इसलिये एक रस के खाने के बाद दूसरे रस खाने के पहले बीच में जलपान द्वारा उसे (जीभ को) शुद्ध (साफ) कर लेना चाहिये ॥१५५-१५६॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA