भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३७ बङ्गाल में उत्पन्न होने वाले पान के गुण—बंगला पान अत्यन्त कटु रस से युक्त, सर (दस्ताबर), पाचक, पित्तजनक, उष्ण तथा कफ को दूर करने वाला होता है ॥१८४॥ अथ पुराणताम्बूलगुणानाह- पर्णं पुराणमकटु क्षुल्लकं तनु पाण्डुरम्। विशेषाद्गुणवद्द्वेद्यमन्वद्धीनगुणं स्मृतम्॥१८६॥ पुराने पान के गुण—पुराना पान अकटु (थोड़े कटु रस युक्त), छोटा, पतला, पाण्डु वर्ण (थोड़ी पिलाई लिये हुये श्वेतवर्ण) होता है तथा पुराना पान विशेष गुणों से युक्त होता है और दूसरा अर्थात् नया पान इसकी अपेक्षा कम गुणवाला होता है ॥१८६॥ अथ पूगीफलगुणानाह- पूगं गुरु हिमं रूक्षं कषायं कफपित्तनुत्। मोहनं दीपनं रुच्यमास्यवैरस्यनाशनम्॥१८७॥ पूगं स्यात् दृढमध्यं यत्स्विन्नं वाऽपि त्रिदोषनुत्। सरसङ्गुर्वभिष्यन्दितद् भृशं वह्निनाशनम्॥१८८॥ सुपारी के गुण—सुपारी गुरु (पचने में भारी) शीत-वीर्य, रूक्ष, कषाय, रसयुक्त, कफ और पित्त का नाशक, मोहजनक, अग्निदीपक, रुचिवर्धक और मुख की विरसता को दूर करने वाली होती है। जिस सुपारी का मध्य भाग कठिन हो अथवा जो उबाल कर बनाई गई (चिकनी सुपारी) हो वह त्रिदोष दूर करने वाली होती है। रस से युक्त नवीन सुपारी, भारी, अभिष्यन्दि (कफकारक) एवं अत्यन्त अग्निनाशक होती है ॥१८७-१८८॥ अथ खदिरसुधाताम्बूलगुणानाह- खदिरः कफपित्तघ्नश्चूर्ण वातबलांसनुत्। संयोगस्त्रिदोषघ्नं सौमनस्यं करोति च॥१८९॥ मुखवैशद्यसौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम्। प्रभाते पूगमधिकं मध्याह्ने खदिरं तथा॥ निशासु चूर्णमधिकं ताम्बूलं भक्षयेत्सदा॥१९०॥ खैर, चूना युक्त पान के गुण—खैर-कफ-पित्त का और चूना-वायु-कफ का नाशक है अत एव दोनों पान के साथ संयुक्त होकर त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं तथा चित्त की प्रसन्नता, मुख की स्वच्छता तथा सुगन्धि एवं शरीर में कान्ति और सुन्दरता को उत्पन्न करने वाले होते हैं। प्रातः काल अधिक सुपारी, दोपहर को अधिक खैर एवं रात्रि में अधिक चूना मिला हुआ पान खाना चाहिये ॥१८९-१९०॥ अथ ताम्बूलपर्णाग्रमध्यादिभागापरित्यागे दोषानाह- आयुराग्रे यशो मूले लक्ष्मीर्मध्ये व्यवस्थिता। तस्मादग्रं तथा मूलं मध्यं पर्णस्य वर्जयेत्॥१९१॥ पर्णमूले भवेद्व्याधिः पर्णाग्रे पापसम्भवः। पर्णमध्यं हरत्यायुः शिरा बुद्धिविनाशिनी ॥१९२॥ पान के अग्र तथा मध्य भागों के परित्याग न करने से दोष—पान के पत्ते के अग्रभाग में आयु, मूल, (डण्ठल) में यश, एवं मध्य में लक्ष्मी रहती हैं। अत एव पान का अग्र, मूल तथा मध्य भाग को
१३८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पान के दो पीक थूकने के बाद खाने का विधान—पान का पहला पीक विष की भाँति, दूसरा पीक भेदी (मल को भेदन करने वाला) और दुर्जर (जल्दी नहीं पचने वाला) होता है। अत एव इन दोनों को थूकने के बाद तीसरे पीक से पान खाना चाहिये। ऐसा पान अमृत तुल्य और रसायन होता है ॥१९३॥ अथाधिकताम्बूलभक्षणे दोषानाह- ताम्बूलं नातिसेवेत न विरिक्तो बुभुक्षितः ॥१९४॥ देहदृक्केशदन्ताग्निश्रोत्रवर्णबलक्षयः। शोषः पित्तानिलास्त्रं स्यादातिताम्बूलचर्वणात् ॥१९५॥ अधिक पान खाने से दोष—अधिक पान नहीं खाना चाहिये और जिसके दस्त आते हों तथा भूख लगी हो, उसे तो अधिक पान नहीं ही खाना चाहिये, क्योंकि अधिक पान खाने से देहदृष्टि-केश-दाँत-जठराग्नि-श्रवण (सुनने की शक्ति)-वर्ण और बल का क्षय होता है और शोष तथा पित्त, वायु और रक्त की दुष्टि होती है ॥१९४-१९५॥ अथ ताम्बूलभक्षणानर्हजनानाह- ताम्बूलं न हितं दन्तदुर्बलैक्षणरोगिणाम्। विषमूच्छामदार्त्तानां क्षयिणां रक्तपित्तिनाम् ॥१९६॥ पान खाने के अयोग्य पुरुष—दाँतरोग वाले, दुर्बल, नेत्ररोगी, विष, मूर्च्छा और मद रोग से युक्त क्षय तथा रक्तपित्त रोग वाले को पान खाना हितकर नहीं होता है ॥१९६॥ अथ भोजनोत्तरं चक्रमणगुणानाह- भुक्त्वा शतपदं गच्छेच्छनैस्तेन तु जायते। अन्नसंघातशैथिल्यं ग्रीवाजानुकटीषु च ॥१९७॥ भोजन के बाद टहलने के गुण—भोजन करके धीरे धीरे सौ कदम तक टहलना चाहिये, ऐसा करने से भोजन किया हुआ अन्न का समूह उदर में शिथिल होता है एवं ग्रीवा, जानु (घुटना) तथा कमर को सुख पहुँचाता है ॥१९७॥ अथ भोजनोत्तरमुपवेशनशयनादिफलान्याह- भुक्त्वोपबिशतस्तन्द्रा शयानस्य तु पुष्टता। आयुश्चङ्क्रममाणस्य मृत्युर्धावति धावतः ॥१९८॥ भोजनोपरान्त बैठने, लेटने, टहलने और दौड़ने से लाभ—भोजन करके तुरन्त बैठने से तन्द्रा, लेटने से शरीर की पुष्टता, धीरे-धीरे सौ कदम टहलने से आयु की वृद्धि और दौड़ने से मृत्यु होती है ॥१९८॥ चङ्क्रममाणस्य=पदशतं शनैर्गच्छतः ॥१९८॥ यहाँ पर 'चङ्क्रममाणस्य' का 'धीरे-धीरे सौ कदम टहलने वाले की' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१९८॥ अथ भोजनोत्तरं शयनरीतिमाह- श्वासानष्टौ समुत्तानस्तान् द्विःपार्श्वे तु दक्षिणे। ततस्तद्द्विगुणान्वामे पश्चात्स्वप्याद्यथासुखम् ॥१९९॥ भोजनोपरान्त शयन विधि—भोजनोपरान्त प्रथम आठ श्वास तक उत्तान लेटे, उसके बाद उससे दूना (सोलह) श्वास तक दाहिने करवट लेटे, उसके बाद उससे दूना (बत्तीस) श्वास तक बायें करवट लेने तत्पश्चात् जैसी इच्छा हो वैसे लेटे ॥१९९॥ अथ सर्वदा वामपार्श्वेन शयने हेतुमाह- वामदिशायामनलो नाभेरूर्ध्वंऽस्ति जन्तूनाम्। तस्मात्तु वामपार्श्वं शयीत भुक्तप्रपाकार्थम् ॥२००॥ सर्वदा बायें करवट लेटने का विधान—प्राणियों के बाईं तरफ नाभि के ऊर्ध्व भाग में जठराग्नि रहती है, अतः खाये हुये अन्न के शीघ्र परिपाक होने के निमित्त मनुष्यों को सर्वदा बायें करवट सोना चाहिये ॥२००॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३९ अथ शयनचर्यामाह, तत्रादौ खट्वादीनामुपरि शयनफलान्याह- त्रिदोषशमनी खट्वा तूली वातकफापहा। भूशय्या वृंहणी वृष्या काष्ठपट्टी तु वातला ॥२०१॥ शय्या का विधान—खाट पर सोने से तीनों दोषों का शमन होता है, गद्दे पर सोने से वायु और कफ का नाश होता है, केवल पृथ्वी पर सोने से पुष्टि तथा वीर्य की वृद्धि होती है तथा काठ के पटरों (तख्तों) पर सोने से वायु बढ़ता है ॥२०१॥ अन्यः पुनराह- भूशय्या वातलाऽतीवरूक्षा पित्तास्रनाशिनी। सुशय्याशयनं हृद्यं पुष्टिनिद्राधृतिप्रदम् ।। श्रमानिलहरं वृष्यं विपरीतमतोऽन्यथा ।।२०२ ।। शय्या के विषय में अन्य मत-पृथ्वी पर शयन करना अत्यन्त वातजनक, रूक्षता का उत्पादक और रक्त पित्त का नाशक होता है। सुन्दर शय्या पर शयन करना हृदय के लिये प्रिय, पुष्टि, निद्रा और धैर्य का प्रदान करने वाला, श्रम तथा वायु को हरण करने वाला है और वीर्यवर्धक होता है और इससे विपरीत बुरी शय्या पर शयन करना पूर्वोक्त गुणों से विरुद्ध फल देने वाला होता है ॥२०२॥ अथ संवाहनगुणानाह- संवाहनं मांसरक्तत्वक्प्रसादकरं परम्। प्रीतिनिद्राकरं वृष्यं कफवातश्रमापहम् ।।२०३।। शरीर दबवाने के गुण-शरीर दबवाना मांस, रक्त और त्वचा के लिये अत्यन्त सुखावह और मन की प्रसन्नता तथा निद्रा को उत्पन्न करनेवाला, वीर्यवर्धक एवं कफ, वायु और श्रम का दूर करने वाला होता है ॥२०३॥ अथ प्रवाताप्रवातसेवनगुणानाह- श्वेदमूर्च्छापिपासाघ्नमप्रवातमतोऽन्यथा। प्रवातं रौक्ष्यवैवर्ण्यस्तम्भकृद्दाहपित्तनुत् ।। २०४ ।। सुखं प्रवातं सेवेत ग्रीष्मे शरदि चान्तरा। निर्वातामायुषे सेव्यमारोग्याय च सर्वदा ।।२०५।। धीरे तथा जोरों से बहती हुई वायु सेवन के गुण-अधिक बहती हुई वायु का सेवन रूक्षता, विवर्णता तथा स्तब्धता (शरीर का जकड़न) करनेवाला, दाह तथा पित्त का नाशक, स्वेद (पसीना) मूर्च्छा और प्यास को दूर करनेवाला होता है और धीरे-धीरे बहने वाली वायु का सेवन पूर्वोक्त गुणों से विपरीत फल देने वाला होता है। ग्रीष्म तथा शरत् ऋतु में बीच-बीच में सुखकर (शरीर तथा मन को प्रफुल्लित करने वाली) वायु का सेवन करना चाहिये और आयु तथा आरोग्यता का लाभ करने के लिये सर्वदा वायु रहित स्थान का सेवन करना (ऐसे स्थानों में टहलना) चाहिये ।।२०४- २०५।। अथ पूर्ववायुसेवनगुणदोषानाह- पूर्वाऽनिलो गुरुः सोष्णः स्निग्धः पित्तास्रदूषकः । विदाही वातलः 'श्रान्तिकफशोषवतां हितः ।।२०६।। पूर्वी वायु (पुरवइया हवा) के सेवन से गुण दोष-पूर्वी वायु भारी, गरम, स्निग्ध, रक्त व पित्त को दूषित करने वाली और विशेष रूप से दाह उत्पन्न करने वाली तथा वायु के दोष को बढ़ाने वाली है किन्तु परिश्रम कफ तथा शोष से युक्त प्राणियों के लिये हितकर होती है ॥२०६॥ स्वादुः पटुरभिष्यन्दी त्वग्दोशार्शोविषक्रिमीन् । सन्निपातं ज्वरं श्वासमामवातं च कोपयेत् ।।२०७।। पूर्वी वायु स्वादु नमकीन अभिष्यन्दी होती है तथा त्वग्गत दोष, बवासीर, विष, क्रिमि, सन्निपातज्वर, श्वास और आमवात को कुपित करने वाली होती है ॥२०७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
१४० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ स्वादुः=भक्ष्यद्रव्येषु बाहुल्येन मधुररसजनकः ।।२०७।। 'स्वादुः' से 'भक्षण योग्य पदार्थों में प्रायः मधुर रस (मिठास) उत्पन्न करनेवाली' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२०७॥ अथ दक्षिणपश्चिमपवनयोर्गुणदोषानाह- दक्षिणः पवनः स्वादुः पित्तरक्तहरो लघुः । वीर्येण शीतलो बल्यश्चक्षुष्यो न तु वातलः ।। पश्चिमः पवनस्तीक्ष्णः शोषको बलहल्लघुः । मेदःपित्तकफध्वंसी प्रभञ्जनविवर्धनः ।।२०९।। दक्षिणी तथा पश्चिमी वायु सेवन के गुण-दोष—दक्षिणी वायु स्वादु, पित्तरक्त नाशक, लघु, शीत, वीर्य, बलकारक तथा नेत्रों के लिये हितकर है किन्तु वातवर्धक नहीं है और पश्चिमी वायु तीक्ष्ण, शोष उत्पन्न करने वाली, बलहरण करने वाली, लघु, मेद, पित्त तथा कफ को नष्ट करने वाली तथा वातवर्धक है ॥२०८-२०९॥ अथोत्तरवायोर्गुणदोषानाह- उत्तरा मारुतः शीतः स्निग्धो दोषप्रकोपकृत् । क्लेदनः प्रकृतिस्थानां बलदो मधुरो मृदुः ।।२१०।। उत्तरी वायु के गुण-दोष—उत्तरी वायु शीतल, स्निग्ध, दोषों को कुपित करने वाली, क्लेदजनक (आर्द्रता उत्पन्न करने वाली), प्रकृतिस्थ (स्वस्थ) पुरुषों को बल देनेवाली, मधुर तथा मृदु होती है ॥२१०॥ दोषप्रकोपकृद्=आतुराणाम् ।।२१०।। 'दोषप्रकोपकृद्' अर्थात् 'रोगी पुरुषों के दोषों को कुपित करने वाली' ॥२१०॥ अथाग्नेयादिवायूनां गुणानाह- आग्नेयो दाहकृद्रूक्षो नैर्ऋतो न विदाहकृत् । वायव्यस्तु भवेत्तिक्त ऐशानः कटुकः स्मृतः ।।२११।। बिष्वग्वायुरनायुष्यः प्राणिनां बहुरोगकृत् । अतस्तं नैव सेवेत सेवितः स्यान्न शर्मणे ।।२१२।। आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान तथा चौतरफा बहनेवाली वायु के गुण—आग्नेय (अग्निकोण की) वायु दाहजनक तथा रूक्ष होती है। नैर्ऋत (निर्ऋत्य कोण की) वायु दाहकारक नहीं होती है। वायव्य (वायव्य कोण की) वायु तिक्त होती है। ऐशान (ईशान कोण की) वांयु कटु होती है। चारों दिशाओं की मिली हुई वायु आयु नाशक और प्राणियों के लिये बहुत रोग उत्पन्न करने वाली होती है उसके सेवन से कल्याण नहीं होता अतः उसका सेवन नहीं करना चाहिये ॥२११-२१२॥ अथ व्यञ्जनतालवृन्तादिभववायूनां गुणानाह- व्यजनस्यानिलो दाहस्वेदमूर्च्छाश्रमापहः । तालवृन्तभवो वातस्त्रिदोषशमको मतः ।।२१३।। शव्यजनजस्तूष्णो रक्तपित्त प्रकोपणः । चामरो वस्त्रसम्भूतः मायूरो वेत्रजस्तथा ।।२१४।। एते दोषजिता वाताः स्निग्धा हृद्याः सुपूजिताः ।।२१५।। पङ्खे की वायु के गुण—पङ्खे मात्र की वायु-दाह, स्वेद, मूर्च्छा और श्रम को दूर करने वाली होती है। उसमें ताड़ के पत्तों से बने पङ्खे की वायु वातादि तीनों दोषों को दूर करने वाली है। बाँस के पङ्खे की वायु उष्ण एवं रक्तपित्त को कुपित करने वाली होती है। चमर, वस्त्र, मोर के तथा वेत के बने हुये पङ्खे की वायु स्निग्ध, हृदय को प्रिय अत एव प्रशंसनीय हैं ॥२१३-
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४१ दिन में सोने का निषेध—दिन में नहीं सोना चाहिये क्योंकि दिवास्वाप (दिन में सोना) कफकारक होता है। अतएव ग्रीष्म ऋतु को छोड़ अन्य सभी ऋतुओं में दिन में सोना निषिद्ध है ॥२१६॥ अथ दिवास्वापयोग्यजनानाह- उचितो हि दिवास्वप्नो नित्यं येषां शरीरिणाम् । वातादयः प्रकुप्यन्ति तेषामस्वपतां दिवा ॥२१७॥ व्यायामप्रमदाऽध्ववाहनरतान् क्लान्तानतीसारिणः शूलश्वासवतस्तृषापरिगतान् हिक्कामरुत्पीडितान् ।। क्षीणान् क्षीणकफाञ्छिशून्मदहतान्वृद्धानसाजीर्णिनो- रात्रौ जागरितान्नराग्निरशनान्कामं दिवा स्वापयेत् ।।२१८।। दिन में सोने योग्य जन—जिन को दिन में सोने का अभ्यास हो वे यदि दिन में न सोवें तो उनके वातादि दोष कुपित हो जाते हैं अत एव ऐसे लोगों के लिये दिन में सोना निषिद्ध नहीं है। तथा कसरत करने वाले, रात्रि में स्त्रीसंभोग करने वाले, रास्ता चलने वाले, घोड़ा आदि वाहनों पर चढ़ने वाले तथा थके हुये, अतीसार, शूल और श्वास रोगों से युक्त एवं प्यासे, हिचकी तथा वायु के रोग से पीड़ित, कृश, क्षीण कफ वाले, बच्चे, मदहत (अत्यन्त शराबी-नशेबाज), वृद्ध तथा अजीर्ण रोग से युक्त एवं रात्रि में जगे हुये तथा उपवास किये हुये हों, उन सबों को इच्छानुसार दिन में सोना चाहिये ॥२१७-२१८॥ दिवा वा यदि वा रात्रौ निद्रा सात्मीकृता तु यैः । न तेषां स्वपतां दोषो जाग्रतां चोपजायते ।।२१९।। दिन तथा रात्रि में जिन्होंने सोना अपने प्रकृति के अनुकूल कर लिया है, वे यदि उस समय सोवें या जागें तो उन लोगों को कोई दोष (हानि) नहीं होता है ॥२१९॥ ❖ स्वपतां-दिवा इति यावत् । जाग्रतां=रात्राविति शेषः ।।२१९।। 'स्वपताम्' अर्थात् दिन के समय सोवे और 'जाग्रताम्' अर्थात् रात्रि के समय जागे' ।।२१९।। अथ भोजनानन्तरं शयनफलमाह- भोजनानन्तरं निद्रा वातं हरति पित्तहृत् । कफं करोति वपुषः पुष्टिं सौख्यं तनोति हि ।।२२०।। भोजन के बाद सोने के गुण—भोजन के बाद का शयन वात-पित्त का हरण करने वाला, कफकारक तथा शरीर की पुष्टि और सुख की वृद्धि करने वाला होता है ॥२२०॥ अथ शयनमर्दनादीनां फलान्याह- शयनं पित्तनाशाय वातनाशाय मर्दनम्। वमनं कफनाशाय ज्वरनाशाय लङ्घनम् ।।२२१।। आसीनं घूर्णितं यत्तु नाभिष्यन्दि न रूक्षणम् ।।२२२।। शयन, मर्दन आदि का गुण-सोने से पित्त का, शरीर मलवाने से वायु का, वमन करने से कफ का और उपवास करने से ज्वर का नाश होता है और बैठना तथा घूमना न अभिष्यन्दी (कफकारक) है और न रूक्ष ही है ॥२२१-२२२॥ अथापरानप्युदरेऽन्नस्य संस्थापनहेतूनाह- शब्दान् स्पर्शांश्च रूपाणि रसानान्धान्मनःप्रियान् । भुक्तवानपि सेवेते तेनान्नं साधु तिष्ठति ।।२२३।। उदर में अन्न के ठहरने के कारण—भोजन करने के बाद मन को प्रिय लगने वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध का सेवन करने से खाया हुआ अन्न भलीभाँति (पेट में) ठहरता है ॥२२३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
