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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ दिवास्त्रीसंगनिषेधमाह- आयुःक्षयभयाद्विद्वान्न्राहि सेवेत कामिनीम्। अवशो यदि सेवेत १तदा ग्रीष्मवसन्त्योः ॥२३४॥ दिन में स्त्री सम्भोग का निषेध—बुद्धिमान् लोग आयु नाश होने के भय से दिन में स्त्री के साथ भोग न करें, यदि अवश होकर करना ही चाहें तो ग्रीष्म तथा वसन्त ऋतु में किसी-किसी दिन कर सकते हैं ॥२३४॥ ❖ अवशः=अजितेन्द्रियः ।।२३४।। 'अवश' का 'इन्द्रियों के वशीभूत' (कामुक) अर्थ समझना चाहिये ।।२३४।। अथोपवेशनाटनादिगुणानाह- आस्या वर्णकफस्थौल्यसौकुमार्यसुखप्रदा। अध्वा वर्णकफस्थौल्यसौकुमार्यविनाशनः ।।२३५।। यत्तु चंक्रमणं नातिदेहपीडाकरं भवेत्। तदायुर्बलमेधाऽग्निप्रदमिन्द्रियबोधनम् ।।२३६।। बैठे रहने, रास्ता चलने एवं धीरे धीरे टहलने के गुण-दोष—कहीं पर जाना-आना न करके केवल स्थिर भाव से एक स्थान पर बैठे रहने से शरीर का अच्छा वर्ण, कफ की वृद्धि, देह की स्थूलता, सुकुमारता और सुख होता है और अधिक पैदल चलने से इसकें विपरीत देह के वर्ण, स्थूलता, सुकुमारता तथा कफ इन सबों का नाश होता है तथा चङ्क्रमण (धीरे-धीरे टहलने) से देह में विशेष पीड़ा का अभाव और आयु, बल, मेधा तथा जठराग्नि एवं सम्पूर्ण इन्द्रियों की शक्ति की भी वृद्धि होती है ।।२३५-२३६।। अथोष्णीषधारणगुणानाह- उष्णीषं कान्तिकृत्केश्यं रजोवातकफापहम्। लघु यच्छस्यते तस्माद् गुरु पित्ताक्षिरोगकृत् ।।२३७।। पगड़ी, मुरेठा आदि धारण करने के गुण-दोष—मस्तक पर उष्णीष (पगड़ी, साफा आदि) कान्ति की वृद्धि करने वाला, केश के लिये हितकारी, धूलि को दूर करने वाला अर्थात् धूलि से बालों को बचाने वाला और वात तथा कफ का नाशक होता है। परन्तु ये सब उत्तम गुण तभी होते हैं जब कि वह हल्का हो। यदि उष्णीष भारी हुआ तो पित्त की वृद्धि और नेत्र सम्बन्धी रोग को उत्पन्न करने वाला होता है ।।२३७।। अथोपानद्धारणगुणानाह- उपानद्धारणं नेत्र्यमायुष्यं पादरोगहृत्। सुखप्रचारमोजस्यं वृष्यं च परिकीर्त्तितम् ।।२३८।। जूता पहनने के गुण—जूता पहनना नेत्र तथा आयु के लिये हितकर, पैर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, चलने फिरने में सुख देने वाला, ओजोवर्धक और वृष्य (बल तथा पुष्टिका वर्धक) है ।।२३८।। अथानुपानद्भ्यां पादाभ्यां चंक्रमणे दोषानाह- पादाभ्यामनुपानद्भ्यां सदा चंक्रमणं नृणाम्। अनारोग्यमनायुष्यमिन्द्रियघ्नमदृष्टिदम् ।।२३९।। जूता न पहनने से अवगुण—बिना जूता पहने केवल पैदल सदा यातायात करना मनुष्यों के लिये आरोग्यता और आयु को नष्ट करने वाला एवं इन्द्रियों की तथा देखने की शक्ति का नाश करने वाला होता है ।।२३९।। अथ छत्रदंडधारणगुणानाह- छत्रस्य धारणं वर्षातपवातरजोऽपहम्। हिमघ्नं हितमक्ष्णोश्च मङ्गल्यमपि कीर्त्तितम् ।।२४०।। सत्त्वोत्साहबलस्थैर्यधैर्यतेजोविवर्धनम्। अवष्टम्भकरं चापि भयघ्नं दण्डधारणम् ।।२४१।। १. शीतवसन्त्योरिति पाठः।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४५ छाता तथा दण्ड धारण करने के गुण—छाता लगा कर चलना-वर्षा, आतप (घाम), हवा, धूलि तथा शीत से रक्षा करने वाला, नेत्रों के लिये हितकारी तथा मङ्गलप्रद होता है और दण्ड धारण करना-शक्ति, उत्साह, बल, स्थिरता, धैर्य तथा तेज का बढ़ाने वाला, सहारा देने वाला तथा भय को दूर करने वाला होता है ॥२४०-२४१॥ अथ शिविकाऽऽश्वारोहणगुणानाह- ऊर्ध्वाच्छादनसंयुक्ता शिबिका सर्ववल्लभा । तस्यामारोहणं नॄणां त्रिदोषशमकं मतम् ।। २४२ ।। वातश्लेष्मगदार्त्तानामहिता भ्रमकृत्तरिः । पित्तानिलकरो हस्ती लक्ष्म्यायुःपुष्टिवर्द्धनः ।। २४३ ।। घोटकारोहणं वातपित्ताग्निश्रमकृन्मतम् । मेदोवर्णकफघ्नं च हितं तद्बलिनां परम् ।। २४४ ।। पालकी, नौका, हाथी और घोड़े की सवारी करने के गुण—ऊपर से आवरण युक्त अर्थात् छाई हुई जो पालकी होती है, वह प्रायः सभी को प्रिय लगने वाली होती है। अतः उसमें चढ़ कर चलने से मनुष्यों के तीनों दोषों का शमन होता है। नौका पर सवार होकर जाना-वात तथा कफ रोग से पीड़ित लोगों के लिये अहितकारी तथा भ्रम (घूमटा) उत्पन्न करने वाला होता है। हाथी पर चढ़कर चलने से पित्त तथा वायु की उत्पत्ति एवं लक्ष्मी, आयु तथा पुष्टि की वृद्धि होती है। घोड़ा पर चढ़कर चलने से आयु, पित्त तथा जठराग्नि की वृद्धि एवं श्रान्ति (थकावट) की उत्पत्ति होती है तथा भेद, वर्ण और कफ का नाश होता है। घोड़े की सवारी बलवान् पुरुषों के लिये विशेष हितकर है। किन्तु दुर्बलों के लिये यह सवारी त्याज्य ही समझना चाहिये ॥२४२-२४४॥ अथातपादीनां गुणानाह, तत्रादावातपच्छायासेवनयोर्गुणानाह- आतपः स्वेदमूर्च्छाऽस्रपित्ततृष्णाक्लमाश्रमान् । दाहं विवर्णतां कुर्यादितांश्छाया व्यपोहति ।। २४५ ।। धूप तथा छाया सेवन के गुण—धूप का सेवन करना-स्वेद, मूर्छा, रक्त-पित, प्यास, क्लान्ति, श्रम, दाह तथा विवर्णता को करता है तथा छाया का सेवन इन्हीं सबों को दूर करता है ॥२४५॥ अथ वृष्टिकुहेल्योः सेवनगुणानाह- वृष्टिर्वृष्या हिमा बल्या निद्राऽऽलस्यविधायिनी । भयावहा मोहकरी कुहेलिः कफवातला ।। २४६ ।। वर्षा तथा कुहेसा के सेवन के गुण—वर्षा का सेवन वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल, बलकारक, निद्रा तथा आलस्य को उत्पन्न करने वाला होता है। और कुहेसा का सेवन भयदायक, मोह उत्पन्न करने वाला और कफ तथा वायु को बढ़ाने वाला होता है ॥२४६॥ ❖ कुहेलिः=कुआशा इति लोके ।। २४६।। ‘कुहेलिः’ का ‘कुआसा’ (कुहेसा) अर्थ करना चाहिये ॥२४६॥ अथाग्निधूमयोः सेवनगुणानाह- अग्निर्वातकफस्तम्भशीतवेपथुनाशनः । आमाभिष्यन्दशमनो रक्तपित्तप्रकोपणः ।। २४७ ।। सद्यः श्लेष्मकरो धूमो नेत्रयोरहितो भृशम् । शिरोगौरवकृच्चापि वातपित्तं च कोपयेत् ।। २४८ ।। अग्नि तथा धूप सेवन के गुण—अग्निसेवन-वायु, कफ, स्तब्धता (शरीर का जकड़ जाना) शीत और कँपकँपी को दूर करने वाला, आमाभिष्यन्दन को शमन करने वाला और रक्त-पित्त को प्रकुपित करने वाला होता है। धूम सेवन— तत्काल कफ उत्पन्न करने वाला, नेत्रों के लिये अत्यन्त अहितकर, मस्तक को भारी करने वाला और वात तथा पित्त को कुपित करने वाला होता है ॥२४७-२४८॥ १३ भाव.I

