भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ दिवास्त्रीसंगनिषेधमाह- आयुःक्षयभयाद्विद्वान्न्राहि सेवेत कामिनीम्। अवशो यदि सेवेत १तदा ग्रीष्मवसन्त्योः ॥२३४॥ दिन में स्त्री सम्भोग का निषेध—बुद्धिमान् लोग आयु नाश होने के भय से दिन में स्त्री के साथ भोग न करें, यदि अवश होकर करना ही चाहें तो ग्रीष्म तथा वसन्त ऋतु में किसी-किसी दिन कर सकते हैं ॥२३४॥ ❖ अवशः=अजितेन्द्रियः ।।२३४।। 'अवश' का 'इन्द्रियों के वशीभूत' (कामुक) अर्थ समझना चाहिये ।।२३४।। अथोपवेशनाटनादिगुणानाह- आस्या वर्णकफस्थौल्यसौकुमार्यसुखप्रदा। अध्वा वर्णकफस्थौल्यसौकुमार्यविनाशनः ।।२३५।। यत्तु चंक्रमणं नातिदेहपीडाकरं भवेत्। तदायुर्बलमेधाऽग्निप्रदमिन्द्रियबोधनम् ।।२३६।। बैठे रहने, रास्ता चलने एवं धीरे धीरे टहलने के गुण-दोष—कहीं पर जाना-आना न करके केवल स्थिर भाव से एक स्थान पर बैठे रहने से शरीर का अच्छा वर्ण, कफ की वृद्धि, देह की स्थूलता, सुकुमारता और सुख होता है और अधिक पैदल चलने से इसकें विपरीत देह के वर्ण, स्थूलता, सुकुमारता तथा कफ इन सबों का नाश होता है तथा चङ्क्रमण (धीरे-धीरे टहलने) से देह में विशेष पीड़ा का अभाव और आयु, बल, मेधा तथा जठराग्नि एवं सम्पूर्ण इन्द्रियों की शक्ति की भी वृद्धि होती है ।।२३५-२३६।। अथोष्णीषधारणगुणानाह- उष्णीषं कान्तिकृत्केश्यं रजोवातकफापहम्। लघु यच्छस्यते तस्माद् गुरु पित्ताक्षिरोगकृत् ।।२३७।। पगड़ी, मुरेठा आदि धारण करने के गुण-दोष—मस्तक पर उष्णीष (पगड़ी, साफा आदि) कान्ति की वृद्धि करने वाला, केश के लिये हितकारी, धूलि को दूर करने वाला अर्थात् धूलि से बालों को बचाने वाला और वात तथा कफ का नाशक होता है। परन्तु ये सब उत्तम गुण तभी होते हैं जब कि वह हल्का हो। यदि उष्णीष भारी हुआ तो पित्त की वृद्धि और नेत्र सम्बन्धी रोग को उत्पन्न करने वाला होता है ।।२३७।। अथोपानद्धारणगुणानाह- उपानद्धारणं नेत्र्यमायुष्यं पादरोगहृत्। सुखप्रचारमोजस्यं वृष्यं च परिकीर्त्तितम् ।।२३८।। जूता पहनने के गुण—जूता पहनना नेत्र तथा आयु के लिये हितकर, पैर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, चलने फिरने में सुख देने वाला, ओजोवर्धक और वृष्य (बल तथा पुष्टिका वर्धक) है ।।२३८।। अथानुपानद्भ्यां पादाभ्यां चंक्रमणे दोषानाह- पादाभ्यामनुपानद्भ्यां सदा चंक्रमणं नृणाम्। अनारोग्यमनायुष्यमिन्द्रियघ्नमदृष्टिदम् ।।२३९।। जूता न पहनने से अवगुण—बिना जूता पहने केवल पैदल सदा यातायात करना मनुष्यों के लिये आरोग्यता और आयु को नष्ट करने वाला एवं इन्द्रियों की तथा देखने की शक्ति का नाश करने वाला होता है ।।२३९।। अथ छत्रदंडधारणगुणानाह- छत्रस्य धारणं वर्षातपवातरजोऽपहम्। हिमघ्नं हितमक्ष्णोश्च मङ्गल्यमपि कीर्त्तितम् ।।२४०।। सत्त्वोत्साहबलस्थैर्यधैर्यतेजोविवर्धनम्। अवष्टम्भकरं चापि भयघ्नं दण्डधारणम् ।।२४१।। १. शीतवसन्त्योरिति पाठः।