१४२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ उदरे इति शेषः ।।२२३।। 'भलीभाँति उदर में ठहरता है' ऐसा अर्थ जोडना (समझना) चाहिये ।।२२३।। अथान्नस्योदरेऽस्थितिहेतूनाह- शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धो जुगुप्सितः । भुक्तमप्रयतं चान्नमतिहास्यं च वामयेत् ।। खाये हुए अन्न का उदर में न ठहरने के हेतु—घृणित शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध एवं अपवित्र अन्न तथा अत्यन्त हँसना ये सब वमन हो जाने के कारण हैं ।।२२४।। ❖ अप्रयतमपवित्रम् ।।२२४।। 'अप्रयतम्' का 'अपवित्र' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२२४।। अथान्यदपि वर्जनीयमाह- शयनं चाशनं चाति न भजेन्न द्रवाधिकम् । नाग्न्यातपौ न प्लवनं न यानं नापि वाहनम् ।।२२५।। भोजन के बाद परित्याग करने के योग्य अन्यान्य कर्म—भोजन के बाद अधिक देरतक सोना, बैठना तथा अधिक द्रव (पतला) पदार्थ और अग्नि तथा आतप (घाम) का सेवन, एवं जल में तैरना, मार्ग में चलना और घोड़े आदि की सवारी करना छोड़ देवे ।।२२५।। ❖ प्लवनं=बाहुभ्यां जलप्रतरणम्, यानं=मार्गे चलनम्, वाहनमश्वादि ।।२२५।। 'प्लवन' से 'बाहुओं से जल में तैरना' तथा 'यान' से 'मार्ग में चलना' और 'वाहन' से 'घोड़े आदि की सवारी करना' अर्थ समझना चाहिये ।।२२५।। व्यायामं च व्यवायं च धावनं यानमेव च । युद्ध गीतं च पाठं च मुहूर्त्तं भुक्तवांस्त्यजेत् ।।२२६।। भोजनोपरान्त व्यायाम (कसरत), स्त्रीसम्भोग, दौड़ना, बैलगाड़ी आदि सवारी पर चढ़ना, युद्ध, गाना, पढ़ना तथा ऊपर कहे हुए कर्मों को एक मुहूर्त्त (लगभग पौन घण्टे) तक अवश्य त्याग देवे ।।२२६।। अथाजीर्णस्य हेतूनाह- अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च सन्धारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च । कालेऽपि सात्म्यं लघु चापि भुक्तमन्नं पाकं भजते नरस्य ।।२२७।। अजीर्ण होने के कारण—ज्यादा जल पीने से, विषम (थोड़ा, बहुत या अबेर, सबेर,) भोजन करने से, मलमूत्रादि के वेग रोकने से, सोने का विपर्यय अर्थात् दिन में सोने तथा रात्रि में जागने से अथवा जिसको जिस समय सोना या जागना अभ्यस्त:हो उस समय न सोने तथा न जागने से लघु तथा ठीक समय पर भोजन किया हुआ भी अन्न नहीं पचता है ।।२२७।। ❖ १सन्धारणात्=अधोवातमलमूत्रादीनाम् ।।२२७।। 'सन्धारणात्' का 'मलमूत्रादि के वेग रोकने से' यह अर्थ करना चाहिये ।।२२७।। ईर्ष्याभयक्रोधसमन्वितेन लुब्धेन रुग्दैन्यनिपीड़ितेन ।। विद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक्परिपाकमेति ।।२२८।। १. सर्वत्राग्रिमश्लोकादनन्तरं कोष्ठस्थ पाठोऽयं पठितः, तत्तु, प्रमाद एवेति।
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४३ जो ईर्ष्या, भय और क्रोध से युक्त तथा लोभी है एवं रोग तथा दीनता से पीड़ित और द्वेष से युक्त रहते हैं उनका भी भोजन किया हुआ अन्न भली-भाँति परिपक्व नहीं होता, अतः अजीर्ण न हो इसके लिये सर्वथा उपर्युक्त कर्मों का त्याग करना चाहिये ।।२२८।। अथाध्यशनलक्षणमाह- अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते ।।२२९।। अध्यशन के लक्षण—अजीर्ण होने पर भी जो भोजन किया जाता है, उसे अध्यशन कहते हैं ।। प्राग्भुक्ते चानले मन्दे द्विरह्नि न समाहरेत् ।।२३०।। तन्निवारयन्नाह- अध्यशन करने का निषेध—पहले का भोजन नहीं पचा हो तथा अग्नि मन्द हो तो दिन में दो बार भोजन नहीं करना चाहिये ।।२३०।। ❖ अस्यायर्थः-प्रातर्भुक्ते अजीर्णे सति अहन्येव पुनर्न भुञ्जीतेत्यर्थः । रात्रौ पुनस्तथाऽपि सति भुञ्जीतैव । अत आह सुश्रुत एव— 'प्रातराशे त्वजीर्णे तु सायमाशो न दुष्यति' इति ।।२३०।। इसका भावार्थ यह है कि—प्रातःकाल (९-१० बजे) का भोजन यदि जीर्ण (पचा) न हो तो पुनः दिन में ही केवल दुबारा नहीं खाना चाहिये, किन्तु रात्रि में तो अजीर्ण रहने पर भी भोजन करना ही चाहिये । इसी विषय में 'सुश्रुत' भी कहते हैं कि—'प्रातःकाल का भोजन अजीर्ण होने पर भी सायङ्काल भोजन करने पर दोष उत्पन्न नहीं करता हैं' ।।२३०।। पूर्व भुक्ते विदग्धेऽन्ने भुञ्जानो हन्ति पावकम् ।।२३१।। पूर्व का भोजन किया हुआ अन्न यदि विदग्ध (अर्धपरिपक्व) हो गया हो तो उस समय भोजन करने से अग्नि मन्द हो जाती है ।।२३१।। अस्य त्वयमर्थः-पूर्व भुक्ते रात्रिभुक्ते अन्ने विदग्धे किञ्चित् पक्वे किञ्चिदपक्वे प्रातर्भुञ्जानः पावकं हन्तीत्यर्थः ।।२३१।। वस्तुतः इसका अर्थ यह है कि—पूर्व में भोजन किया हुआ अर्थात् रात्रि में भोजन किया हुआ अन्न विदग्ध अर्थात् कुछ पक्व और कुछ न पक्व हुआ हो तो उस समय भोजन करने से अग्नि नष्ट हो जाती है ।।२३१।। अत आह—सायमाशो त्वजीर्णे तु प्रातर्भुक्तं विषोपमम् ।।२३२।। इति ।। इसीलिये कहा भी है कि—यदि सायङ्काल का भोजन परिपक्व न हुआ हो तो प्रातःकाल भोजन करना विष तुल्य होता है ।।२३२।। अथ सायमाशाजीर्णे भोजनोपायमाह- भवेद्यदि प्रातरजीर्णशङ्का तदाऽभयां नागरसैन्धवाभ्याम् । विचूर्णितां शीतलजलेन भुक्त्वा भुञ्जीत चान्नं मितमन्नकाले ।।२३३।। प्रातःकाल अजीर्ण मालूम पड़ने पर भोजन का उपाय—प्रातःकाल यदि अजीर्ण की आशङ्का हो तो हरें, सोंठ और सेंधानमक का चूर्ण बनाकर शीतल जल के साथ खाकर, भोजन का समय उपस्थित होने पर उस दिन थोड़ी मात्रा में भोजन करना चाहिये ।।२३३।।
१४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ दिवास्त्रीसंगनिषेधमाह- आयुःक्षयभयाद्विद्वान्न्राहि सेवेत कामिनीम्। अवशो यदि सेवेत १तदा ग्रीष्मवसन्त्योः ॥२३४॥ दिन में स्त्री सम्भोग का निषेध—बुद्धिमान् लोग आयु नाश होने के भय से दिन में स्त्री के साथ भोग न करें, यदि अवश होकर करना ही चाहें तो ग्रीष्म तथा वसन्त ऋतु में किसी-किसी दिन कर सकते हैं ॥२३४॥ ❖ अवशः=अजितेन्द्रियः ।।२३४।। 'अवश' का 'इन्द्रियों के वशीभूत' (कामुक) अर्थ समझना चाहिये ।।२३४।। अथोपवेशनाटनादिगुणानाह- आस्या वर्णकफस्थौल्यसौकुमार्यसुखप्रदा। अध्वा वर्णकफस्थौल्यसौकुमार्यविनाशनः ।।२३५।। यत्तु चंक्रमणं नातिदेहपीडाकरं भवेत्। तदायुर्बलमेधाऽग्निप्रदमिन्द्रियबोधनम् ।।२३६।। बैठे रहने, रास्ता चलने एवं धीरे धीरे टहलने के गुण-दोष—कहीं पर जाना-आना न करके केवल स्थिर भाव से एक स्थान पर बैठे रहने से शरीर का अच्छा वर्ण, कफ की वृद्धि, देह की स्थूलता, सुकुमारता और सुख होता है और अधिक पैदल चलने से इसकें विपरीत देह के वर्ण, स्थूलता, सुकुमारता तथा कफ इन सबों का नाश होता है तथा चङ्क्रमण (धीरे-धीरे टहलने) से देह में विशेष पीड़ा का अभाव और आयु, बल, मेधा तथा जठराग्नि एवं सम्पूर्ण इन्द्रियों की शक्ति की भी वृद्धि होती है ।।