१४६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ सदाचरणान्याह- मैत्रीं१ सद्भिः समं कुर्यात्स्नेहं सत्सु तु सर्वथा । संसर्गं साधुभिः कुर्यादसत्सङ्गं परित्यजेत् ।। २४९ ।। सत्पुरुषों के आचरण-सज्जनों के साथ मैत्री तथा सब प्रकार से स्नेह करना चाहिये एवं साधु अर्थात् दूसरे की भलाई करने वाले सज्जनों के ही साथ हर प्रकारका सम्बन्ध रखे और नीच पुरुषों की सङ्गति छोड़ देनी चाहिये ।।२४९।। ❖ सत्सु सज्जनेषु । सर्वथा=मनोवाक्कर्मभिः ।। २४९ ।। ‘सत्’ से ‘सज्जन’ तथा ‘सर्वथा’ से ‘सब प्रकार से अर्थात् मन, वाणी तथा कर्म से’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।२४९।। सेवेत देवभूदेववृद्धवैद्यनृपातिथीन् । विमुखानार्थिनः कुर्यान्नावमन्येत कानपि ।। २५० ।। गुरूणां सन्निधौ तिष्ठेत्सदैव विनयान्वितः । पादप्रसारणादीनि तत्र नैव समाचरेत् ।। २५१ ।। अपकारपरेऽपि स्यादुपकारपरः पुमान् । आत्मवत्सकलान्पश्येद्द्वैरिणो दूरतो वसेत् ।। २५२ ।। २न कश्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् । प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः ।। २५३ ।। नात्मानमुदके पश्येन्न नग्नः प्रविशेज्जलम् । तथा नाज्ञातगाम्भीर्यं न हिंस्रप्राणिसेवितम् ।। २५४ ।। काले हितं मितं सत्यं संवादि मधुरं वदेत् । भुञ्जीत मधुरप्रायं स्निग्धं काले हितं मितम् ।। २५५ ।। न रात्रौ दधि भुञ्जीत न च निर्लवणं तथा । नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं न चाप्यघृतशर्करम् ।।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४७ विरत नहीं होना चाहिये तथा किसी भी व्यक्ति के फल अर्थात् उद्योगादि करने से प्राप्त हुये धनादि के विषय में ईर्ष्या (डाह) नहीं करना चाहिये ॥२५८॥ ❖ हेतौ=फलहेतौ उद्यमे, फले=धनादौ ।। २५८ ।। 'हेतु' से 'फल प्राप्ति के हेतुस्वरूप उद्यम' तथा 'फल' से 'धनादि' अर्थ समझना चाहिये ॥२५८॥ वेगान्न धारयेज्जातु मनोवेगान्विधारयेत् । न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतानतिलालयेत् ।।२५९।। मलमूत्रादि के वेगों को कभी रोकना नहीं चाहिये। किन्तु मन के वेग को सदा रोकना चाहिये। इन्द्रयों को पीड़ित अर्थात् एकाएक हठ पूर्वक विषयों से विरत नहीं करना चाहिये अर्थात् शनैः-शनैः इन्द्रियों को वश में लाना चाहिये और इन्द्रियों का अत्यन्त लालन भी नहीं करना चाहिये अर्थात् शब्दस्पर्शादि विषयों का अधिक ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥२५९॥ वर्षाऽऽतपादिषुच्छत्री दण्डी रात्रौ भषेषु च । सोपानत्कस्तनुं रक्षेद्विचरेद्युगमात्रदृक् ।। २६० ।। वर्षा तथा धूप आदि होने पर छाता लगाकर एवं रात्रि तथा भय उपस्थित होने पर दण्ड धारण कर सर्वदा शरीर की रक्षा करनी चाहिये। जूता पहन कर आगे की ओर चार हाथ तक की भूमि को देखता हुआ चलना चाहिये ॥२६०॥ ❖ युगमात्रदृक्= अग्रतो हस्तचतुष्टयमितां भूमिं पश्यन् ।।२६०।। 'युगमात्रदृक्' अर्थात् 'आगे चार हाथ तक की भूमि को देखता हुआ' ॥२६०॥ नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाग्निस्कन्धमभिव्रजेत् । सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद्दुष्टयानकम् ।।२६१।। नदी को बाहुओं से तैर कर नहीं किन्तु नौका आदि से पार करना चाहिये और जिस ओर अग्नि-समूह हो उधर नहीं जाना चाहिये। जिस नौका पर सवार होने से डूबने का और जिस वृक्ष पर चढ़ने से टूट जाने या स्वयं गिर पड़ने का सन्देह हो ऐसी नौका तथा वृक्ष पर नहीं चढ़ना चाहिये। दुष्ट-वाहन-हाथी, घोड़ा आदि पर भी नहीं चढ़ना चाहिये ॥२६१॥ ❖ दुष्टयानं=दुष्टगजघोटकादि ।।२६१।। 'दुष्टयान' अर्थात् 'बदमाश घोड़े और मतवाले हाथी आदि वाहन' ॥२६१॥ नासंवृतमुखं कुर्यात्सभायां च विचक्षणः । कासं हासं¹ तथोद्गारं जृम्भणं क्षवथुं यथा ।। २६२ ।। नासिकां न विकुष्णीयान्नासीतोत्कटकः क्वचित् । नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेन्न नखेन लिखेद्भुवम् ।। २६३ ।। सम्मार्जनीरजो नैव देहे दद्यात्कदाचन । न नखेन तृणं छिन्द्यान्नोच्छिष्टो ब्राह्मणं स्पृशेत् ।। २६४ ।। नोपरक्तं न चोद्यन्तं नास्तं यातं दिवाकरम् । सर्वथा न समीक्षेत न जले प्रतिबिम्बितम् ।।२६५।। नेक्षेत सततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च । पौरन्दरं धनुनैव दर्शयेत्कमपि क्वचित् ।।२६६।। नेच्छेद्वलवता युद्धं न भारं शिरसा वहेत् । गात्रं न वादयेत्केशान्हस्तेन धुनयान्न च ।।२६७।। न गच्छेत्पूज्ययोर्मध्ये दम्पत्योरन्तरेण च । रिपोरन्नं न भुञ्जीत गणिकाऽन्नमपि क्वचित् ।। २६८ ।। बुद्धिमान् मनुष्य सभा के मध्य में हाथ आदि से बिना मुख ढँके खाँसना, हँसना, उद्गार (डकार) तथा जँभाई लेना एवं छींकना तथा नाक से मैल निकालना इन सब कर्मों को न करें। (मल-मूत्र त्याग करने के अतिरिक्त और) किसी समय में उत्कटासन (उँकरू) होकर तथा अधिक देर तक जानुओं (घुटनों) को ऊँचे करके नहीं बैठे। नख से भूमि को न खोदे। शरीर पर कभी भी.झाड़ू की धूलि न पड़ने दे। नख से तृण को न तोड़े। जूठे मुख होकर ब्राह्मण को न छुवे। ग्रहण


१. 'श्वासमिति पाठः ।

१४८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे के समय, उदय तथा अस्त होते हुये सूर्य को तथा जल में पड़े हुये सूर्य के प्रतिबिम्ब को भी कभी न देखे। निरन्तर सूक्ष्म, चमकती हुई, अपवित्र तथा अप्रिय वस्तु को न देखे। इन्द्र धनुष को कभी किसी दूसरे को न दिखावे। बलवान् पुरुष के साथ कभी युद्ध करने की इच्छा न करे। शिर के ऊपर बोझ रख कर न ढोवे। हाथ आदि से ठोक कर शरीर न बजावे। हाथ से केशों को कभी न हिलावे। पूज्य व्यक्तियों के तथा विवाहित स्त्री-पुरुष के मध्य से होकर न जावे और कभी भी शत्रु तथा वेश्या का अन्न न खावे ॥२६२-२६८॥ प्रतिभूर्न भवेत्क्वापि न च साक्षी वृथा भवेत् ॥२६९॥ कभी किसी का जामिन न होवे तथा व्यर्थ किसी का साक्षी (गवाह) भी न होवे ॥२६९॥ ❖ प्रतिभूः = जामिन् ॥२६९॥ 'प्रतिभूः' अर्थात् 'जामिन' जमानतदार ॥२६९॥ स्थागं १ न धारयेज्जातु द्यूतं दूरात्परित्यजेत् ॥२७०॥ विश्वासं नाचरेत्

