भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४५ छाता तथा दण्ड धारण करने के गुण—छाता लगा कर चलना-वर्षा, आतप (घाम), हवा, धूलि तथा शीत से रक्षा करने वाला, नेत्रों के लिये हितकारी तथा मङ्गलप्रद होता है और दण्ड धारण करना-शक्ति, उत्साह, बल, स्थिरता, धैर्य तथा तेज का बढ़ाने वाला, सहारा देने वाला तथा भय को दूर करने वाला होता है ॥२४०-२४१॥ अथ शिविकाऽऽश्वारोहणगुणानाह- ऊर्ध्वाच्छादनसंयुक्ता शिबिका सर्ववल्लभा । तस्यामारोहणं नॄणां त्रिदोषशमकं मतम् ।। २४२ ।। वातश्लेष्मगदार्त्तानामहिता भ्रमकृत्तरिः । पित्तानिलकरो हस्ती लक्ष्म्यायुःपुष्टिवर्द्धनः ।। २४३ ।। घोटकारोहणं वातपित्ताग्निश्रमकृन्मतम् । मेदोवर्णकफघ्नं च हितं तद्बलिनां परम् ।। २४४ ।। पालकी, नौका, हाथी और घोड़े की सवारी करने के गुण—ऊपर से आवरण युक्त अर्थात् छाई हुई जो पालकी होती है, वह प्रायः सभी को प्रिय लगने वाली होती है। अतः उसमें चढ़ कर चलने से मनुष्यों के तीनों दोषों का शमन होता है। नौका पर सवार होकर जाना-वात तथा कफ रोग से पीड़ित लोगों के लिये अहितकारी तथा भ्रम (घूमटा) उत्पन्न करने वाला होता है। हाथी पर चढ़कर चलने से पित्त तथा वायु की उत्पत्ति एवं लक्ष्मी, आयु तथा पुष्टि की वृद्धि होती है। घोड़ा पर चढ़कर चलने से आयु, पित्त तथा जठराग्नि की वृद्धि एवं श्रान्ति (थकावट) की उत्पत्ति होती है तथा भेद, वर्ण और कफ का नाश होता है। घोड़े की सवारी बलवान् पुरुषों के लिये विशेष हितकर है। किन्तु दुर्बलों के लिये यह सवारी त्याज्य ही समझना चाहिये ॥२४२-२४४॥ अथातपादीनां गुणानाह, तत्रादावातपच्छायासेवनयोर्गुणानाह- आतपः स्वेदमूर्च्छाऽस्रपित्ततृष्णाक्लमाश्रमान् । दाहं विवर्णतां कुर्यादितांश्छाया व्यपोहति ।। २४५ ।। धूप तथा छाया सेवन के गुण—धूप का सेवन करना-स्वेद, मूर्छा, रक्त-पित, प्यास, क्लान्ति, श्रम, दाह तथा विवर्णता को करता है तथा छाया का सेवन इन्हीं सबों को दूर करता है ॥२४५॥ अथ वृष्टिकुहेल्योः सेवनगुणानाह- वृष्टिर्वृष्या हिमा बल्या निद्राऽऽलस्यविधायिनी । भयावहा मोहकरी कुहेलिः कफवातला ।। २४६ ।। वर्षा तथा कुहेसा के सेवन के गुण—वर्षा का सेवन वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल, बलकारक, निद्रा तथा आलस्य को उत्पन्न करने वाला होता है। और कुहेसा का सेवन भयदायक, मोह उत्पन्न करने वाला और कफ तथा वायु को बढ़ाने वाला होता है ॥२४६॥ ❖ कुहेलिः=कुआशा इति लोके ।। २४६।। ‘कुहेलिः’ का ‘कुआसा’ (कुहेसा) अर्थ करना चाहिये ॥२४६॥ अथाग्निधूमयोः सेवनगुणानाह- अग्निर्वातकफस्तम्भशीतवेपथुनाशनः । आमाभिष्यन्दशमनो रक्तपित्तप्रकोपणः ।। २४७ ।। सद्यः श्लेष्मकरो धूमो नेत्रयोरहितो भृशम् । शिरोगौरवकृच्चापि वातपित्तं च कोपयेत् ।। २४८ ।। अग्नि तथा धूप सेवन के गुण—अग्निसेवन-वायु, कफ, स्तब्धता (शरीर का जकड़ जाना) शीत और कँपकँपी को दूर करने वाला, आमाभिष्यन्दन को शमन करने वाला और रक्त-पित्त को प्रकुपित करने वाला होता है। धूम सेवन— तत्काल कफ उत्पन्न करने वाला, नेत्रों के लिये अत्यन्त अहितकर, मस्तक को भारी करने वाला और वात तथा पित्त को कुपित करने वाला होता है ॥२४७-२४८॥ १३ भाव.I