२३५-२३६।। अथोष्णीषधारणगुणानाह- उष्णीषं कान्तिकृत्केश्यं रजोवातकफापहम्। लघु यच्छस्यते तस्माद् गुरु पित्ताक्षिरोगकृत् ।।२३७।। पगड़ी, मुरेठा आदि धारण करने के गुण-दोष—मस्तक पर उष्णीष (पगड़ी, साफा आदि) कान्ति की वृद्धि करने वाला, केश के लिये हितकारी, धूलि को दूर करने वाला अर्थात् धूलि से बालों को बचाने वाला और वात तथा कफ का नाशक होता है। परन्तु ये सब उत्तम गुण तभी होते हैं जब कि वह हल्का हो। यदि उष्णीष भारी हुआ तो पित्त की वृद्धि और नेत्र सम्बन्धी रोग को उत्पन्न करने वाला होता है ।।२३७।। अथोपानद्धारणगुणानाह- उपानद्धारणं नेत्र्यमायुष्यं पादरोगहृत्। सुखप्रचारमोजस्यं वृष्यं च परिकीर्त्तितम् ।।२३८।। जूता पहनने के गुण—जूता पहनना नेत्र तथा आयु के लिये हितकर, पैर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, चलने फिरने में सुख देने वाला, ओजोवर्धक और वृष्य (बल तथा पुष्टिका वर्धक) है ।।२३८।। अथानुपानद्भ्यां पादाभ्यां चंक्रमणे दोषानाह- पादाभ्यामनुपानद्भ्यां सदा चंक्रमणं नृणाम्। अनारोग्यमनायुष्यमिन्द्रियघ्नमदृष्टिदम् ।।२३९।। जूता न पहनने से अवगुण—बिना जूता पहने केवल पैदल सदा यातायात करना मनुष्यों के लिये आरोग्यता और आयु को नष्ट करने वाला एवं इन्द्रियों की तथा देखने की शक्ति का नाश करने वाला होता है ।।२३९।। अथ छत्रदंडधारणगुणानाह- छत्रस्य धारणं वर्षातपवातरजोऽपहम्। हिमघ्नं हितमक्ष्णोश्च मङ्गल्यमपि कीर्त्तितम् ।।२४०।। सत्त्वोत्साहबलस्थैर्यधैर्यतेजोविवर्धनम्। अवष्टम्भकरं चापि भयघ्नं दण्डधारणम् ।।२४१।। १. शीतवसन्त्योरिति पाठः।
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४५ छाता तथा दण्ड धारण करने के गुण—छाता लगा कर चलना-वर्षा, आतप (घाम), हवा, धूलि तथा शीत से रक्षा करने वाला, नेत्रों के लिये हितकारी तथा मङ्गलप्रद होता है और दण्ड धारण करना-शक्ति, उत्साह, बल, स्थिरता, धैर्य तथा तेज का बढ़ाने वाला, सहारा देने वाला तथा भय को दूर करने वाला होता है ॥२४०-२४१॥ अथ शिविकाऽऽश्वारोहणगुणानाह- ऊर्ध्वाच्छादनसंयुक्ता शिबिका सर्ववल्लभा । तस्यामारोहणं नॄणां त्रिदोषशमकं मतम् ।। २४२ ।। वातश्लेष्मगदार्त्तानामहिता भ्रमकृत्तरिः । पित्तानिलकरो हस्ती लक्ष्म्यायुःपुष्टिवर्द्धनः ।। २४३ ।। घोटकारोहणं वातपित्ताग्निश्रमकृन्मतम् । मेदोवर्णकफघ्नं च हितं तद्बलिनां परम् ।। २४४ ।। पालकी, नौका, हाथी और घोड़े की सवारी करने के गुण—ऊपर से आवरण युक्त अर्थात् छाई हुई जो पालकी होती है, वह प्रायः सभी को प्रिय लगने वाली होती है। अतः उसमें चढ़ कर चलने से मनुष्यों के तीनों दोषों का शमन होता है। नौका पर सवार होकर जाना-वात तथा कफ रोग से पीड़ित लोगों के लिये अहितकारी तथा भ्रम (घूमटा) उत्पन्न करने वाला होता है। हाथी पर चढ़कर चलने से पित्त तथा वायु की उत्पत्ति एवं लक्ष्मी, आयु तथा पुष्टि की वृद्धि होती है। घोड़ा पर चढ़कर चलने से आयु, पित्त तथा जठराग्नि की वृद्धि एवं श्रान्ति (थकावट) की उत्पत्ति होती है तथा भेद, वर्ण और कफ का नाश होता है। घोड़े की सवारी बलवान् पुरुषों के लिये विशेष हितकर है। किन्तु दुर्बलों के लिये यह सवारी त्याज्य ही समझना चाहिये ॥२४२-२४४॥ अथातपादीनां गुणानाह, तत्रादावातपच्छायासेवनयोर्गुणानाह- आतपः स्वेदमूर्च्छाऽस्रपित्ततृष्णाक्लमाश्रमान् । दाहं विवर्णतां कुर्यादितांश्छाया व्यपोहति ।। २४५ ।। धूप तथा छाया सेवन के गुण—धूप का सेवन करना-स्वेद, मूर्छा, रक्त-पित, प्यास, क्लान्ति, श्रम, दाह तथा विवर्णता को करता है तथा छाया का सेवन इन्हीं सबों को दूर करता है ॥२४५॥ अथ वृष्टिकुहेल्योः सेवनगुणानाह- वृष्टिर्वृष्या हिमा बल्या निद्राऽऽलस्यविधायिनी । भयावहा मोहकरी कुहेलिः कफवातला ।। २४६ ।। वर्षा तथा कुहेसा के सेवन के गुण—वर्षा का सेवन वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल, बलकारक, निद्रा तथा आलस्य को उत्पन्न करने वाला होता है। और कुहेसा का सेवन भयदायक, मोह उत्पन्न करने वाला और कफ तथा वायु को बढ़ाने वाला होता है ॥२४६॥ ❖ कुहेलिः=कुआशा इति लोके ।। २४६।। ‘कुहेलिः’ का ‘कुआसा’ (कुहेसा) अर्थ करना चाहिये ॥२४६॥ अथाग्निधूमयोः सेवनगुणानाह- अग्निर्वातकफस्तम्भशीतवेपथुनाशनः । आमाभिष्यन्दशमनो रक्तपित्तप्रकोपणः ।। २४७ ।। सद्यः श्लेष्मकरो धूमो नेत्रयोरहितो भृशम् । शिरोगौरवकृच्चापि वातपित्तं च कोपयेत् ।। २४८ ।। अग्नि तथा धूप सेवन के गुण—अग्निसेवन-वायु, कफ, स्तब्धता (शरीर का जकड़ जाना) शीत और कँपकँपी को दूर करने वाला, आमाभिष्यन्दन को शमन करने वाला और रक्त-पित्त को प्रकुपित करने वाला होता है। धूम सेवन— तत्काल कफ उत्पन्न करने वाला, नेत्रों के लिये अत्यन्त अहितकर, मस्तक को भारी करने वाला और वात तथा पित्त को कुपित करने वाला होता है ॥२४७-२४८॥ १३ भाव.I
१४६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ सदाचरणान्याह- मैत्रीं१ सद्भिः समं कुर्यात्स्नेहं सत्सु तु सर्वथा । संसर्गं साधुभिः कुर्यादसत्सङ्गं परित्यजेत् ।। २४९ ।। सत्पुरुषों के आचरण-सज्जनों के साथ मैत्री तथा सब प्रकार से स्नेह करना चाहिये एवं साधु अर्थात् दूसरे की भलाई करने वाले सज्जनों के ही साथ हर प्रकारका सम्बन्ध रखे और नीच पुरुषों की सङ्गति छोड़ देनी चाहिये ।।२४९।। ❖ सत्सु सज्जनेषु । सर्वथा=मनोवाक्कर्मभिः ।। २४९ ।। ‘सत्’ से ‘सज्जन’ तथा ‘सर्वथा’ से ‘सब प्रकार से अर्थात् मन, वाणी तथा कर्म से’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।२४९।। सेवेत देवभूदेववृद्धवैद्यनृपातिथीन् । विमुखानार्थिनः कुर्यान्नावमन्येत कानपि ।। २५० ।। गुरूणां सन्निधौ तिष्ठेत्सदैव विनयान्वितः । पादप्रसारणादीनि तत्र नैव समाचरेत् ।। २५१ ।। अपकारपरेऽपि स्यादुपकारपरः पुमान् । आत्मवत्सकलान्पश्येद्द्वैरिणो दूरतो वसेत् ।। २५२ ।। २न कश्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् । प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः ।। २५३ ।। नात्मानमुदके पश्येन्न नग्नः प्रविशेज्जलम् । तथा नाज्ञातगाम्भीर्यं न हिंस्रप्राणिसेवितम् ।। २५४ ।। काले हितं मितं सत्यं संवादि मधुरं वदेत् । भुञ्जीत मधुरप्रायं स्निग्धं काले हितं मितम् ।। २५५ ।। न रात्रौ दधि भुञ्जीत न च निर्लवणं तथा । नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं न चाप्यघृतशर्करम् ।।