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४९ रात्रि की चाँदनी, ओस और अन्धकार के गुण—रात्रि की चाँदनी शीतल, कामदेवसम्बन्धी आनन्द को बढ़ाने वाली, प्यास, पित्त तथा दाह को दूर करने वाली होती है और रात्रि की ओस चाँदनी की अपेक्षा स्वल्पमात्रा में पूर्वोक्त गुणों से युक्त होती है किन्तु वायु और कफ को उत्पन्न करनेवाली होता है तथा रात्रि का अन्धकार भयदायक, मोह तथा दिशाओं के विषय में भ्रम उत्पन्न करने वाला, पित्त और कफ को दूर करने वाला, कामवर्धक एवं शरीर में क्लान्ति उत्पन्न करने वाला होता है ॥२७७-२७८॥ अथ रात्रौ भोजनस्य समयं परिमाणं चाह— रात्रौ च भोजनं कुर्यात्प्रथमप्रहरान्तरे। किञ्चिदूनं समश्नीयाद् दुर्जरं तत्र वर्जयेत् ॥२७९॥ रात्रि भोजन का विधान—रात्रि में प्रथम प्रहर के मध्य में ही दिन की अपेक्षा कुछ कम भोजन करना चाहिये, उसमें जो देर में पचने वाला आहार हो उसे नहीं खाना चाहिये ॥२७९॥ अथ मैथुनमाह, तत्रादौ मैथुनेच्छायां सत्यामपि तदकरणे दोषानाह— शरीरे जायते नित्यं देहिनः सुरतस्पृहा। अव्यावायान्मेह मेदोवृद्धिः शिथिलता तनोः ॥२८०॥ इच्छा होने पर मैथुन न करने से दोष—मनुष्यों के शरीर में प्रायः मैथुन करने की इच्छा नित्य ही उत्पन्न होती है, किन्तु जब प्रबल इच्छा हो उस समय यदि मैथुन न किया जाय तो उससे प्रमेह तथा मेद की वृद्धि और शरीर में शिथिलता होती है ॥२८०॥ अथ स्त्रीणां बालाद्यवस्थानामवधिमाह— बालेति गीयते नारी यावद्वर्षाणि षोडश। ततस्तु तरुणी ज्ञेया द्वात्रिंशद्वत्सरावधि ॥२८१॥ स्त्रियों की बालादि अवस्था का विचार—स्त्रियाँ १६ वर्ष तक 'बाला' उसके बाद ३२ वर्ष तक 'तरुणी' कहलाती हैं ॥२८१॥ तदूर्ध्वमधिरूढा स्यात्पञ्चाशद्वत्सरावधि। वृद्धा तत्परतो ज्ञेया सुरतोत्सववर्जिता ॥२८१॥ तदुपरान्त ५० वर्ष तक प्रौढ़ा तथा उसके बाद वृद्धा कहलाती हैं और उस समय उनके हृदय में कामचेष्टा बहुत कम होती है अतः सुन्दर रति के लिये वे त्याज्य हैं ॥२८२॥ अधिरूढा=प्रौढ़ा ॥२८२॥ 'अधिरूढा' का 'प्रौढ़ा' अर्थ समझना चाहिये ॥२८२॥ अथ बालाऽऽदिस्त्रीणां सेवनस्य समयं फलञ्चाह— निदाघशरयोर्बाला हिता विषयिणां१ मता। तरुणी शीतसमये प्रौढा वर्षावसन्तयोः ॥२८३॥ नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्धयते बलम्। तरुणी ह्रासयेच्छक्तिं प्रौढोद्भावयते जराम् ॥२८४॥ बाला, तरुणी और प्रौढ़ा स्त्री सेवन का समय—विषयी पुरुषों के लिये ग्रीष्म तथा शरद् ऋतु में 'बाला', शीतकाल में 'तरुणी' और वर्षा तथा वसन्त ऋतु में 'प्रौढ़ा' स्त्री हितकारिणी मानी गई हैं। यदि नित्य 'बाला' स्त्री का सेवन किया जाय तो वह नित्य बल को बढ़ाती हैं, किन्तु नित्य सेवन करने से 'तरुणी' स्त्री शक्ति का ह्रास करती हैं तथा नित्य सेवन करने से 'प्रौढ़ा' स्त्री पुरुष को वृद्धावस्था उत्पन्न करके वृद्ध बना देती है ॥२८३-२८४॥ १. 'विषयिणी'ति पा. अयुक्तम्।

१५० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ सेवनेन सद्यः प्राणकराणि द्रव्याण्याह- सद्यो मांसं नवं चान्नं बाला स्त्री क्षीरभोजनम् । घृतमुष्णोदके स्नानं सद्यःप्राणकराणिषट् ।।२८५।। सद्यः बल उत्पन्न करने वाले पदार्थ-(१) ताजा मांस, (२) नवीन अन्न, (३) बाला स्त्री, (४) दूध तथा (५) घृत का भोजन और (६) उष्णजल से स्नान ये छः पदार्थ सद्यःप्राण (बल) उत्पन्न करने वाले होते हैं ।।२८५।। ❖ प्राणशब्दोऽत्र बलवाचकः ।।२८५।। 'प्राण' शब्द यहाँ 'बल' का वाचक है ।।२८५।। अथ सेवनेन सद्यः प्राणहराणि द्रव्याण्याह- पूतिमांसं स्त्रियो वृद्धा बालार्कस्तरुणं दधि । प्रभाते मैथुनं निद्रा सद्यःप्राणहराणि षट् ।।२८६।। सद्यः बल को हरण करने वाले पदार्थ-(१) दुर्गन्धियुक्त मांस, (२) वृद्धा स्त्री, (३) कन्याराशिस्थित सूर्य की धूप, (४) तत्काल का जमाया हुआ दही, (५) प्रातः काल का मैथुन और (६) प्रातः काल में सोते रहना ये छः पदार्थ सेवन करने पर प्राण (बल) के हरण करने वाले होते हैं ।।२८६।। ❖ बालार्कः=कन्यार्कः ।।२८६।। 'बालार्कः' से 'कन्याराशिस्थित (क्वार का) सूर्य की धूप, यह अर्थ समझना चाहिये ।।२८६।। अथ वृद्धस्य तरुणीगमने तरुणस्य च वृद्धागमने फलमाह- वृद्धोऽपि तरुणीं गत्वा तरुणत्वमवाप्नुयात् । वयोधिकां स्त्रियं गत्वा तरुणः स्थविरायते ।।२८७।। तरुणी और वृद्धा स्त्रीसंभोग का फल-वृद्ध पुरुष यदि तरुणी स्त्री के साथ भोग करे तो वह भी तरुण हो जाता है और तरुण पुरुष यदि वृद्धा स्त्री के साथ संभोग करे तो वह भी वृद्ध की भाँति हो जाता है ।।२८७।। अथ नियमपूर्वक स्त्रीगमने गुणानाह- आयुष्मन्तो मन्दजरा वपुर्वर्णबलान्विताः । स्थिरोपचितमांसाश्च भवन्ति स्त्रीषु संयताः ।।२८८।। नियम पूर्वक स्त्री संभोग के गुण-जो लोग स्त्रियों के विषय में संयत भाव से रहते हैं अर्थात् नियम पूर्वक स्त्रीगमन करते हैं, वे दीर्घ आयुवाले होते हैं तथा उन्हें वृद्धावस्था धीरे-धीरे देर में आती है और उनके शरीर का वर्ण और बल देर तक बना रहता है तथा मांस की दृढ़ता तथा वृद्धि भी चिरकाल तक बनी रहती है ।।२८८।। अथर्तुभेदेन स्त्रीसेवनप्रकारमाह- सेवेत कामतः कामं बलाद्वाजीकृतो हिमे । प्रकामं तु निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ।।२८९।। ऋतु भेद से स्त्री सेवन का प्रकार-हेमन्त (अगहण तथा पौष) ऋतु में तो वाजीकरण औषधियाँ खाकर बलानुसार किन्तु शिशिर (माघ व फागुन) ऋतु में तो यथेच्छ स्त्री सेवन करना चाहिये ।।२८९।। अथ वसन्तादिष्वृतुषु कियता कालेन स्त्री सेवनं युक्तमित्याह- त्र्यहाद्वसन्तशरदोः पक्षाद् दृष्टिनिदाघयोः ।।२९०।। वसन्तादि ऋतुओं में स्त्रीसेवन के मध्यन्तर काल-वसन्त तथा शरद् ऋतु में तीन-तीन दिन के बाद और वर्षा तथा ग्रीष्म ऋतु में एक-एक पक्ष (१५ दिन) के बाद स्त्री सम्भोग करना चाहिये ।।२९०।। सुश्रुतस्तु- त्रिभिस्त्रिभिरहोभिर्हि समेयात्प्रमदां नरः । सर्वेष्वृतुषु धर्मे तु पक्षात्पक्षाद् व्रजेद् बुधः ।।२९१।।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५१ इस विषय में 'सुश्रुत' का मत है कि—सभी ऋतुओं में तीन-तीन दिन के बाद और ग्रीष्म ऋतु में एक-एक पक्ष के बाद स्त्रीसङ्ग करे ॥२९१॥ क्वसमेयातसंगच्छेत्। घर्मे = ग्रीष्मे ॥२९१॥ 'समेयात्' का 'स्त्रीसङ्ग करे' और 'धर्मे' का 'ग्रीष्म ऋतु में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२९१॥ अथर्तुभेदेन स्त्रीसेवनसमयभेदमाह- शीते रात्रौ दिवा ग्रीष्मे वसन्ते तु दिवा निशि। वर्षासु वारिदध्वाने शरत्सु सरसः १स्मरः ॥२९२॥ ऋतुभेद से स्त्रीसेवन के समय—शीतकाल में रात्रि में, ग्रीष्म ऋतु में दिन में, वसन्त ऋतु में दिन या रात्रि दोनों ही में, वर्षा ऋतु में जब बादल गरजे तब अन्य ऋतु में जब काम की प्रबलता हो तभी सम्भोग करना चाहिये ॥२९२॥ अथ स्त्रीसेवननिषिद्धसमयमाह- उपेयात्पुरुषो नारीं संध्ययोर्न च पर्वसु। गोसर्गे चार्द्धरात्रे च तथा मध्यदिनेऽपि च ॥२९३॥ स्त्रीसम्भोग का निषिद्ध समय—प्रातः और सायं की सन्ध्या, पर्व-दिन (अमावस्या, पूर्णिमा आदि तिथि विशेष), गोसर्ग (गौओं को चराने के लिये प्रातः काल छोड़ने के समय), आधीरात तथा मध्याह्न (दोपहर) इन सब समयों में स्त्री के साथ सम्भोग नहीं करना चाहिये ॥२९३॥ अथ स्त्रीसेवनयोग्यस्थानमाह- विहारं भार्यया कुर्याद् देशेऽतिशयसंवृते। रम्ये श्राव्याङ्गनागाने सुगन्धे सुखमारुते ॥२९४॥ स्त्रीसम्भोग करने योग्य स्थान—अत्यन्त गुप्त अर्थात् जहाँ किसी दूसरे व्यक्ति की दृष्टि न पड़ती हो तथा रम्य और जहाँ पर स्त्रियों का सुमधुर गान सुनाई पड़ता हो एवं सुगन्धित तथा सुखकर वायु बह रही हो ऐसे स्थानों में स्त्री के साथ विहार (सम्भोगादि) कार्य करना चाहिये ॥२९४॥ अथ स्त्रीसेवनअयोग्यस्थानमाह- देशे गुरुजनासन्ने विवृतेऽतित्रपाकरे। श्रूयमाणे व्यथाहेतुवचने न रमेत ना ॥२९५॥ स्त्रीसम्भोग के अयोग्य स्थान—जो स्थान गुरुजनों के स्थान के निकट हो तथा लोगों की दृष्टि पड़ने के लायक हो तथा अत्यन्त लज्जा उत्पन्न करनेवाला हो और जहाँ पर मन में व्यथा पहुँचाने वाले वचन सुनाई पड़ते हों ऐसे स्थान में स्त्री सम्भोग नहीं करना चाहिये ॥२९५॥ अथ स्त्रीसेवनकालिकपुरुषाणां वेषादिकमाह- स्नातश्चन्दनलिप्ताङ्गः सुगन्धः सुमनोऽन्वितः। भुक्तवृष्यः सुवसनः सुवेषः समलंकृतः ॥२९६॥ ताम्बूलवदनः पत्यामनुरक्तोऽधिकस्मरः। पुत्रार्थी पुरुषो नारीमुपेयाच्छयने शुभे ॥२९७॥ स्त्रीसंभोग करने के समय पुत्रार्थी पुरुषों का वेषादि—पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पुरुष स्नान करके शरीर में चन्दन, इत्र आदि सुगन्धित द्रव्य लगा कर, प्रसन्न चित्त से वीर्यवर्धक पदार्थ खाये हुये, सुन्दर वस्त्र तथा सुन्दर वेष से भलीभाँति अलङ्कृत होकर मुख में पान का बीड़ा रखे हुये, पत्नी के विषय में अनुरक्त होकर अधिक काम चेष्टा से युक्त सुन्दर शय्या पर स्त्री के साथ सम्भोग करे ॥२९६-२९७॥ अथ मैथुनानर्हपुरुषानाह- अत्याशितोऽधृतिःक्षुद्वान्सव्यथाङ्गः पिपासितः। बालो वृद्धोऽन्यवेगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ॥२९८॥ मैथुन करने के अयोग्य पुरुष—अत्यन्त भोजन किया हुआ, काम से अधीर चित्त वाला, भूखा, अङ्ग पीड़ा से युक्त, प्यासा, बालक, वृद्ध, मूत्रादि वेगसे युक्त अथवा रोगी पुरुष को मैथुन नहीं करना चाहिये ॥२९८॥ १. 'सरसी' ति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१५२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ रोगी=मैथुनसंवर्जनीयरोगयुक्तः ।।२९८।। 'रोगी' अर्थात् 'जिस रोग में मैथुन करना वर्जित हो उस रोग से युक्त' रोगी ।।२९८।। अथ मैथुनयोग्याः स्त्रियःआह- भार्यां रूपगुणोपेतां तुल्यशीलां कुलोद्भवाम् । अतिकामोऽभिकामां तु हृष्टो हृष्टामलंकृताम् ।। सेवेत प्रमदां युक्त्या वाजीकरणबृंहितः ।। २९९ ।। मैथुन के योग्य स्त्री—वाजीकरण ओषधियों से मैथुन करने में विशेष शक्ति को प्राप्त कर रूप और सद्गुणों से युक्त, अपने समान शीलवाली, अच्छे कुल में उत्पन्न अत्यन्त कामासक्त, प्रसन्न चित्तवाली और अलङ्कारों से युक्त स्त्री के साथ विधिपूर्वक संभोग करना चाहिये ।।२९९ ।। अथ मैथुनायोग्याः स्त्रियःआह- रजस्वलामकामां च मलिनामप्रियां तथा ।। ३०० ।। वर्णवृद्धां वयोवृद्धां तथा व्याधिप्रपीडिताम् । हीनाङ्गीं गर्भिणीं द्वेष्यां योनिरोगसमन्विताम् ।। ३०१ ।। सगोत्रां गुरुपत्नीं च तथा प्रव्रजितामपि । नाधिगच्छेत् पुमान्नारीं भूरिवैगुण्यशङ्कया ।। ३०२ ।। मैथुन के अयोग्य स्त्री—रजस्वला, काम चेष्टा से हीन, मलिन वेषवाली, मनको प्रिय न लगने वाली, अपने से बड़ी जाति व अवस्था वाली, रोग से पीड़ित, हीन अङ्गोंवाली, गर्भिणी, द्वेष्या (द्वेष करने वाली), योनिसम्बन्धी रोग वाली, अपने गोत्र में उत्पन्न हुई, गुरुकी पत्नी तथा संन्यास ग्रहण किये हुई स्त्रियों के साथ पुरुष को कभी संभोग न करना चाहिये क्योंकि ऐसी स्त्रियों के साथ संभोग करने से हानि होती है ।।३००-३०२।। अथ पुनर्विशेषेण रजस्वलागमने दोषनाह- रजस्वलो गतवतो नरस्यासंयतात्मनः । दृष्ट्यायुस्तेजसां हानिरधर्मश्च ततो भवेत् ।। ३०३ ।। रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करने से दोष—जो पुरुष इन्द्रिय के वशीभूत होकर रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करते हैं उनकी दृष्टि, आयु तथा तेज की हानि और अधर्म भी होता है ।।३०३।। अथ पुनर्विशेषेण सन्यासिन्यादीनां स्त्रीणां गमने पर्वसु च स्त्रीगमने दोषमाह- लिंगिनीं गुरुपत्नीं च सगोत्रामथ पर्वसु । वृद्धां च सन्ध्ययोश्चापि गच्छतो जीवनक्षयः ।। ३०४ ।। संन्यासिनी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में दोषान्तर—संन्यास ग्रहण किये हुई, गुरु की पत्नी, अपने गोत्र में उत्पन्न हुई तथा वृद्धा स्त्रियों के साथ संभोग करने से तथा पर्व (अमावास्यादि विशेष तिथियों) में एवं दोनों काल की सन्ध्याओं में स्त्री गमन करने वाले पुरुष की आयु नष्ट होती हैं ।।३०४।। ❖ लिङ्गिनीं=प्रव्रजिताम् ।। ३०४ ।। 'लिङ्गिनी' पद का अर्थ है 'प्रव्रजिता अर्थात् संन्यास ग्रहण किये हुई ।।३०४।। अथ पुनर्विशेषेण गर्भिण्यादिषु गमने प्रकाशे स्त्रीसेवने च दोषानाह- गर्भिण्यां गर्भपीडा स्याद्व्याधितायां बलक्षयः ।। ३०५ ।। हीनाङ्गीं मलिनां द्वेष्यां क्षामां बन्ध्यामसंवृते । देशेऽभिगच्छतो रेतः क्षीणं म्लानं मनो भवेत् ।। ३०६ ।। गर्भिणी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में दोषान्तर—गर्भिणी स्त्रियों के साथ संभोग करने से गर्भ को पीड़ा होती है, रोगिणी स्त्रियों के साथ गमन करने से बल का क्षय होता है। तथा हीन अङ्गवाली, मैली-कुचैली रहनेवाली,

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५३ द्वेष्या (द्वेष करनेवाली), दुबली-पतली या बन्ध्या स्त्री के साथ अथवा खुले बेपर्द स्थान में स्त्रीगमन करने से पुरुषों का वीर्य क्षीण तथा मन म्लान हो जाता है ॥३०५-३०६॥ ❖ गर्भिणीं गर्भवासदिवसाद् द्वितीये मासि गर्भस्थितेरनिश्चये यथोक्तनक्षत्रादिलाभाभावे वा तृतीये मासि पुंसवने कृते नाभिगच्छेत्। यतो पुंसवनानन्तरमाह व्यासः- ततस्त्यजेन्नदीतीरं देवखातोदकं तथा । भर्तुः शय्यां मृतापत्यां तथैवामिषभोजनम् ।।४।। 'गर्भिणी' अर्थात् गर्भ की स्थिति होने के दिन से दूसरे मास में अथवा गर्भस्थिति का अनिश्चय होने पर किंवा जैसा चाहिये वैसा ज्योतिः शास्त्रोक्त पुंसवन के योग्य नक्षत्रादि के न मिलने पर तीसरे मास में पुंसवन संस्कार हो चुकने पर गर्भिणी स्त्री का सङ्ग नहीं करना चाहिये। 'पुंसवन' के बाद गर्भिणी स्त्रियों के लिए व्यास का मत है कि—पुंसवन संस्कार हो चुकने के बाद गर्भिणी स्त्री नदी के तीर पर जाना, प्राकृतिक जलाशयों का जल पीना, पति की शय्या पर सोना अर्थात् मैथुन करना, मरी हुई सन्तान वाली स्त्रियों का साथ तथा मांस भोजन करना छोड़ देवे ॥४॥ ❖ अन्यच्च— आमिषस्याशनं यत्नात्प्रमदा परिवर्जयेत्। देवारामनदीयानं प्रयोगं पुरुषस्य च ।।५।। इति ।। ३०५-३०६।। और भी कहा है कि—गर्भिणी स्त्री मांस का भोजन एवं देवमन्दिर, बगीचा तथा नदी पर जाना तथा पुरुष के साथ सहवास, इन सब कर्मों का यत्नपूर्वक परित्याग कर देवे ॥५॥३०५-३०६॥ अथ बुभुक्षितादीनां पुरुषाणां स्त्रीसंभोगे मध्याह्ने स्त्रीसेवने च दोषानाह- क्षुधितः क्षुब्धचित्तश्च मध्याह्नेतृषितोऽबला । स्थितस्य हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ।।३०७।। भूखे प्यासे आदि होकर तथा मध्याह्न में स्त्रीसङ्ग करने से दोष—जो पुरुष भूखा हो अथवा जिसको क्षोभ प्राप्त हुआ हो या जो प्यासा अथवा निर्बल हो वह यदि स्त्रीसंभोग करे अथवा जो मध्याह्न में स्त्री प्रसङ्ग करे उसके अन्दर रहनेवाले शुक्र की हानि तथा वायु का कोप होता है ॥३०७॥ अथ व्याधितस्य पुंसस्तथा प्रत्यूषादिसमये स्त्रीगमने दोषानाह- व्याधितस्य रुजा श्लीहा मूर्च्छा मृत्युश्च जायते । प्रत्यूषे चार्थरात्रे च वातपित्ते प्रकुप्यतः ।।३०८।। रुग्णावस्था या प्रातः काल में स्त्रीसंभोग से दोष—रोगी पुरुष यदि स्त्री प्रसङ्ग करे तो उसे पीड़ा, प्लीहा रोग तथा मूर्च्छा होती है और अन्त में मृत्यु तक भी हो जाती है। एवं जो पुरुष प्रत्यूष अर्थात् सूर्योदय के पूर्व अथवा आधीरात में स्त्रीप्रसङ्ग करता है उस के वात तथा पित्त कुपित हो जाते हैं ॥३०८॥ अथ तिर्यगादियोनौ मैथुने दोषानाह- तिर्यग्योनावयोनौ वा दुष्टयोनौ तथैव च । उपदंशस्तथा वायोः कोपः शुक्रसुखक्षयः ।।३०९।। पशु आदि की योनि में मैथुन करने के दोष—पशु की योनि अथवा अयोनि (गुदा वा कृत्रिम योनि) में एवं वातादि दोषों से दूषित योनि में मैथुन करने से उपदंश (गर्मी, सुजाक) या वायु का कोप, किंवा वीर्य तथा सुख का क्षय होता है ॥३०९॥ अथ मलमूत्रयोर्वेगावस्थायां मैथुने चलितशुक्रधारणे । विपरीत मैथुने च दोषमाह- उच्चारिते मूत्रिते च रेतसश्च विधारणे । उत्ताने च भवेच्छीघ्रं शुक्राश्मर्यास्तु सम्भवः ।।३१०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे वेग रोकने से या विपरीत मैथुन करने से दोष—मल या मूत्र के वेगको रोककर मैथुन करने से तथा उत्तान होकर (विपरीत) मैथुन करने से अथवा मैथुनके समय शुक्र के वेग को रोकने से शीघ्र ही शुक्राश्मरी (वीर्य की पथरी) नामक रोग उत्पन्न होने की सम्भावना हो जाती है ॥३१०॥ अथ पुनर्विशेषेणोपस्थितशुक्रधारणनिषेधमाह— सर्वमेतत्त्यजेत्तस्माद्यतो लोकद्वयाहितम्। शुक्लं तूपस्थितं मोहान्न सन्धार्यं कदा चन ।।३११।। स्खलित होते हुये शुक्र के रोकने का निषेध—पूर्वोक्त इन सब बातों को मैथुन करने में छोड़ दे क्योंकि न छोड़ने से दोनों लोक में उसका अहित होता है और उन सबों में विशेष कर उपस्थित शुक्र का धारण तो भूल से भी कभी न करे ॥३११॥ अथ सुरतान्ते हितकराणि द्रव्याण्याह— स्नानं सशर्करं क्षीरं भक्ष्यमैक्षवसंस्कृतम् । वातो मांसरसः स्वप्नः सुरतान्ते हिता अमी ।।३१२।। मैथुन करने के बाद हितकारक द्रव्य—स्नान, शक्कर (चीनी) मिला हुआ दूध, शक्कर मिला हुआ (मीठा) भोजन, वायु सेवन, मांस-रस (शुरुवा) और नींद से सो जाना ये सब कार्य मैथुन करने के बाद हितकर होते हैं ॥३१२॥ अथातिव्यवायजान् रोगानाह— शूलकासज्वरश्वासकार्श्यपाण्ड्वालयक्षयः । अतिव्यवायाज्जायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः ।।३१३।। अत्यन्त मैथुन करने से होनेवाले रोग—अत्यन्त मैथुन करने से शूल, खाँसी, ज्वर, श्वास (दमा), कृशता, पाण्डु, क्षय तथा आक्षेपक आदि रोग उत्पन्न होते हैं ॥३१३॥ अथ रात्रिनिद्राजागरणयोर्गुणानाह— रात्रौ जागरणं रूक्षं कफदोषविषार्त्तिजित् । निद्रा तु सेविताकाले धातुसाम्यमतन्द्रिताम् ।।३१४।। पुष्टिं वर्णं बलोत्साहं वह्निदीप्तिं करोति हि ।।३१५।। रात्रि में सोने तथा जागने के गुण-दोष—रात्रि में जागना रूक्षताकारक तथा कफ-दोष व विष-सम्बन्धी पीड़ा का हरण करनेवाला है और समय पर निद्रा-सेवन करना (नींद से सो जाना) धातुओं की समता, तन्द्रा का न आना, पुष्टि, वर्ण, बल, उत्साह और जठराग्नि की दीप्ति इन सबों को करता है ॥३१४-३१५॥ अथ सुखपूर्वकनिद्रालाभार्थमौषधमाह— यो लेढि शयनसमये मधुमित्रं बीजपूरदलचूर्णम् । स तु १ लज्जाकरवातप्रसरनिरोधात्सुखं स्वपिति ।।३१६।। सुखपूर्वक नींद आने के लिये औषध—जो सोने के समय बिजौरा नींबू के पत्ते का चूर्ण मधु के साथ खाता है, उसकी लज्जा पैदा करनेवाली अधोवायु का वेग रुक जाता है और वायु शमन होने से वह सुखपूर्वक सोता है ॥३१६॥ अथोषःकाले जलपानगुणानाह— सवितुः समुदयकाले प्रसृतीः सलिलस्य पिबेदष्टौ । रोगजरापरिमुक्तो जीवेद्वत्सरशतं साग्रम् ।।३१७।। उषाकाल (सूर्योदय के पूर्व) जल पीने के गुण—सूर्य के उदय होने के आसन्न समय में जो आठ प्रसृति (पसर)

