भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भुक्तमात्रे सञ्जातस्य कफस्य प्रतीकारमाह- धूमेनापोह्य हृद्यैर्वा कषायकटुतिक्तकैः । पूगैः कर्पूरकस्तूरीलवंगसुमनः फलैः ।। १७८ ।। फलैः कटुकषायैर्वा मुखवैशद्यकारिभिः । ताम्बूलपत्रसहितैः सुगन्धैर्वा विचक्षणः ।। १७९ ।। भोजनोपरान्त कफ वृद्धिका प्रतीकार—भोजनोपरान्त धूम के द्वारा अथवा हृदय को प्रिय लगने वाले कषाय, कटु और तिक्त रस युक्त सुपारी, कपूर, कस्तूरी लवंग और जायफल खाने से अथवा मुख को शुद्ध करने वाले कटु तथा कषाय रसयुक्त इलायची, हर्रें आदि खाने से किंवा पान सहित सुगन्धित पदार्थों के खाने से सञ्चित कफ को दूर करे ।। १७८-१७९ ।। ❖ धूमेन=अगुर्वादिधूमेन, अपोह्य=कफं दूरीकृत्य, कषायकटुतिक्तकैः फलैः = कर्पूरकस्तूरीलवंगादिभिः, पूगैः=क्रमुकैः । सुमनःफलैः=जातीफलैः, (कटु¹ कषायैः)=एलाहरीतक्यादिफलैः ।। 'धूमेन'='अगर आदि के धूम से' 'अपोह्य'=संचित कफ को दूर करे, कषायकटुतिक्तकैः=कषाय, कटु और तिक्त रस युक्त कपूर, कस्तूरी, लौंग आदि फलों से, पूगैः=सुपारी से, सुमनः फलैः=जायफल से और 'कटुकषायैः' 'कटु और कषाय रससे युक्त इलायची, हर्रें आदि फलों से ऐसा अर्थ करना चाहिये ।। १७८-१७९ ।। अथ ताम्बूलभक्षणसमयमाह- रतौ सुप्तोत्थिते स्नाते भुक्तेवान्ते च संगरे । सभायां विदुषां राज्ञां कुर्यात्ताम्बूलचर्वणम् ।। १८० ।। पान खाने का समय—रति करने के समय, सो के उठने पर, वमन करने पर, युद्ध में तथा पण्डित और राजाओं की सभा में पान खाना चाहिये ।। १८० ।। ताम्बूलमुक्तं तीक्ष्णोष्णं रोचनं तुवरं सरम् । तिक्तं क्षारोषणं कामरक्तपित्तकरं लघु ।। १८१ ।। वश्यं श्लेष्मास्यदौर्गन्ध्यमलवातश्रमापहम् । मुखवैशद्यसौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम् ।। १८२ ।। हनुदन्तमलध्वंसि जिह्वेन्द्रियविशोधनम् । मुखप्रसेकशमनं गलामयविनाशनम् ।। १८३ ।। पान के गुण—पान तीक्ष्ण और उष्णवीर्य वाला, रुचिकारक, सारक (दस्तावर), तुवर (कसैला), तिक्त, क्षार और कटु रस से युक्त, कामोद्दीपक, रक्तपित्तवर्धक, हलका, लोगों को वश में करने वाला, कफ मुख की दुर्गन्धि, मल, वायु तथा श्रम इन सबों को दूर करने वाला, मुख की स्वच्छता तथा सुगन्धित करने वाला, शरीर की कान्ति तथा सुन्दरता को बढ़ानेवाला, हनु तथा दाँतों के मल को दूर करनेवाला, जिह्वेन्द्रिय की शुद्धि करनेवाला, मुख से लार्रों को गिरने से रोकने वाला और गले के समस्त रोगों को नष्ट करनेवाला है ।। १८१-१८३ ।। अथ नवीनताम्बूलगुणानाह- नवं तदेव मधुरं कषायानुरसं गुरु । बलासजननं प्रायः पत्रशाकगुणं स्मृतम् ।। १८४ ।। नवीन पान के गुण—नया पान कसैला रस लिये हुए मधुर रसयुक्त पचने में भारी और कफ-जनक होता है । नया पान प्रायः करके पत्ते के शाक के समान गुणों से युक्त होता है ।। १८४ ।। अथ बङ्गदेशोद्भवताम्बूलगुणानाह- बङ्गदेशोद्भवं पर्णं परं कटुरसं सरम् । पाचनं पित्तजनकमूष्णं कफहरं स्मृतम् ।। १८५ ।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।