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४७ विरत नहीं होना चाहिये तथा किसी भी व्यक्ति के फल अर्थात् उद्योगादि करने से प्राप्त हुये धनादि के विषय में ईर्ष्या (डाह) नहीं करना चाहिये ॥२५८॥ ❖ हेतौ=फलहेतौ उद्यमे, फले=धनादौ ।। २५८ ।। 'हेतु' से 'फल प्राप्ति के हेतुस्वरूप उद्यम' तथा 'फल' से 'धनादि' अर्थ समझना चाहिये ॥२५८॥ वेगान्न धारयेज्जातु मनोवेगान्विधारयेत् । न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतानतिलालयेत् ।।२५९।। मलमूत्रादि के वेगों को कभी रोकना नहीं चाहिये। किन्तु मन के वेग को सदा रोकना चाहिये। इन्द्रयों को पीड़ित अर्थात् एकाएक हठ पूर्वक विषयों से विरत नहीं करना चाहिये अर्थात् शनैः-शनैः इन्द्रियों को वश में लाना चाहिये और इन्द्रियों का अत्यन्त लालन भी नहीं करना चाहिये अर्थात् शब्दस्पर्शादि विषयों का अधिक ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥२५९॥ वर्षाऽऽतपादिषुच्छत्री दण्डी रात्रौ भषेषु च । सोपानत्कस्तनुं रक्षेद्विचरेद्युगमात्रदृक् ।। २६० ।। वर्षा तथा धूप आदि होने पर छाता लगाकर एवं रात्रि तथा भय उपस्थित होने पर दण्ड धारण कर सर्वदा शरीर की रक्षा करनी चाहिये। जूता पहन कर आगे की ओर चार हाथ तक की भूमि को देखता हुआ चलना चाहिये ॥२६०॥ ❖ युगमात्रदृक्= अग्रतो हस्तचतुष्टयमितां भूमिं पश्यन् ।।२६०।। 'युगमात्रदृक्' अर्थात् 'आगे चार हाथ तक की भूमि को देखता हुआ' ॥२६०॥ नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाग्निस्कन्धमभिव्रजेत् । सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद्दुष्टयानकम् ।।२६१।। नदी को बाहुओं से तैर कर नहीं किन्तु नौका आदि से पार करना चाहिये और जिस ओर अग्नि-समूह हो उधर नहीं जाना चाहिये। जिस नौका पर सवार होने से डूबने का और जिस वृक्ष पर चढ़ने से टूट जाने या स्वयं गिर पड़ने का सन्देह हो ऐसी नौका तथा वृक्ष पर नहीं चढ़ना चाहिये। दुष्ट-वाहन-हाथी, घोड़ा आदि पर भी नहीं चढ़ना चाहिये ॥२६१॥ ❖ दुष्टयानं=दुष्टगजघोटकादि ।।२६१।। 'दुष्टयान' अर्थात् 'बदमाश घोड़े और मतवाले हाथी आदि वाहन' ॥२६१॥ नासंवृतमुखं कुर्यात्सभायां च विचक्षणः । कासं हासं¹ तथोद्गारं जृम्भणं क्षवथुं यथा ।। २६२ ।। नासिकां न विकुष्णीयान्नासीतोत्कटकः क्वचित् । नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेन्न नखेन लिखेद्भुवम् ।। २६३ ।। सम्मार्जनीरजो नैव देहे दद्यात्कदाचन । न नखेन तृणं छिन्द्यान्नोच्छिष्टो ब्राह्मणं स्पृशेत् ।। २६४ ।। नोपरक्तं न चोद्यन्तं नास्तं यातं दिवाकरम् । सर्वथा न समीक्षेत न जले प्रतिबिम्बितम् ।।२६५।। नेक्षेत सततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च । पौरन्दरं धनुनैव दर्शयेत्कमपि क्वचित् ।।२६६।। नेच्छेद्वलवता युद्धं न भारं शिरसा वहेत् । गात्रं न वादयेत्केशान्हस्तेन धुनयान्न च ।।२६७।। न गच्छेत्पूज्ययोर्मध्ये दम्पत्योरन्तरेण च । रिपोरन्नं न भुञ्जीत गणिकाऽन्नमपि क्वचित् ।। २६८ ।। बुद्धिमान् मनुष्य सभा के मध्य में हाथ आदि से बिना मुख ढँके खाँसना, हँसना, उद्गार (डकार) तथा जँभाई लेना एवं छींकना तथा नाक से मैल निकालना इन सब कर्मों को न करें। (मल-मूत्र त्याग करने के अतिरिक्त और) किसी समय में उत्कटासन (उँकरू) होकर तथा अधिक देर तक जानुओं (घुटनों) को ऊँचे करके नहीं बैठे। नख से भूमि को न खोदे। शरीर पर कभी भी.झाड़ू की धूलि न पड़ने दे। नख से तृण को न तोड़े। जूठे मुख होकर ब्राह्मण को न छुवे। ग्रहण
१. 'श्वासमिति पाठः ।
१४८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे के समय, उदय तथा अस्त होते हुये सूर्य को तथा जल में पड़े हुये सूर्य के प्रतिबिम्ब को भी कभी न देखे। निरन्तर सूक्ष्म, चमकती हुई, अपवित्र तथा अप्रिय वस्तु को न देखे। इन्द्र धनुष को कभी किसी दूसरे को न दिखावे। बलवान् पुरुष के साथ कभी युद्ध करने की इच्छा न करे। शिर के ऊपर बोझ रख कर न ढोवे। हाथ आदि से ठोक कर शरीर न बजावे। हाथ से केशों को कभी न हिलावे। पूज्य व्यक्तियों के तथा विवाहित स्त्री-पुरुष के मध्य से होकर न जावे और कभी भी शत्रु तथा वेश्या का अन्न न खावे ॥२६२-२६८॥ प्रतिभूर्न भवेत्क्वापि न च साक्षी वृथा भवेत् ॥२६९॥ कभी किसी का जामिन न होवे तथा व्यर्थ किसी का साक्षी (गवाह) भी न होवे ॥२६९॥ ❖ प्रतिभूः = जामिन् ॥२६९॥ 'प्रतिभूः' अर्थात् 'जामिन' जमानतदार ॥२६९॥ स्थागं १ न धारयेज्जातु द्यूतं दूरात्परित्यजेत् ॥२७०॥ विश्वासं नाचरेत्
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४९ रात्रि की चाँदनी, ओस और अन्धकार के गुण—रात्रि की चाँदनी शीतल, कामदेवसम्बन्धी आनन्द को बढ़ाने वाली, प्यास, पित्त तथा दाह को दूर करने वाली होती है और रात्रि की ओस चाँदनी की अपेक्षा स्वल्पमात्रा में पूर्वोक्त गुणों से युक्त होती है किन्तु वायु और कफ को उत्पन्न करनेवाली होता है तथा रात्रि का अन्धकार भयदायक, मोह तथा दिशाओं के विषय में भ्रम उत्पन्न करने वाला, पित्त और कफ को दूर करने वाला, कामवर्धक एवं शरीर में क्लान्ति उत्पन्न करने वाला होता है ॥२७७-२७८॥ अथ रात्रौ भोजनस्य समयं परिमाणं चाह— रात्रौ च भोजनं कुर्यात्प्रथमप्रहरान्तरे। किञ्चिदूनं समश्नीयाद् दुर्जरं तत्र वर्जयेत् ॥२७९॥ रात्रि भोजन का विधान—रात्रि में प्रथम प्रहर के मध्य में ही दिन की अपेक्षा कुछ कम भोजन करना चाहिये, उसमें जो देर में पचने वाला आहार हो उसे नहीं खाना चाहिये ॥२७९॥ अथ मैथुनमाह, तत्रादौ मैथुनेच्छायां सत्यामपि तदकरणे दोषानाह— शरीरे जायते नित्यं देहिनः सुरतस्पृहा। अव्यावायान्मेह मेदोवृद्धिः शिथिलता तनोः ॥२८०॥ इच्छा होने पर मैथुन न करने से दोष—मनुष्यों के शरीर में प्रायः मैथुन करने की इच्छा नित्य ही उत्पन्न होती है, किन्तु जब प्रबल इच्छा हो उस समय यदि मैथुन न किया जाय तो उससे प्रमेह तथा मेद की वृद्धि और शरीर में शिथिलता होती है ॥२८०॥ अथ स्त्रीणां बालाद्यवस्थानामवधिमाह— बालेति गीयते नारी यावद्वर्षाणि षोडश। ततस्तु तरुणी ज्ञेया द्वात्रिंशद्वत्सरावधि ॥२८१॥ स्त्रियों की बालादि अवस्था का विचार—स्त्रियाँ १६ वर्ष तक 'बाला' उसके बाद ३२ वर्ष तक 'तरुणी' कहलाती हैं ॥२८१॥ तदूर्ध्वमधिरूढा स्यात्पञ्चाशद्वत्सरावधि। वृद्धा तत्परतो ज्ञेया सुरतोत्सववर्जिता ॥२८१॥ तदुपरान्त ५० वर्ष तक प्रौढ़ा तथा उसके बाद वृद्धा कहलाती हैं और उस समय उनके हृदय में कामचेष्टा बहुत कम होती है अतः सुन्दर रति के लिये वे त्याज्य हैं ॥२८२॥ अधिरूढा=प्रौढ़ा ॥२८२॥ 'अधिरूढा' का 'प्रौढ़ा' अर्थ समझना चाहिये ॥२८२॥ अथ बालाऽऽदिस्त्रीणां सेवनस्य समयं फलञ्चाह— निदाघशरयोर्बाला हिता विषयिणां१ मता। तरुणी शीतसमये प्रौढा वर्षावसन्तयोः ॥२८३॥ नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्धयते बलम्। तरुणी ह्रासयेच्छक्तिं प्रौढोद्भावयते जराम् ॥२८४॥ बाला, तरुणी और प्रौढ़ा स्त्री सेवन का समय—विषयी पुरुषों के लिये ग्रीष्म तथा शरद् ऋतु में 'बाला', शीतकाल में 'तरुणी' और वर्षा तथा वसन्त ऋतु में 'प्रौढ़ा' स्त्री हितकारिणी मानी गई हैं। यदि नित्य 'बाला' स्त्री का सेवन किया जाय तो वह नित्य बल को बढ़ाती हैं, किन्तु नित्य सेवन करने से 'तरुणी' स्त्री शक्ति का ह्रास करती हैं तथा नित्य सेवन करने से 'प्रौढ़ा' स्त्री पुरुष को वृद्धावस्था उत्पन्न करके वृद्ध बना देती है ॥२८३-२८४॥ १. 'विषयिणी'ति पा. अयुक्तम्।
