भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथाम्बुपानानम्बुपानयोर्निषेधपूर्वकं मुहुर्मुहुः स्वल्पमात्रया वारिपानमाह- अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नमनम्बुपानाच्च च एव दोषः । तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पिवेदभूरि ।।१५७।। भोजन के बीच में थोड़ा थोड़ा जलपान की विधि-भोजन करते समय अधिक जलपान करने से तथा एक दम से जल न पीने से भी अन्न नहीं पचता है अतः जठराग्नि की दीप्ति के लिये भोजन के बीच में बारंबार थोड़ा-थोड़ा जल अवश्य पीना चाहिये ॥१५७॥ अथ भुक्तस्यादौ मध्येऽन्ते च जलपानस्य फलान्याह- भुक्तस्यादौ जलं पीतं कार्श्यमन्दाग्निदोषकृत् । मध्येऽग्निदीपनं श्रेष्ठमन्ते स्थौल्यकफप्रदम् ।।१५८।। भोजन के आरम्भ, मध्य अथवा अन्त में जल पीने का फल - भोजन के आरम्भ में जल पीने से कृशता तथा अग्नि की मन्दता दोष हो जाते हैं, मध्य में पीने से अग्नि का दीपन होने से उत्तम होता है और अन्त में पीने से शरीर की स्थूलता तथा कफ की वृद्धि होती है ॥१५८॥ अन्यच्च वाग्भटे- समस्थूलकृशा भुक्तमध्यान्तप्रथमाम्बुपाः ।।१५९।। इस विषय में 'वाग्भट का मत है कि - भोजन के मध्य, अन्त और आदि में जल पान करने वाले मनुष्यों का शरीर क्रम से सम, स्थूल तथा कृश होता है अर्थात् भोजन के मध्य में जलपान करने से शरीर सम (न स्थूल और न कृश), अन्त में करने से स्थूल तथा आदि में करने से कृश होता है ॥१५९॥ ❖ भुक्तं=भोजनम् ।।१५८-१५९।। पूर्वोक्त दोनों श्लोकों में 'भुक्त' से 'भोजन' अर्थ समझना चाहिये ॥१५८-१५९॥ अथ तृषितक्षुधितयोः क्रमेण भोजनजलपानयोः सहेतुकं निषेधमाह- तृषितस्तु न चाश्नीयात्क्षुधितो न पिबेज्जलम् । तृषितस्तु भवेद्गुल्मी क्षुधितस्तु जलोदरी ।। प्यासे के लिये भोजन और भूखे के लिये जलपान का निषेध - जो मनुष्य प्यासा हो, वह उसी समय भोजन न करे तथा जो भूखा हो वह उसी समय जलपान न करे क्योंकि भोजन करने से प्यासे को गुल्म तथा जलपान करने से भूखे को जलोदर रोग हो जाता है ।।१६०।। अथ भोजनस्यादौ मध्येऽन्ते च मधुरादिपदार्थानां भोजनविधिं वर्णयन् भोजनान्ते दुग्धपानविधिं सोपपत्तिकमाह- ननु शिष्टा भोजनान्ते दुग्धं पिबन्ति तत्कथमुचितम् ? यतस्त्रिधा विभक्तस्य भोजनकालस्य प्रथमो भागो वातस्य, द्वितीयः पित्तस्य, तृतीयः कफस्य । अत एवाह- अश्नीयात्तन्मना भूत्वा पूर्वं तु मधुरं रसम् । मध्येऽम्ललवणौ पश्चात्कटुतिक्तकषायकान् ।।१६१।। भोजन के अन्त में दुग्धपान विधि - शिष्ट लोग जो भोजन के अन्त में दूध पीते हैं यह कैसे उचित हो सकता है ? क्योंकि - तीन भागों में विभक्त भोजन का प्रथम भाग वायु का, द्वितीय पित्त का और तृतीय कफ का है, अतः इन्हीं भागों में वायु आदि का प्रकोप काल होता है, अत एव कहा भी है कि - भोजन के समय तन्मनस्क होकर प्रथम मधुर, तदनन्तर मध्य में अम्ल तथा लवण रस युक्त पदार्थों का और सब के अन्त में कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त पदार्थों का भोजन करना चाहिये ॥१६१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA