भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथा च- नाशनात्प्रत्यनीकस्य स्वयं च क्षीयते यथा। वह्निसन्तप्तलोहस्य तप्ततां नाशयेज्जलम् ।।१६५।। अब प्रश्न यह उठता है कि लोक में शत्रु का नाश करने से शत्रु के नाश करने वाले की वृद्धि ही दिखलाई पड़ती है न कि क्षीणता, तब फिर किस प्रकार कफ की क्षीणता हुई अर्थात् वृद्धि प्राप्त हुआ कफ पित्त का नाश करके क्यों क्षीण हुआ ? इसका उत्तर यह है कि-लोक में भी बलवान् शत्रु के नाश करने से शत्रु को नाश करने वाले की क्षीणता दिखलाई पड़ती है जैसे कि जल अग्नि से तपे हुए लोहे की गर्माहट को नष्ट करके स्वयं को क्षय को प्राप्त हो जाता है अर्थात् अपनी शीतलता रूपी शक्ति से रहित तथा छन-छन करके जल जाने से कम वजन का हो जाता है वैसे ही प्रतिपक्षी पित्त का नाश करने से स्वयं कफ भी क्षीण हो जाता हैं ।।१६५।। ननु भोजनावसानसमये प्रयुक्ताः कटुतिक्तकषायरसाः१ कफं शमयिष्यन्ति वातस्य वृद्धिं विधास्यन्तीति चेत्, तन्न । कट्वादीनां क्षीणशक्तित्वात् । तथा च- यदेकं नाशयेद्दोषं तदन्यं वर्धयेत्कुतः । नाशने ह्येकदोषस्य यतस्तत्क्षीणशक्तिकम् । इति ।।१६६।। यहाँ यदि ऐसा कहें कि-भोजन के अन्त में खाया हुआ कटु, तिक्त और कषाय रस कफ का शमन करके वायु की वृद्धि अवश्य करेंगे तो वह ठीक नहीं, क्योंकि कटु, तिक्त और कषाय रस कफ के नाश करने पर क्षीणशक्ति हो जाने से वायु की वृद्धि करने में असमर्थ हो जाते हैं। अतः कहा भी है कि-जो एक दोष को नाश करता है वह दूसरे दोष को कैसे बढ़ा सकता है, क्योंकि एक दोष नाश करने में ही उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। अत एव कट्वादि रस वायु की वृद्धि नहीं कर सकते ।।१६६।। वस्तुतो य एव रसः प्राचुर्येण भुक्तस्तस्यैव सर्वे रसा वशा भवन्ति ।। यत आह सुश्रुतः- जग्धाः सर्वेऽपि गच्छन्ति बलिनो वश्यतां रसाः । यथा प्रकुपिता दोषा वशं यान्ति बलीयसः ।।१६७।। वस्तुतः सच्ची बात तो यह है कि जो रस अधिक मात्रा में खाया जाता है उसी रस के अधीन शेष सभी रस होते हैं, अतः सुश्रुत ने भी कहा है कि-जिस प्रकार प्रकुपित सम्पूर्ण दोष अधिक बलवान् दोष के अधीन हो जाते हैं, उसी प्रकार खाये हुए पदार्थों के सभी रस भी खाये हुये बलवान् रस के वश हो जाते हैं ।।१६७।। ❖ बलिनः=रसस्य । बलीयसः=दोषस्य ।।१६७।। 'बलिनः' से 'बलवान् रस का' तथा 'बलीयसः' से 'अधिक बलवान् दोष का' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ।।१६७।। अथाचमनविधिमाह- एवं भुक्त्वा समाक्षामे२ रूक्षग्रहणपूर्वकम् । भोजने दन्तलग्नानि निर्हृत्याचमनं चरेत् ।।१६८।। दन्तान्तरगतं चान्नं शोधनेनाहरेच्छनैः । कुर्यादनिर्हृतं तद्धि मुखस्यानिष्टगन्धताम् ।।१६९।। दन्तलग्नमनिहार्यं लेपं मन्येत दन्तवत् । न तत्र बहुशः कुर्याद्यत्नं निर्हरणं प्रति ।।१७०।। भोजनोपरान्त आचमन विधि-पूर्वोक्त नियम से भोजन करने के बाद पापड़ आदि का भोजन करके उससे मुख शुद्ध कर अथवा (मतान्तर से) भोजनोपरान्त नमक, मयदा आदि रूक्ष पदार्थों से हाथ मल कर कुल्ला करके आचमन करे, और दाँत में लगे हुये अन्नादि को खरका (तिनका) से निकाल कर पुनः आचमन करे और दाँतों के भीतर जो अन्न लगे हुये हों, उन्हें धीरे धीरे शोधन (खरिका से) सफा करे क्योंकि दाँत सफा न करने से मुख की दुर्गन्धता बनी रहती १. 'कटुतिक्तकषाया रसाः' इति पा. । २. 'च्यूषे'ति पा. ।