१५० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ सेवनेन सद्यः प्राणकराणि द्रव्याण्याह- सद्यो मांसं नवं चान्नं बाला स्त्री क्षीरभोजनम् । घृतमुष्णोदके स्नानं सद्यःप्राणकराणिषट् ।।२८५।। सद्यः बल उत्पन्न करने वाले पदार्थ-(१) ताजा मांस, (२) नवीन अन्न, (३) बाला स्त्री, (४) दूध तथा (५) घृत का भोजन और (६) उष्णजल से स्नान ये छः पदार्थ सद्यःप्राण (बल) उत्पन्न करने वाले होते हैं ।।२८५।। ❖ प्राणशब्दोऽत्र बलवाचकः ।।२८५।। 'प्राण' शब्द यहाँ 'बल' का वाचक है ।।२८५।। अथ सेवनेन सद्यः प्राणहराणि द्रव्याण्याह- पूतिमांसं स्त्रियो वृद्धा बालार्कस्तरुणं दधि । प्रभाते मैथुनं निद्रा सद्यःप्राणहराणि षट् ।।२८६।। सद्यः बल को हरण करने वाले पदार्थ-(१) दुर्गन्धियुक्त मांस, (२) वृद्धा स्त्री, (३) कन्याराशिस्थित सूर्य की धूप, (४) तत्काल का जमाया हुआ दही, (५) प्रातः काल का मैथुन और (६) प्रातः काल में सोते रहना ये छः पदार्थ सेवन करने पर प्राण (बल) के हरण करने वाले होते हैं ।।२८६।। ❖ बालार्कः=कन्यार्कः ।।२८६।। 'बालार्कः' से 'कन्याराशिस्थित (क्वार का) सूर्य की धूप, यह अर्थ समझना चाहिये ।।२८६।। अथ वृद्धस्य तरुणीगमने तरुणस्य च वृद्धागमने फलमाह- वृद्धोऽपि तरुणीं गत्वा तरुणत्वमवाप्नुयात् । वयोधिकां स्त्रियं गत्वा तरुणः स्थविरायते ।।२८७।। तरुणी और वृद्धा स्त्रीसंभोग का फल-वृद्ध पुरुष यदि तरुणी स्त्री के साथ भोग करे तो वह भी तरुण हो जाता है और तरुण पुरुष यदि वृद्धा स्त्री के साथ संभोग करे तो वह भी वृद्ध की भाँति हो जाता है ।।२८७।। अथ नियमपूर्वक स्त्रीगमने गुणानाह- आयुष्मन्तो मन्दजरा वपुर्वर्णबलान्विताः । स्थिरोपचितमांसाश्च भवन्ति स्त्रीषु संयताः ।।२८८।। नियम पूर्वक स्त्री संभोग के गुण-जो लोग स्त्रियों के विषय में संयत भाव से रहते हैं अर्थात् नियम पूर्वक स्त्रीगमन करते हैं, वे दीर्घ आयुवाले होते हैं तथा उन्हें वृद्धावस्था धीरे-धीरे देर में आती है और उनके शरीर का वर्ण और बल देर तक बना रहता है तथा मांस की दृढ़ता तथा वृद्धि भी चिरकाल तक बनी रहती है ।।२८८।। अथर्तुभेदेन स्त्रीसेवनप्रकारमाह- सेवेत कामतः कामं बलाद्वाजीकृतो हिमे । प्रकामं तु निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ।।२८९।। ऋतु भेद से स्त्री सेवन का प्रकार-हेमन्त (अगहण तथा पौष) ऋतु में तो वाजीकरण औषधियाँ खाकर बलानुसार किन्तु शिशिर (माघ व फागुन) ऋतु में तो यथेच्छ स्त्री सेवन करना चाहिये ।।२८९।। अथ वसन्तादिष्वृतुषु कियता कालेन स्त्री सेवनं युक्तमित्याह- त्र्यहाद्वसन्तशरदोः पक्षाद् दृष्टिनिदाघयोः ।।२९०।। वसन्तादि ऋतुओं में स्त्रीसेवन के मध्यन्तर काल-वसन्त तथा शरद् ऋतु में तीन-तीन दिन के बाद और वर्षा तथा ग्रीष्म ऋतु में एक-एक पक्ष (१५ दिन) के बाद स्त्री सम्भोग करना चाहिये ।।२९०।। सुश्रुतस्तु- त्रिभिस्त्रिभिरहोभिर्हि समेयात्प्रमदां नरः । सर्वेष्वृतुषु धर्मे तु पक्षात्पक्षाद् व्रजेद् बुधः ।।२९१।।
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५१ इस विषय में 'सुश्रुत' का मत है कि—सभी ऋतुओं में तीन-तीन दिन के बाद और ग्रीष्म ऋतु में एक-एक पक्ष के बाद स्त्रीसङ्ग करे ॥२९१॥ क्वसमेयातसंगच्छेत्। घर्मे = ग्रीष्मे ॥२९१॥ 'समेयात्' का 'स्त्रीसङ्ग करे' और 'धर्मे' का 'ग्रीष्म ऋतु में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२९१॥ अथर्तुभेदेन स्त्रीसेवनसमयभेदमाह- शीते रात्रौ दिवा ग्रीष्मे वसन्ते तु दिवा निशि। वर्षासु वारिदध्वाने शरत्सु सरसः १स्मरः ॥२९२॥ ऋतुभेद से स्त्रीसेवन के समय—शीतकाल में रात्रि में, ग्रीष्म ऋतु में दिन में, वसन्त ऋतु में दिन या रात्रि दोनों ही में, वर्षा ऋतु में जब बादल गरजे तब अन्य ऋतु में जब काम की प्रबलता हो तभी सम्भोग करना चाहिये ॥२९२॥ अथ स्त्रीसेवननिषिद्धसमयमाह- उपेयात्पुरुषो नारीं संध्ययोर्न च पर्वसु। गोसर्गे चार्द्धरात्रे च तथा मध्यदिनेऽपि च ॥२९३॥ स्त्रीसम्भोग का निषिद्ध समय—प्रातः और सायं की सन्ध्या, पर्व-दिन (अमावस्या, पूर्णिमा आदि तिथि विशेष), गोसर्ग (गौओं को चराने के लिये प्रातः काल छोड़ने के समय), आधीरात तथा मध्याह्न (दोपहर) इन सब समयों में स्त्री के साथ सम्भोग नहीं करना चाहिये ॥२९३॥ अथ स्त्रीसेवनयोग्यस्थानमाह- विहारं भार्यया कुर्याद् देशेऽतिशयसंवृते। रम्ये श्राव्याङ्गनागाने सुगन्धे सुखमारुते ॥२९४॥ स्त्रीसम्भोग करने योग्य स्थान—अत्यन्त गुप्त अर्थात् जहाँ किसी दूसरे व्यक्ति की दृष्टि न पड़ती हो तथा रम्य और जहाँ पर स्त्रियों का सुमधुर गान सुनाई पड़ता हो एवं सुगन्धित तथा सुखकर वायु बह रही हो ऐसे स्थानों में स्त्री के साथ विहार (सम्भोगादि) कार्य करना चाहिये ॥२९४॥ अथ स्त्रीसेवनअयोग्यस्थानमाह- देशे गुरुजनासन्ने विवृतेऽतित्रपाकरे। श्रूयमाणे व्यथाहेतुवचने न रमेत ना ॥२९५॥ स्त्रीसम्भोग के अयोग्य स्थान—जो स्थान गुरुजनों के स्थान के निकट हो तथा लोगों की दृष्टि पड़ने के लायक हो तथा अत्यन्त लज्जा उत्पन्न करनेवाला हो और जहाँ पर मन में व्यथा पहुँचाने वाले वचन सुनाई पड़ते हों ऐसे स्थान में स्त्री सम्भोग नहीं करना चाहिये ॥२९५॥ अथ स्त्रीसेवनकालिकपुरुषाणां वेषादिकमाह- स्नातश्चन्दनलिप्ताङ्गः सुगन्धः सुमनोऽन्वितः। भुक्तवृष्यः सुवसनः सुवेषः समलंकृतः ॥२९६॥ ताम्बूलवदनः पत्यामनुरक्तोऽधिकस्मरः। पुत्रार्थी पुरुषो नारीमुपेयाच्छयने शुभे ॥२९७॥ स्त्रीसंभोग करने के समय पुत्रार्थी पुरुषों का वेषादि—पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पुरुष स्नान करके शरीर में चन्दन, इत्र आदि सुगन्धित द्रव्य लगा कर, प्रसन्न चित्त से वीर्यवर्धक पदार्थ खाये हुये, सुन्दर वस्त्र तथा सुन्दर वेष से भलीभाँति अलङ्कृत होकर मुख में पान का बीड़ा रखे हुये, पत्नी के विषय में अनुरक्त होकर अधिक काम चेष्टा से युक्त सुन्दर शय्या पर स्त्री के साथ सम्भोग करे ॥२९६-२९७॥ अथ मैथुनानर्हपुरुषानाह- अत्याशितोऽधृतिःक्षुद्वान्सव्यथाङ्गः पिपासितः। बालो वृद्धोऽन्यवेगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ॥२९८॥ मैथुन करने के अयोग्य पुरुष—अत्यन्त भोजन किया हुआ, काम से अधीर चित्त वाला, भूखा, अङ्ग पीड़ा से युक्त, प्यासा, बालक, वृद्ध, मूत्रादि वेगसे युक्त अथवा रोगी पुरुष को मैथुन नहीं करना चाहिये ॥२९८॥ १. 'सरसी' ति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१५२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ रोगी=मैथुनसंवर्जनीयरोगयुक्तः ।।२९८।। 'रोगी' अर्थात् 'जिस रोग में मैथुन करना वर्जित हो उस रोग से युक्त' रोगी ।।२९८।। अथ मैथुनयोग्याः स्त्रियःआह- भार्यां रूपगुणोपेतां तुल्यशीलां कुलोद्भवाम् । अतिकामोऽभिकामां तु हृष्टो हृष्टामलंकृताम् ।। सेवेत प्रमदां युक्त्या वाजीकरणबृंहितः ।। २९९ ।। मैथुन के योग्य स्त्री—वाजीकरण ओषधियों से मैथुन करने में विशेष शक्ति को प्राप्त कर रूप और सद्गुणों से युक्त, अपने समान शीलवाली, अच्छे कुल में उत्पन्न अत्यन्त कामासक्त, प्रसन्न चित्तवाली और अलङ्कारों से युक्त स्त्री के साथ विधिपूर्वक संभोग करना चाहिये ।।