भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३५ है। दाँतों में लगी हुई जो वस्तुयें निकालने पर भी न निकले अर्थात् अनिर्हार्य हों उन्हें बाहर निकालने के लिये विशेष यत्न नहीं करना चाहिये किन्तु उन्हें दाँत की भाँति ही लगा हुआ समझकर छोड़ दें ॥१६८-१७०॥ आचम्य जलयुक्ताभ्यां पाणिभ्यां चक्षुषी स्पृशेत् ॥१७१॥ (१भुक्तवा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्यदि दीयते। अचिरेणैव तद्वारि तिमिराणि व्यपोहति ।।) भोजनोपरान्त आचमन करके जल लगे हुये दोनों हाथों से दोनों नेत्रों का स्पर्श करना चाहिये। भोजन के बाद यदि हथेलियों को परस्पर रगड़ कर दोनों नेत्रों में लगावे तो हाथ में लगे हुये उसी जल के लगने से नेत्रगत तिमिरादि रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ॥१७१॥ अथ भोजनान्तरक्रियामाह- भुक्त्वा च संस्मरेन्नित्यमगस्त्यादीन्सुखावहान् ।।१७२।। विष्णुरात्मा तथैवान्नं परिणामश्च वै यथा। सत्येन तेन मद्‌भुक्तं जीर्यत्वन्नमिदं तथा ।।१७३।। अगस्तिरग्निर्वडवानलश्च भुक्तं ममान्नं जरयन्त्वशेषम् ।। सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं यच्छन्त्वरोगं मम 'चास्तु' देहम् ।। १७४।। अङ्गारकमगस्तिं च पावकं सूर्यमश्विनौ। पञ्चैतान्संस्मरेन्नित्यं भुक्तं तस्याशु जीर्यति ।।१७५।। भोजनोपरान्त कर्म- भोजनोपरान्त अगस्त्यादि मुनियों के (१७३-७४) श्लोकों से स्मरण करना चाहिये। इन श्लोकों के अर्थ ये हैं: - जैसे अनायास हमारी आत्मा विष्णु है। उसी सत्यस्वरूप विष्णु के द्वारा हमारा खाया हुआ यह अन्न पच जाय। अगस्ति, अग्नि और वड़वानल ये सब मेरे खाये हुये अन्न को पूर्णरूप से पचावें तथा अन्न पचने से होने वाले सुखों को देवें और उन सबों की कृपा से हमारी देह रोगमुक्त हो। इस प्रकार मंगल, अगस्ति, अग्नि, सूर्य और अश्विनीकुमार इन पाँचों का जो कोई नित्य स्मरण करता है उसका खाया हुआ अन्न शीघ्र पच जाता है ॥१७२-१७५॥ इत्युच्चार्य स्वहस्तेन परिमार्ज्य तथोदरम्। अनायासप्रदायीनि कुर्यात्कर्माप्यतन्द्रितः ॥१७६।। इस प्रकार अगस्त्यादिकों का नामोच्चारण करके हाथों को उदर पर फेर कर अनायास (परिश्रम न मालूम पड़े ऐसे) कर्मों को अतन्द्रित होकर करे ॥१७६॥ ❖ अतन्द्रितः = निरन्तरं जाग्रत् तिष्ठेद् न तु स्वप्यात् । 'भुक्तमात्रस्य तु स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः' । इति वचनात् ।।१७६।। 'अतन्द्रितः' अर्थात् दिन में भोजन करके निरन्तर जागता हुआ स्थित रहे किन्तु सोवे नहीं। 'जो कोई भोजन करने के पश्चात् ही सो जाता है उसका कफ कुपित होकर उसके जठराग्नि को नष्ट कर देता है'। (अतः भोजनोत्तर तन्द्रा से शून्य होकर रहे) ॥१७६॥ अथ भोजनोपरि वातादीनां वृद्धिक्रममाह- जीर्णेऽन्ने वर्धते वायुर्विदग्धे पित्तमेधते। भुक्तमात्रे कफश्चापि क्रमोऽयं भोजनोपरि ।। १७७।। भोजनोपरान्त वातादि की वृद्धि - अन्न के परिपक्व होने पर वायु और विदग्ध होने पर पित्त बढ़ता है, भोजन कर चुकने के बाद आरम्भ में ऐसा क्रम है ॥१७७॥ विदग्धे = किञ्चित्पक्वे किञ्चिदपक्वे ।। १७७।। 'विदग्ध' का 'कुछ पका और कुछ नहीं पका हुआ' अर्थ समझना चाहिये ॥१७७॥ १. कोष्ठस्थापाठः क्वाचित्कः ।