भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३७ बङ्गाल में उत्पन्न होने वाले पान के गुण—बंगला पान अत्यन्त कटु रस से युक्त, सर (दस्ताबर), पाचक, पित्तजनक, उष्ण तथा कफ को दूर करने वाला होता है ॥१८४॥ अथ पुराणताम्बूलगुणानाह- पर्णं पुराणमकटु क्षुल्लकं तनु पाण्डुरम्। विशेषाद्गुणवद्द्वेद्यमन्वद्धीनगुणं स्मृतम्॥१८६॥ पुराने पान के गुण—पुराना पान अकटु (थोड़े कटु रस युक्त), छोटा, पतला, पाण्डु वर्ण (थोड़ी पिलाई लिये हुये श्वेतवर्ण) होता है तथा पुराना पान विशेष गुणों से युक्त होता है और दूसरा अर्थात् नया पान इसकी अपेक्षा कम गुणवाला होता है ॥१८६॥ अथ पूगीफलगुणानाह- पूगं गुरु हिमं रूक्षं कषायं कफपित्तनुत्। मोहनं दीपनं रुच्यमास्यवैरस्यनाशनम्॥१८७॥ पूगं स्यात् दृढमध्यं यत्स्विन्नं वाऽपि त्रिदोषनुत्। सरसङ्गुर्वभिष्यन्दितद् भृशं वह्निनाशनम्॥१८८॥ सुपारी के गुण—सुपारी गुरु (पचने में भारी) शीत-वीर्य, रूक्ष, कषाय, रसयुक्त, कफ और पित्त का नाशक, मोहजनक, अग्निदीपक, रुचिवर्धक और मुख की विरसता को दूर करने वाली होती है। जिस सुपारी का मध्य भाग कठिन हो अथवा जो उबाल कर बनाई गई (चिकनी सुपारी) हो वह त्रिदोष दूर करने वाली होती है। रस से युक्त नवीन सुपारी, भारी, अभिष्यन्दि (कफकारक) एवं अत्यन्त अग्निनाशक होती है ॥१८७-१८८॥ अथ खदिरसुधाताम्बूलगुणानाह- खदिरः कफपित्तघ्नश्चूर्ण वातबलांसनुत्। संयोगस्त्रिदोषघ्नं सौमनस्यं करोति च॥१८९॥ मुखवैशद्यसौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम्। प्रभाते पूगमधिकं मध्याह्ने खदिरं तथा॥ निशासु चूर्णमधिकं ताम्बूलं भक्षयेत्सदा॥१९०॥ खैर, चूना युक्त पान के गुण—खैर-कफ-पित्त का और चूना-वायु-कफ का नाशक है अत एव दोनों पान के साथ संयुक्त होकर त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं तथा चित्त की प्रसन्नता, मुख की स्वच्छता तथा सुगन्धि एवं शरीर में कान्ति और सुन्दरता को उत्पन्न करने वाले होते हैं। प्रातः काल अधिक सुपारी, दोपहर को अधिक खैर एवं रात्रि में अधिक चूना मिला हुआ पान खाना चाहिये ॥१८९-१९०॥ अथ ताम्बूलपर्णाग्रमध्यादिभागापरित्यागे दोषानाह- आयुराग्रे यशो मूले लक्ष्मीर्मध्ये व्यवस्थिता। तस्मादग्रं तथा मूलं मध्यं पर्णस्य वर्जयेत्॥१९१॥ पर्णमूले भवेद्व्याधिः पर्णाग्रे पापसम्भवः। पर्णमध्यं हरत्यायुः शिरा बुद्धिविनाशिनी ॥१९२॥ पान के अग्र तथा मध्य भागों के परित्याग न करने से दोष—पान के पत्ते के अग्रभाग में आयु, मूल, (डण्ठल) में यश, एवं मध्य में लक्ष्मी रहती हैं। अत एव पान का अग्र, मूल तथा मध्य भाग को