२९९ ।। अथ मैथुनायोग्याः स्त्रियःआह- रजस्वलामकामां च मलिनामप्रियां तथा ।। ३०० ।। वर्णवृद्धां वयोवृद्धां तथा व्याधिप्रपीडिताम् । हीनाङ्गीं गर्भिणीं द्वेष्यां योनिरोगसमन्विताम् ।। ३०१ ।। सगोत्रां गुरुपत्नीं च तथा प्रव्रजितामपि । नाधिगच्छेत् पुमान्नारीं भूरिवैगुण्यशङ्कया ।। ३०२ ।। मैथुन के अयोग्य स्त्री—रजस्वला, काम चेष्टा से हीन, मलिन वेषवाली, मनको प्रिय न लगने वाली, अपने से बड़ी जाति व अवस्था वाली, रोग से पीड़ित, हीन अङ्गोंवाली, गर्भिणी, द्वेष्या (द्वेष करने वाली), योनिसम्बन्धी रोग वाली, अपने गोत्र में उत्पन्न हुई, गुरुकी पत्नी तथा संन्यास ग्रहण किये हुई स्त्रियों के साथ पुरुष को कभी संभोग न करना चाहिये क्योंकि ऐसी स्त्रियों के साथ संभोग करने से हानि होती है ।।३००-३०२।। अथ पुनर्विशेषेण रजस्वलागमने दोषनाह- रजस्वलो गतवतो नरस्यासंयतात्मनः । दृष्ट्यायुस्तेजसां हानिरधर्मश्च ततो भवेत् ।। ३०३ ।। रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करने से दोष—जो पुरुष इन्द्रिय के वशीभूत होकर रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करते हैं उनकी दृष्टि, आयु तथा तेज की हानि और अधर्म भी होता है ।।३०३।। अथ पुनर्विशेषेण सन्यासिन्यादीनां स्त्रीणां गमने पर्वसु च स्त्रीगमने दोषमाह- लिंगिनीं गुरुपत्नीं च सगोत्रामथ पर्वसु । वृद्धां च सन्ध्ययोश्चापि गच्छतो जीवनक्षयः ।। ३०४ ।। संन्यासिनी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में दोषान्तर—संन्यास ग्रहण किये हुई, गुरु की पत्नी, अपने गोत्र में उत्पन्न हुई तथा वृद्धा स्त्रियों के साथ संभोग करने से तथा पर्व (अमावास्यादि विशेष तिथियों) में एवं दोनों काल की सन्ध्याओं में स्त्री गमन करने वाले पुरुष की आयु नष्ट होती हैं ।।३०४।। ❖ लिङ्गिनीं=प्रव्रजिताम् ।। ३०४ ।। 'लिङ्गिनी' पद का अर्थ है 'प्रव्रजिता अर्थात् संन्यास ग्रहण किये हुई ।।३०४।। अथ पुनर्विशेषेण गर्भिण्यादिषु गमने प्रकाशे स्त्रीसेवने च दोषानाह- गर्भिण्यां गर्भपीडा स्याद्व्याधितायां बलक्षयः ।। ३०५ ।। हीनाङ्गीं मलिनां द्वेष्यां क्षामां बन्ध्यामसंवृते । देशेऽभिगच्छतो रेतः क्षीणं म्लानं मनो भवेत् ।। ३०६ ।। गर्भिणी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में दोषान्तर—गर्भिणी स्त्रियों के साथ संभोग करने से गर्भ को पीड़ा होती है, रोगिणी स्त्रियों के साथ गमन करने से बल का क्षय होता है। तथा हीन अङ्गवाली, मैली-कुचैली रहनेवाली,
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५३ द्वेष्या (द्वेष करनेवाली), दुबली-पतली या बन्ध्या स्त्री के साथ अथवा खुले बेपर्द स्थान में स्त्रीगमन करने से पुरुषों का वीर्य क्षीण तथा मन म्लान हो जाता है ॥३०५-३०६॥ ❖ गर्भिणीं गर्भवासदिवसाद् द्वितीये मासि गर्भस्थितेरनिश्चये यथोक्तनक्षत्रादिलाभाभावे वा तृतीये मासि पुंसवने कृते नाभिगच्छेत्। यतो पुंसवनानन्तरमाह व्यासः- ततस्त्यजेन्नदीतीरं देवखातोदकं तथा । भर्तुः शय्यां मृतापत्यां तथैवामिषभोजनम् ।।४।। 'गर्भिणी' अर्थात् गर्भ की स्थिति होने के दिन से दूसरे मास में अथवा गर्भस्थिति का अनिश्चय होने पर किंवा जैसा चाहिये वैसा ज्योतिः शास्त्रोक्त पुंसवन के योग्य नक्षत्रादि के न मिलने पर तीसरे मास में पुंसवन संस्कार हो चुकने पर गर्भिणी स्त्री का सङ्ग नहीं करना चाहिये। 'पुंसवन' के बाद गर्भिणी स्त्रियों के लिए व्यास का मत है कि—पुंसवन संस्कार हो चुकने के बाद गर्भिणी स्त्री नदी के तीर पर जाना, प्राकृतिक जलाशयों का जल पीना, पति की शय्या पर सोना अर्थात् मैथुन करना, मरी हुई सन्तान वाली स्त्रियों का साथ तथा मांस भोजन करना छोड़ देवे ॥४॥ ❖ अन्यच्च— आमिषस्याशनं यत्नात्प्रमदा परिवर्जयेत्। देवारामनदीयानं प्रयोगं पुरुषस्य च ।।५।। इति ।। ३०५-३०६।। और भी कहा है कि—गर्भिणी स्त्री मांस का भोजन एवं देवमन्दिर, बगीचा तथा नदी पर जाना तथा पुरुष के साथ सहवास, इन सब कर्मों का यत्नपूर्वक परित्याग कर देवे ॥५॥३०५-३०६॥ अथ बुभुक्षितादीनां पुरुषाणां स्त्रीसंभोगे मध्याह्ने स्त्रीसेवने च दोषानाह- क्षुधितः क्षुब्धचित्तश्च मध्याह्नेतृषितोऽबला । स्थितस्य हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ।।३०७।। भूखे प्यासे आदि होकर तथा मध्याह्न में स्त्रीसङ्ग करने से दोष—जो पुरुष भूखा हो अथवा जिसको क्षोभ प्राप्त हुआ हो या जो प्यासा अथवा निर्बल हो वह यदि स्त्रीसंभोग करे अथवा जो मध्याह्न में स्त्री प्रसङ्ग करे उसके अन्दर रहनेवाले शुक्र की हानि तथा वायु का कोप होता है ॥३०७॥ अथ व्याधितस्य पुंसस्तथा प्रत्यूषादिसमये स्त्रीगमने दोषानाह- व्याधितस्य रुजा श्लीहा मूर्च्छा मृत्युश्च जायते । प्रत्यूषे चार्थरात्रे च वातपित्ते प्रकुप्यतः ।।३०८।। रुग्णावस्था या प्रातः काल में स्त्रीसंभोग से दोष—रोगी पुरुष यदि स्त्री प्रसङ्ग करे तो उसे पीड़ा, प्लीहा रोग तथा मूर्च्छा होती है और अन्त में मृत्यु तक भी हो जाती है। एवं जो पुरुष प्रत्यूष अर्थात् सूर्योदय के पूर्व अथवा आधीरात में स्त्रीप्रसङ्ग करता है उस के वात तथा पित्त कुपित हो जाते हैं ॥३०८॥ अथ तिर्यगादियोनौ मैथुने दोषानाह- तिर्यग्योनावयोनौ वा दुष्टयोनौ तथैव च । उपदंशस्तथा वायोः कोपः शुक्रसुखक्षयः ।।३०९।। पशु आदि की योनि में मैथुन करने के दोष—पशु की योनि अथवा अयोनि (गुदा वा कृत्रिम योनि) में एवं वातादि दोषों से दूषित योनि में मैथुन करने से उपदंश (गर्मी, सुजाक) या वायु का कोप, किंवा वीर्य तथा सुख का क्षय होता है ॥३०९॥ अथ मलमूत्रयोर्वेगावस्थायां मैथुने चलितशुक्रधारणे । विपरीत मैथुने च दोषमाह- उच्चारिते मूत्रिते च रेतसश्च विधारणे । उत्ताने च भवेच्छीघ्रं शुक्राश्मर्यास्तु सम्भवः ।।३१०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे वेग रोकने से या विपरीत मैथुन करने से दोष—मल या मूत्र के वेगको रोककर मैथुन करने से तथा उत्तान होकर (विपरीत) मैथुन करने से अथवा मैथुनके समय शुक्र के वेग को रोकने से शीघ्र ही शुक्राश्मरी (वीर्य की पथरी) नामक रोग उत्पन्न होने की सम्भावना हो जाती है ॥३१०॥ अथ पुनर्विशेषेणोपस्थितशुक्रधारणनिषेधमाह— सर्वमेतत्त्यजेत्तस्माद्यतो लोकद्वयाहितम्। शुक्लं तूपस्थितं मोहान्न सन्धार्यं कदा चन ।।३११।। स्खलित होते हुये शुक्र के रोकने का निषेध—पूर्वोक्त इन सब बातों को मैथुन करने में छोड़ दे क्योंकि न छोड़ने से दोनों लोक में उसका अहित होता है और उन सबों में विशेष कर उपस्थित शुक्र का धारण तो भूल से भी कभी न करे ॥३११॥ अथ सुरतान्ते हितकराणि द्रव्याण्याह— स्नानं सशर्करं क्षीरं भक्ष्यमैक्षवसंस्कृतम् । वातो मांसरसः स्वप्नः सुरतान्ते हिता अमी ।।३१२।। मैथुन करने के बाद हितकारक द्रव्य—स्नान, शक्कर (चीनी) मिला हुआ दूध, शक्कर मिला हुआ (मीठा) भोजन, वायु सेवन, मांस-रस (शुरुवा) और नींद से सो जाना ये सब कार्य मैथुन करने के बाद हितकर होते हैं ॥३१२॥ अथातिव्यवायजान् रोगानाह— शूलकासज्वरश्वासकार्श्यपाण्ड्वालयक्षयः । अतिव्यवायाज्जायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः ।।