भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३३ ❖ अस्यायसभिप्रायः- भोजने पूर्व भुक्तो मधुरो रसो बुभुक्षितस्य वातपित्तयोः शमकोभवति । भोजनमध्ये भुक्तावम्ललवणौ पित्ताशये च वह्निवृद्धिं कुरुतः । भोजनान्तसमये भुक्ताः कटुतिक्तकषायरसाः कफं शमयन्तीति ।। १६१।। पूर्वोक्त श्लोक का अभिप्राय यह है कि—भोजन करते समय यदि प्रथम-प्रथम मधुर रस खाया जाय तो वह बुभुक्षित पुरुष का वायु तथा पित्त का शमन करता है और भोजन के मध्य में यदि अम्ल तथा लवण रस खाया जाय तो वे पित्ताशय में अग्निकी वृद्धि करते हैं एवं भोजन के अन्त में कटु, तिक्त तथा कषाय रस खाया जाय तो वे कफ को शमन करते हैं ।।१६१।। १अतो भोजनावसानसमयस्य कफकालत्वात् तत्र कथं श्लेष्मजनकं दुग्धं पातुमुचितं भवति ।। यत उक्तम्- दुग्धं स्वादुरसं स्निग्धमोजस्यं धातुवर्धनम् । वातपित्तहरं वृष्यं श्लेष्मलं गुरु शीतलम् । इति ।। १६२ ।। अतः भोजनान्त में कफ का समय होने से कफ को उत्पन्न करनेवाला दूध पीना कैसे उचित हो सकता है, क्योंकि कहा भी है कि—दूध स्वादु (मधुर) रस युक्त, स्निग्ध, भोज को उत्पन्न करने वाला, धातुवर्धक, वात और पित्त का हरण करने वाला, वृष्य (वीर्य वर्धक) कफकारी, गुरु और शीतल होता है ।। १६२।। उच्यते- विदाहीन्यन्नपानानि यानि भुंक्ते हि मानवः । तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं भोजनान्ते पयः पिबेत् ।। १६३ ।। मनुष्य जो कुछ दाह पैदा करने वाला अन्न पान रूपी भोज्य पदार्थ खाता है उनसे उत्पन्न होने वाले दाह की शान्ति के लिये भोजन के अन्त में दूध पीवे ।। १६३ ।। तथा च ब्रह्मपुराणे—कुर्यात्क्षीरान्तमाहारं न दध्यन्तं कदाचन । इति । लवणाम्लकटूष्णानि विदाहीन्यत्ति यानि तु । तद्दोषं हर्तुमाहारं मधुरेण समापयेत् ।। १६४।। 'ब्रह्मपुराण' में भी कहा है कि—दूध पीकर ही भोजन की समाप्ति करनी चाहिये न कि दही खाकर । क्योंकि दाहोत्पादक लवण, अम्ल, कटु तथा उष्ण पदार्थ जो मनुष्य खाता है, उस के दाहकता रूप दोष को दूर करने के लिये मधुर रस युक्त पदार्थों को खाकर ही भोजन की समाप्ति करे ।।१६४।। भोजनावसानसमये दुग्धादिमधुरभोजनेनैव वर्धितः कफो लवणाम्लकटुभोजनजनितपित्तस्य वृद्धिं विनाशयति पित्तवृद्धिविनाशनेन कफस्यापि वृद्धिस्तु क्षीणा भवति । क्षीणाकफवृद्धिरग्निमांद्यादीन् व्याधीनुत्पादयितुं न शक्नोति ।। १६४ ।। भोजन के अन्त में दूध आदि मधुर पदार्थों के भोजन करने से बढ़ा हुआ कफ लवण, अम्ल और कटु पदार्थों के भोजन करने से उत्पन्न हुई पित्त की वृद्धि को दूर करता है और पित्त की वृद्धि का नाश करने से कफ की वृद्धि भी क्षीण हो जाती है । अत एव क्षीण हुई कफ की वृद्धि भी अग्निमान्द्यता आदि रोगों को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होती ।। १६४ ।। ननु शत्रोर्नाशनेन शत्रुहन्तुर्वृद्धिर्दृश्यते न तु क्षीणता, तत् कथं कफः क्षीयत इति२ । उच्यते-बलवच्छत्रुविनाशनेन शत्रुहन्तुः क्षीणता च दृश्यते । १. 'अथे'ति पा. । २. 'क्षीण' इति पा. ।