अथ पञ्चमं दिनचर्यादिप्रकरणम् १५५ ❖ अस्य जलपानस्योपक्रमकालो१ रात्रेश्चतुर्थप्रहरे प्रवेश । तथा च भोजः- पिबति पर्युषितं जलमन्वहं तिमिरिणी चरमे प्रहरे यदि ।। ६ ।। इति जलपान के प्रारम्भ करने का काल रात्रि के चौथे प्रहर से ही आरम्भ हो जाता है। क्योंकि इस विषय में 'भोज' का भी यह मत है कि 'यदि कोई रात्रि के अन्तिम प्रहर में नित्य बासी जल पीता है' इत्यादि ।। ६ ।। ❖ एतज्जुलपानकालमर्यादा सूर्योदयातिसन्निहितप्राक्२ कालः। तथा च तन्त्रान्तरे- अम्भसः प्रसुतीरष्टौ रवाननुदिते पिबेत्। वातपित्तकफाञ्जित्वा जीवेद्वर्षशतं सुखी ।। ७ ।। इति । इस जलपान के समय की मर्यादा सूर्योदय से अत्यन्त सन्निकट पूर्वका ही काल है। इसी विषय में दूसरे ग्रन्थ में भी लिखा है कि—'सूर्य उदय होने के पहले ही जो आठ पसर जल पीता है वह बात, पित्त तथा कफ सम्बन्धी विकारों को हटाकर सुखपूर्वक सौ वर्ष तक जीता है' ।। ७ ।। ❖ सलिलस्यात्र पर्युषितस्य ग्रहणं भोजनवचनानुरोधात् ।। ३१७ ।। यहाँ पर जल से बासी जल का ग्रहण पूर्वोक्त 'भोज' के वचन के अनुरोध से ही किया जाता है। अर्शःशोथग्रहण्यो ज्वरजठरजराकुष्ठमेदोविकारामूत्राघातास्रपित्तश्रवणगलशिरः श्रोणिशूलाक्षिरोगाः । ये चान्ये वातपित्तक्षतजकफकृता व्याधयः सन्ति जन्तो स्तांस्तानभ्यासयोगादपहरति पयः पीतमन्ते निशायाः ।। ३१८ ।। बवासीर, शोथ, ग्रहणी, ज्वर रोग, उदर-जरा-कोढ़ तथा मेद सम्बन्धी विकार और मूत्राघात, रक्तपित्त एवं कान- गला-शिर और कमर के शूल तथा नेत्र सम्बन्धी रोग अथवा इनके अतिरिक्त अन्य भी जो-जो बात-पित्त-कफ और क्षत से होने वाले रोग होते हैं वे सभी रात्रि के अन्त में जल पीने का अभ्यास करने से दूर हो जाते हैं ।। ३१८ ।। अथोषःकाले नासावारिपानगुणानाह- विगतघननिशीथे प्रातरुत्थाय नित्यं पिबति खलु नरो यो घ्राणरन्ध्रेण वारि । स भवति मतिपूर्णश्चक्षुषा तार्क्ष्यतुल्यो वलिपलितविहीनः सर्वरोगैर्विमुक्तः ।। ३१९ ।। उषःकाल में नासिका से जल पीने के गुण—जब रात्रि का घना अन्धकार दूर हो अर्थात् प्रातः काल हो जाय तब उठकर जो मनुष्य नित्य नासिका से जलपान करता है वह निश्चय ही बुद्धि से पूर्ण होता है यथा उसके नेत्रों की दर्शन शक्ति गरुड़ के तुल्य होती है तथा बली और पलित रोगों से हीन होकर वह सब रोगों से मुक्त हो जाता है ।। ३१९ ।। ❖ निशीथोऽत्र=निशान्धकारः ।। ३१९ ।। 'निशीथ' से यहाँ 'रात्रिका अन्धकार' समझना चाहिये ।। ३१९ ।। अथ नासाजलपाने जलपरिमाणमाह- पातव्यं नासया नीरं प्रसुतित्रयमात्रया ।। ३२० ।। नासाजलपान में जलका परिमाण—मनुष्य को नासिका के द्वारा तीन प्रसुति (पसर) प्रमाण जल पीना चाहिये ।। ३२० ।। अथ पुनर्विशेषेण नासाजलपाने गुणानाह- व्यङ्गवलीपलितघ्नं पीनसवैस्वर्यकासशोथहरम् । रजनीक्षयेऽम्बुनस्यं रसायनं दृष्टिसञ्जननम् ।। ३२१ ।। १. 'काले' इति पा. । २. 'प्राप्त' इति पा. ।

१५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नासा जलपान के विशेष गुण—रात्रि व्यतीत होने पर नासा से जलपान करना व्यङ्ग (झाँई), बली, पलित, पीनस, स्वरभङ्ग, खाँसी और शोथ इन सब रोगों को दूर करता है तथा रसायन और दर्शनशक्ति को बढ़ाने वाला होता है ॥३२१॥ अथ नासावारिपानानर्हजनानाह- स्नेहे पीते क्षते शुद्धावाध्माने स्तिमितोदरे । हिक्कायां कफवातोत्थे व्याधौ तद्वारि वारयेत् ।।३२२।। नासा जलपान के अयोग्यजन—जो स्नेह पान किये हों या जिन्हें क्षत हो गया हो अथवा जिन्होंने वमन या विरेचन द्वारा तत्काल में शरीर की शुद्धि की हो या जिन्हें उदर में आध्मान (अफरा) हो गया हो या पेट में स्तिमित हो गया हो अर्थात् मन्दाग्नि हो गई हो या जो हिचकी और कफ तथा वात से होनेवाली व्याधियों से युक्त हों उन्हें उस जल का पान नहीं करना चाहिये ॥ ❖ तद्वारि नासा पेयम् ।।३२२।। 'तद्वारि' अर्थात् 'नासिका द्वारा पिये जानेवाले जलका' ।।३२२।। अथर्तुचर्यामाह । तत्रादौ नामनिर्देशपूर्वकमृतुषट्कमाह- क्षयकोपशमा१ यस्मिन्दोषाणां सम्भवन्ति हि । ऋतुषट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु संक्रमात् ।।३२३।। ऋतुभेद और ऋतुचर्या—जिस समय दोषों की वृद्धि, कोप तथा शमन हुआ करता है, उस समय को ऋतु कहते हैं और वह रवि के मेषादि बारह राशियों में भ्रमण करने से छः प्रकार का होता है ।।३२३।। ग्रीष्मौ मेषवृषौ प्रोक्तः प्रावृण्मिथुनकर्कटौ । सिंहकन्ये स्मृता वर्षा तुलावृश्चिकयोः शरत् ।।३२४।। धनुर्ग्राहौ च हेमन्तो वसन्तः कुम्भमीनयोः ।।३२५।। जब सूर्य मेष तथा वृष राशि तक रहते हैं तब ग्रीष्म और जब मिथुन तथा कर्क तक होते हैं तब प्रावृट, इसी प्रकार सिंह से कन्या तक वर्षा तुला से वृश्चिक तक शरद, धनु से मकर तक हेमन्त और कुम्भ से मीन तक वसन्त ऋतु कहलाता है ॥३२४-३२५॥ मेषवृषौ रविणा संक्रान्तौ । एवं मिथुनकर्कटावित्यादि ।।३२४-३२५।। 'मेषवृषौ' पद से 'रवि से संकान्त मेष और वृष' इसी प्रकार 'मिथुनकर्कटौ' इत्यादि का भी अर्थ समझना चाहिये ।।३२४-३२५।। अन्ये तु- शिशिरः पुष्पसमयो ग्रीष्मो वर्षा शरद्धिमाः । माघादिमासयुग्मैः स्युऋर्तवः षट् क्रमादमी ।।३२६।। ऋतुओं के विषय में अन्य मत—शिशिर वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् और हेमन्त ये छः ऋतु माघ से लेकर दो-दो महीने के एक-एक ऋतु क्रम से होते हैं, जैसे—माघ-फाल्गुन शिशिर, चैत्र-वैशाख वसन्त, ज्येष्ठ-आषाढ़ ग्रीष्म, श्रावण-भाद्रपद वर्षा, आश्विन-कार्तिक शरद् और अगहनपौष हेमन्त ऋतु है ।।३२६।। अथर्तुषट्कनामविषयकमतभेदे हेतुमाह- गङ्गाया दक्षिणे देशे वृष्टेर्बाहुलभावतः । उभौ मुनिभिराख्यातौ प्रावृड्वर्षाभिधावृतू ।।३२७।। १. 'समा' इति पा. ।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५७ (१तस्या एवोत्तरे देशे हिमप्रचुरभावतः। एतावुभौ समाख्यातौ हेमन्तशिशिरावृतू ।।३२८।।) ऋतुओं के नाम में मतभेद का कारण—गङ्गा से दक्षिण देशों में अधिक वृष्टि होने से प्रावृट् तथा वर्षा ये दो पृथक्-पृथक् ऋतु मानते हैं किन्तु शीत कम होने से शिशिर ऋतु को नहीं मानते। इसी प्रकार गङ्गा के उत्तर देशों में हिम (ठण्डक) अधिक होने से हेमन्त तथा शिशिर ये दो पृथक्-पृथक् ऋतु मानते हैं किन्तु वर्षा कम होने से प्रावृट् को नहीं मानते ॥३२७-३२८॥ अथ दक्षिणोत्तरायणयोर्लक्षणं गुणांश्चाह- उत्तरायणमाद्यैस्तैः परैः स्याद्दक्षिणायनम्। आद्यमुष्णं बलहरं ततोऽन्यद्वलदं हिमम् ।।३२९।। दक्षिणायन तथा उत्तरायण के लक्षण और गुण—पूर्वोक्त छः ऋतुओं में से प्रथम तीन (शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म) ऋतुओं में सूर्य 'उत्तरायण' और आगे के तीन (वर्षा, शरद् और हेमन्त) ऋतुओं में 'दक्षिणायन' होता है। इन में जो पहला उत्तरायण है वह उष्णप्रधान तथा बल का हरण करने वाला और दूसरा जो दक्षिणायन है वह हिम प्रधान तथा बल का देने वाला होता है ॥३२९॥ अथ ऋतूनां गुणदोषानाह- हेमन्तः शीतलः स्निग्धः स्वादुर्जठरवह्निकृत् । शिशिरः शीतलोऽतीव रूक्षो वाताग्निवर्धनः ।।३३०।। ऋतुओं के गुण-दोष—हेमन्त ऋतु मनुष्यों के लिये शीतल, स्निग्ध, स्वादु, जठराग्नि को बढ़ाने वाला और शिशिर ऋतु शीतल, अत्यन्त रूक्ष, वायु तथा अग्नि का बढ़ानेवाला होता है ॥३३०॥ ❖ हेमन्तः स्वादुः प्रायेण द्रव्येषु स्वादुरसजनकः। एवमन्यत्रापि बोद्धव्यम् ।।३३०।। 'हेमन्त स्वादु है अर्थात् प्रायः करके द्रव्यों में मधुर रस का उत्पादक है' यह समझना चाहिये। इसी भाँति आगे जहाँ कहीं मधुर, कटुकादि रसों का नाम जिन-जिन ऋतुओं के गुण वर्णन में आवे वहाँ द्रव्यों में उन-उन रसों के उत्पादक वे ऋतुयें हैं ऐसा समझना चाहिये ॥३३०॥ वसन्तो मधुरः स्निग्धः श्लेष्मवृद्धिकरश्च सः। ग्रीष्मो रूक्षोऽतिकटुकः पित्तकृत्कफनाशनः ।।३३१।। वर्षाः शीता विदाहिन्यो वह्निमान्द्यानिलप्रदाः। शरदष्णा पित्तकर्त्री नृणां मध्यबलावहा. ।।३३२।। वसन्त ऋतु—मधुर, स्निग्ध और कफ की वृद्धि करने वाला है। ग्रीष्म ऋतु—रूक्ष, अत्यन्त कटु, पित्त का उत्पादक तथा कफ का नाशक है। वर्षा ऋतु—शीतल, दाहकारक, अग्नि की मन्दता तथा वायु की वृद्धि करने वाला है और शरद् ऋतु—उष्ण, पित्त का उत्पादक तथा मध्यम बल को देने वाला है ॥३३१-३३२॥ अथ कस्मिन् ऋतौ कस्य दोषस्य चयप्रकोपोपशमा भवन्तीति सहेतुकमाह- चयप्रकोपोपशमा वायोर्ग्रीष्मादिषु त्रिषु । वर्षाऽऽदिषु च पित्तस्य श्लेष्मणः शिशिरादिषु ।।३३३।। ऋतुभेद से दोषों के उपचयापचयादि—ग्रीष्मादि तीन ऋतुओं में वायु का, वर्षा आदि तीन ऋतुओं में पित्त का, शिशिर आदि तीन ऋतुओं में कफ का क्रम से चय (वृद्धि), प्रकोप तथा उपशम (शमन) होता है अर्थात् ग्रीष्म में वायु का चय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में उपशम होता है। एवं पित्त का वर्षा में चय, शरद् में प्रकोप तथा हेमन्त में उपशम होता है और कफ का—शिशिर में चय, वसन्त में प्रकोप तथा ग्रीष्म में उपशम होता है ॥३३३॥ १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

१५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चीयते लघुरूक्षाभिरोषधीभिः समीरणः । तद्विधस्तद्विधे देहे कालस्यौष्ण्यान्न कुप्यति ।।३३४।। वायु स्वभावतः लघु तथा रूक्ष है और ग्रीष्म-काल में जितनी ओषधियाँ हैं वे सब भी लघु तथा रूक्ष हो जाती हैं अतएव ओषधियों के सेवन से वायु और भी लघु तथा रूक्ष हो जाता है और उस समय मनुष्यों का शरीर भी लघु तथा रूक्ष होता है अतएव पूर्वोक्त प्रकार की वायु पूर्वोक्त प्रकार की देह में केवल सञ्चित ही होता है अर्थात् क्रमशः बढ़ता ही रहता है किन्तु जो कुपित नहीं होता उसमें केवल ग्रीष्मकाल की उष्णता ही कारण है ।।३३४।। ❖ तद्विधो रूक्षो लघुश्च । तद्विधे रूक्षे लघौ च ।।३३४।। ‘तद्विधः’ (उक्त प्रकार की वायु) इस पद से ‘रूक्ष और लघु स्वभाव वाली वायु और ‘तद्विधे’ (उक्त प्रकार के देह में) इस पद से’ तात्कालिक रूक्ष और लघु स्वभाव वाली देह में’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये ।।३३४।। अद्भिरम्लविपाकाभिरोषधीभिश्च तादृशम् । पित्तं याति चयं कोपं न तु कालस्य शैत्यतः ।।३३५।। पित्त स्वभावतः अम्लविपाकी है और वर्षा काल में जल और सभी ओषधियाँ भी अम्लविपाकी होती हैं अतएव उन्हीं अम्लविपाकी जल और ओषधियों के सेवन करने से अम्लविपाकी पित्त और भी अम्लविपाकी होकर मनुष्यों के शरीर में सञ्चित होने लगता है, किन्तु वर्षा का समय होने से शीत प्रबल रहता है अतएव उस समय वह (पित्त) कुपित नहीं होने पाता है ।।३३५।। चीयते स्निग्धशीताभिरुदकौषधिभिः कफः । तुल्ये च काले देहे च स्कन्नत्वान्न प्रकुप्यति ।।३३६।। कफ स्वभावतः स्निग्ध तथा शीतल पदार्थ है और शिशिर काल में जल और ओषधियाँ भी स्निग्ध तथा शीतल होती हैं अतएव ऐसे (स्निग्ध तथा शीतल) जल और ओषधियों के सेवन करने से स्निग्ध व शीतल स्वभाव कफ और भी स्निग्ध तथा शीतल हो जाता है उस समय मनुष्यों का शरीर भी स्निग्ध व शीतल होता है अत एव जलादि के समान गुण वाले अर्थात् स्निग्ध तथा शीतल काल व देह में कफ सञ्चित होता है किन्तु स्कन्नत्व अर्थात् देह में शीत की अधिकता से शुष्क होने के कारण वह (कफ) कुपित नहीं होता है ।।३३६।। ❖ तुल्ये च काले स्निग्धे शीतले च । स्कन्नत्वाद् देहे शुष्कत्वात् ।।३३६।। ‘तुल्ये च काले’ इस पद का ‘तात्कालिक जलादिकों के समान गुण वाले अर्थात् स्निग्ध व शीतल काल व देह में’ और ‘स्कन्नत्वाद्’ इस पद का ‘देह में शुष्क हो जाने से’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।३३६।। हिमे याति शमं पित्तं वायुः श्लेष्मा च चीयते । स वायुः शिशिरे कोपं यात्येवोपचितः१ कफः ।।३३७।। हेमन्त ऋतु में पित्त का शमन एवं वायु और कफ का सञ्चय होता है और वही सञ्चित वायु शिशिर ऋतु में कुपित होती है और कफ उस समय केवल उपचित (वृद्धि को प्राप्त) हो कर रहता है ।।३३७।। हेमन्ते सञ्चितः श्लेष्मा शिशिरे त्वतिचीयते । शीतस्निग्धगुरुद्रव्यैः शैत्यस्कन्नो न कुप्यति ।।३३८।। हेमन्त ऋतु में सञ्चित जो कफ है वह शिशिर ऋतु में शीतल, स्निग्ध और गुरुपाकी द्रव्यों के सेवन करने से अत्यन्त सञ्चित हो जाता है किन्तु शीत की अधिकता से कठिनता को प्राप्त हो जाने से कुपित नहीं होता ।।३३८।। ❖ स्कन्नः=कठिनीभूतः ।।३३८।। ‘स्कन्न’ का ‘कठिनीभूत’ अर्थात् ‘कठिनता को प्राप्त हो जाने से’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।३३८।। १. ‘यात्येवोपहित’ इति पा. ।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५९ इति कालस्वभावोऽयमाहारादिवशात्पुनः । चयादीन् यान्ति सद्योऽपि दोषाः काले विशेषतः ।।