३१३।। अत्यन्त मैथुन करने से होनेवाले रोग—अत्यन्त मैथुन करने से शूल, खाँसी, ज्वर, श्वास (दमा), कृशता, पाण्डु, क्षय तथा आक्षेपक आदि रोग उत्पन्न होते हैं ॥३१३॥ अथ रात्रिनिद्राजागरणयोर्गुणानाह— रात्रौ जागरणं रूक्षं कफदोषविषार्त्तिजित् । निद्रा तु सेविताकाले धातुसाम्यमतन्द्रिताम् ।।३१४।। पुष्टिं वर्णं बलोत्साहं वह्निदीप्तिं करोति हि ।।३१५।। रात्रि में सोने तथा जागने के गुण-दोष—रात्रि में जागना रूक्षताकारक तथा कफ-दोष व विष-सम्बन्धी पीड़ा का हरण करनेवाला है और समय पर निद्रा-सेवन करना (नींद से सो जाना) धातुओं की समता, तन्द्रा का न आना, पुष्टि, वर्ण, बल, उत्साह और जठराग्नि की दीप्ति इन सबों को करता है ॥३१४-३१५॥ अथ सुखपूर्वकनिद्रालाभार्थमौषधमाह— यो लेढि शयनसमये मधुमित्रं बीजपूरदलचूर्णम् । स तु १ लज्जाकरवातप्रसरनिरोधात्सुखं स्वपिति ।।३१६।। सुखपूर्वक नींद आने के लिये औषध—जो सोने के समय बिजौरा नींबू के पत्ते का चूर्ण मधु के साथ खाता है, उसकी लज्जा पैदा करनेवाली अधोवायु का वेग रुक जाता है और वायु शमन होने से वह सुखपूर्वक सोता है ॥३१६॥ अथोषःकाले जलपानगुणानाह— सवितुः समुदयकाले प्रसृतीः सलिलस्य पिबेदष्टौ । रोगजरापरिमुक्तो जीवेद्वत्सरशतं साग्रम् ।।३१७।। उषाकाल (सूर्योदय के पूर्व) जल पीने के गुण—सूर्य के उदय होने के आसन्न समय में जो आठ प्रसृति (पसर)
अथ पञ्चमं दिनचर्यादिप्रकरणम् १५५ ❖ अस्य जलपानस्योपक्रमकालो१ रात्रेश्चतुर्थप्रहरे प्रवेश । तथा च भोजः- पिबति पर्युषितं जलमन्वहं तिमिरिणी चरमे प्रहरे यदि ।। ६ ।। इति जलपान के प्रारम्भ करने का काल रात्रि के चौथे प्रहर से ही आरम्भ हो जाता है। क्योंकि इस विषय में 'भोज' का भी यह मत है कि 'यदि कोई रात्रि के अन्तिम प्रहर में नित्य बासी जल पीता है' इत्यादि ।। ६ ।। ❖ एतज्जुलपानकालमर्यादा सूर्योदयातिसन्निहितप्राक्२ कालः। तथा च तन्त्रान्तरे- अम्भसः प्रसुतीरष्टौ रवाननुदिते पिबेत्। वातपित्तकफाञ्जित्वा जीवेद्वर्षशतं सुखी ।। ७ ।। इति । इस जलपान के समय की मर्यादा सूर्योदय से अत्यन्त सन्निकट पूर्वका ही काल है। इसी विषय में दूसरे ग्रन्थ में भी लिखा है कि—'सूर्य उदय होने के पहले ही जो आठ पसर जल पीता है वह बात, पित्त तथा कफ सम्बन्धी विकारों को हटाकर सुखपूर्वक सौ वर्ष तक जीता है' ।। ७ ।। ❖ सलिलस्यात्र पर्युषितस्य ग्रहणं भोजनवचनानुरोधात् ।। ३१७ ।। यहाँ पर जल से बासी जल का ग्रहण पूर्वोक्त 'भोज' के वचन के अनुरोध से ही किया जाता है। अर्शःशोथग्रहण्यो ज्वरजठरजराकुष्ठमेदोविकारामूत्राघातास्रपित्तश्रवणगलशिरः श्रोणिशूलाक्षिरोगाः । ये चान्ये वातपित्तक्षतजकफकृता व्याधयः सन्ति जन्तो स्तांस्तानभ्यासयोगादपहरति पयः पीतमन्ते निशायाः ।। ३१८ ।। बवासीर, शोथ, ग्रहणी, ज्वर रोग, उदर-जरा-कोढ़ तथा मेद सम्बन्धी विकार और मूत्राघात, रक्तपित्त एवं कान- गला-शिर और कमर के शूल तथा नेत्र सम्बन्धी रोग अथवा इनके अतिरिक्त अन्य भी जो-जो बात-पित्त-कफ और क्षत से होने वाले रोग होते हैं वे सभी रात्रि के अन्त में जल पीने का अभ्यास करने से दूर हो जाते हैं ।। ३१८ ।। अथोषःकाले नासावारिपानगुणानाह- विगतघननिशीथे प्रातरुत्थाय नित्यं पिबति खलु नरो यो घ्राणरन्ध्रेण वारि । स भवति मतिपूर्णश्चक्षुषा तार्क्ष्यतुल्यो वलिपलितविहीनः सर्वरोगैर्विमुक्तः ।। ३१९ ।। उषःकाल में नासिका से जल पीने के गुण—जब रात्रि का घना अन्धकार दूर हो अर्थात् प्रातः काल हो जाय तब उठकर जो मनुष्य नित्य नासिका से जलपान करता है वह निश्चय ही बुद्धि से पूर्ण होता है यथा उसके नेत्रों की दर्शन शक्ति गरुड़ के तुल्य होती है तथा बली और पलित रोगों से हीन होकर वह सब रोगों से मुक्त हो जाता है ।। ३१९ ।। ❖ निशीथोऽत्र=निशान्धकारः ।। ३१९ ।। 'निशीथ' से यहाँ 'रात्रिका अन्धकार' समझना चाहिये ।। ३१९ ।। अथ नासाजलपाने जलपरिमाणमाह- पातव्यं नासया नीरं प्रसुतित्रयमात्रया ।। ३२० ।। नासाजलपान में जलका परिमाण—मनुष्य को नासिका के द्वारा तीन प्रसुति (पसर) प्रमाण जल पीना चाहिये ।। ३२० ।। अथ पुनर्विशेषेण नासाजलपाने गुणानाह- व्यङ्गवलीपलितघ्नं पीनसवैस्वर्यकासशोथहरम् । रजनीक्षयेऽम्बुनस्यं रसायनं दृष्टिसञ्जननम् ।। ३२१ ।। १. 'काले' इति पा. । २. 'प्राप्त' इति पा. ।
१५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नासा जलपान के विशेष गुण—रात्रि व्यतीत होने पर नासा से जलपान करना व्यङ्ग (झाँई), बली, पलित, पीनस, स्वरभङ्ग, खाँसी और शोथ इन सब रोगों को दूर करता है तथा रसायन और दर्शनशक्ति को बढ़ाने वाला होता है ॥३२१॥ अथ नासावारिपानानर्हजनानाह- स्नेहे पीते क्षते शुद्धावाध्माने स्तिमितोदरे । हिक्कायां कफवातोत्थे व्याधौ तद्वारि वारयेत् ।।३२२।। नासा जलपान के अयोग्यजन—जो स्नेह पान किये हों या जिन्हें क्षत हो गया हो अथवा जिन्होंने वमन या विरेचन द्वारा तत्काल में शरीर की शुद्धि की हो या जिन्हें उदर में आध्मान (अफरा) हो गया हो या पेट में स्तिमित हो गया हो अर्थात् मन्दाग्नि हो गई हो या जो हिचकी और कफ तथा वात से होनेवाली व्याधियों से युक्त हों उन्हें उस जल का पान नहीं करना चाहिये ॥ ❖ तद्वारि नासा पेयम् ।।३२२।। 'तद्वारि' अर्थात् 'नासिका द्वारा पिये जानेवाले जलका' ।।३२२।। अथर्तुचर्यामाह । तत्रादौ नामनिर्देशपूर्वकमृतुषट्कमाह- क्षयकोपशमा१ यस्मिन्दोषाणां सम्भवन्ति हि । ऋतुषट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु संक्रमात् ।।३२३।। ऋतुभेद और ऋतुचर्या—जिस समय दोषों की वृद्धि, कोप तथा शमन हुआ करता है, उस समय को ऋतु कहते हैं और वह रवि के मेषादि बारह राशियों में भ्रमण करने से छः प्रकार का होता है ।।३२३।। ग्रीष्मौ मेषवृषौ प्रोक्तः प्रावृण्मिथुनकर्कटौ । सिंहकन्ये स्मृता वर्षा तुलावृश्चिकयोः शरत् ।।३२४।। धनुर्ग्राहौ च हेमन्तो वसन्तः कुम्भमीनयोः ।।३२५।। जब सूर्य मेष तथा वृष राशि तक रहते हैं तब ग्रीष्म और जब मिथुन तथा कर्क तक होते हैं तब प्रावृट, इसी प्रकार सिंह से कन्या तक वर्षा तुला से वृश्चिक तक शरद, धनु से मकर तक हेमन्त और कुम्भ से मीन तक वसन्त ऋतु कहलाता है ॥३२४-३२५॥ मेषवृषौ रविणा संक्रान्तौ । एवं मिथुनकर्कटावित्यादि ।।३२४-३२५।। 'मेषवृषौ' पद से 'रवि से संकान्त मेष और वृष' इसी प्रकार 'मिथुनकर्कटौ' इत्यादि का भी अर्थ समझना चाहिये ।।३२४-३२५।। अन्ये तु- शिशिरः पुष्पसमयो ग्रीष्मो वर्षा शरद्धिमाः । माघादिमासयुग्मैः स्युऋर्तवः षट् क्रमादमी ।।३२६।। ऋतुओं के विषय में अन्य मत—शिशिर वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् और हेमन्त ये छः ऋतु माघ से लेकर दो-दो महीने के एक-एक ऋतु क्रम से होते हैं, जैसे—माघ-फाल्गुन शिशिर, चैत्र-वैशाख वसन्त, ज्येष्ठ-आषाढ़ ग्रीष्म, श्रावण-भाद्रपद वर्षा, आश्विन-कार्तिक शरद् और अगहनपौष हेमन्त ऋतु है ।।३२६।। अथर्तुषट्कनामविषयकमतभेदे हेतुमाह- गङ्गाया दक्षिणे देशे वृष्टेर्बाहुलभावतः । उभौ मुनिभिराख्यातौ प्रावृड्वर्षाभिधावृतू ।।३२७।। १. 'समा' इति पा. ।