३३९।। इन पूर्वोक्त प्रकारों से जो यह वातादि दोषों का चय, कोप और शम होता है, उसका कारण काल का स्वभाव ही जानना चाहिये । किन्तु आहारादि कारणवश से भी वातादि सभी दोष सद्यः चय, कोप तथा शमभाव को प्राप्त होते हैं और विशेष कर अहोरात्र में भी अपने-अपने समयों में चयादि प्राप्त होते हैं ।।३३९।। ❖ (१चयादीन्) चयकोपोपशमान् पूर्वाह्णे वसन्तस्य लिङ्गम्, मध्याह्ने ग्रीष्मस्य, अपराह्णे प्रावृषः, प्रदोषे वार्षिकम् । शारदमर्धरात्रे, प्रत्यूषसि हेमन्तमुपलक्षयेत् । एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णवर्षा (२दिलक्षणम्) दोषोपचय प्रकोपोपशमैर्जानीयादिति सुश्रुतः ३ ।।३३९।। यहाँ 'चयादि' से 'चय, कोप तथा शम' का ग्रहण करना चाहिये और अहोरात्र में भी वातादि दोष अपने-अपने समयों में चयादि को प्राप्त होते हैं । इसी विषय में 'सुश्रुत' भी कहते हैं कि—'दिन के प्रथम भाग में वसन्त के, मध्याह्न में ग्रीष्म के, दिन के अन्त भाग में प्रावृड् के, प्रदोष में वर्षा के, अर्धरात्र में शरद के और प्रत्यूष (पिछली रात्रि) में हेमन्त के लक्षण उपस्थित होते हैं । इस प्रकार अहोरात्र को भी वर्ष की भाँति दोषों के चय, कोप तथा शम होने के द्वारा शीत, उष्ण तथा वर्षा आदि लक्षणों से युक्त समझना चाहिये' ।।३३९।। अथाकाले दोषवृद्धिमाह- चयकोपोपशमान्दोषा विहाराहारसेवनैः । समानैर्यान्त्यकालेऽपि विपरीतैर्विपर्ययम् ।।३४०।। अकाल में दोषों की वृद्धि—तुल्य आहार-विहार का सेवन करने से वातादि सभी दोष अकाल में भी अर्थात् उनके चयादि होने का समय न होने पर भी चय, कोप तथा उपशम को प्राप्त होते हैं और विपरीत आहार-विहार के सेवन करने से दोषों के चयादि का भी विपर्यय हो जाता है । ❖ समानैः=तुल्यैः, चयादियोग्यैरिति यावत् । विपर्ययं कालेऽपि वैपरीत्यं बोध्यम् ।।३४०।। 'समानैः' पदका 'तुल्य अर्थात् दोषों के चयादि होने के योग्य' और 'विपरीतैः' पद का 'चयादि होने के अयोग्य' तथा 'विपर्यय' पद का 'चयादि होने का काल उपस्थित होने पर भी विपरीत होता है अर्थात् दोषों का चयादि नहीं होता' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३४०।। अथ दोषचयलक्षणमाह सुश्रुतः- स्वस्थानस्थस्य दोषस्य वृद्धिः स्यात्स्तब्धकोष्ठता४। पीतावभासता वह्निमन्दता चाङ्गगौरवम् ।।३४१।। आलस्यं चयहेतौ तु द्वेषश्च चयलक्षणम् । सञ्चये ऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरां गतिम् ।।३४२।। ते तूत्तरासु गतिषु भवन्ति बलवत्तराः ।।३४३।। दोषों के चय होने के लक्षण—अपने स्थान में स्थित दोष की वृद्धि, कोष्ठ में स्तब्धता, शरीर में पीलापन, अग्नि की मन्दता, अङ्गों में गुरुता (भारीपन), आलस्य और दोषों के चय होने के कारण स्वरूप आहारादि से द्वेष (अरुचि) होना ये सब दोषों के चय होने के लक्षण हैं । सञ्चय होने के समय यदि औषधादि द्वारा दोषों की चिकित्सा कर दी जाय तो वे सञ्चय होने के बाद की गति अर्थात् प्रकोप को नहीं प्राप्त करते हैं । किन्तु चिकित्सा न करने से उत्तर गति (प्रकोप) को प्राप्त होने पर तो वे (दोष) अत्यन्त बलवान् हो जाते हैं । अतः सञ्चयावस्था ही में दोषों की चिकित्सा कर लेना उत्तम है ।।३४१-३४३।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ३. शमा इति पा. । ४. 'च्छवासे'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ वर्षत्तौ नियमानाह- वर्षासु प्रबलो वायुस्तस्मान्मिष्टादयस्त्रयः। रसाः सेव्या विशेषेण पवनस्योपशान्तये ।।३४४।। वर्षा ऋतु के नियम—वर्षाकाल में वायु प्रबल होती है अतः वायु की शान्ति के लिये विशेषरूप से मधुरादि तीनों रसों का सेवन करना चाहिये ।।३४४।। ❖ मिष्टादयस्त्रयः=मधुराम्ललवणाः ।।३४४।। 'मधुरादयस्त्रयः' अर्थात् मधुर, अम्ल और लवण इन तीन रसों से युक्त ।।३४४।। भवेद्वर्षासु वपुषः क्लिन्नत्वं यद्विशेषतः । यत्क्लेदशान्तये१ सेव्या अपि कट्वादयस्त्रयः ।।३४५।। वर्षाकाल में प्रायः करके शरीर क्लिन्न (आर्द्र) रहा करता है, उसकी शान्ति के लिये कटु आदि तीनों रसों का भी सेवन करना चाहिये ।।३४५।। कट्वादयस्त्रयः=कटुतिक्तकषायाः ।।३४५।। 'कट्वादयस्त्रयः' अर्थात् कटु, तिक्त तथा कसैला इन तीन रसों से युक्त ।।३४५।। स्वेदनं मर्दनं सेव्यं दध्युष्णाजाङ्गलामिषम् । शालयो२ यवगोधूमा जलं कौपं जलं च्युतम् ।।३४६।। न भजेत्पूर्वपवनं वृष्टिं घर्मं हिमं श्रमम् । नदीतीरं दिवास्वप्नं रूक्षं नित्यं च मैथुनम् ।।३४७।। वर्षाकाल में स्वेदन, मर्दन, गरम दही, जङ्गली जीवों का मांस, जौ, गेहूँ, शालि (अगहनि धान का चावल) और कूप तथा झरना का जलपान, पूर्वदिशा की वायु का सेवन, वर्षा में भीगना, घाम में घूमना, हिम (ओस) में सोना, परिश्रम, नदी के तट पर रहना, दिन में सोना, रूक्ष द्रव्यों का सेवन और नित्य मैथुन करना, इन सबको नहीं करना चाहिये ।।३४६-३४७।। अथ शरदृतौ नियमानाह- सर्पिः स्वादुकषायतिक्तकरसा यच्छीतलं यल्लघु क्षीरं स्वच्छसितैक्षवः पटुरसः स्वल्पं पलं जाङ्गलम् । गोधूमा यवमुद्गशालिसहिता नादेयमं शूदकं चन्द्रश्चन्दमिन्दुरादिरजनी३ माल्यं पटो निर्मलाः ।।३४८।। शरद् ऋतु के नियम—शरदऋतु में, घृत, मधुर, कसैला तथा तिक्त रस, शीतल तथा लघु पदार्थ, दूध, साफ शक्कर, गुड़, नमकीन पदार्थ, थोड़ी मात्रा में जङ्गली जीवों का मांस, गेहूँ, यव, मूंग, शालि (अग

में विश्राम तथा मधुर वार्तालाप, तालाबों में क्रीडा, पित्त का विरेचन एवं जो बलवान् व्यक्ति हो उनका" "रक्तमोक्षण (फस्त खुलवाना) ये सब भी शरद ऋतु में हितकर है और दही, व्यायाम (कसरत), अम्ल, कटु, उष्ण और" "तीक्ष्ण पदार्थों का सेवन, दिन में सोना और ओस तथा घाम का सेवन करना वर्ज्य है ॥३४९॥"

*   :
    "इक्ष्वः शालयो मुद्गाः सरोऽम्भः क्वथितं पयः । शरद्येतानि पथ्यानि प्रदोषे चेन्दुरश्मयः ॥३५०॥"
    Wait! Is it "इक्ष्वः" or "इक्षवः"?
    Look at the first word: `इ` `क` `्` `ष` `्` `व` `ः` -> "इक्ष्वः" or "इक्षवः"?
    There is NO virama on ष! It is `इ` `क्ष` `व` `ः` = "इक्षवः"!
    Let's look closely: `इ` `क्ष` `व` `ः`. It's definitely "इक्षवः"!
    "इक्षवः शालयो मुद्गाः सरोऽम्भः क्वथितं पयः । शरद्येतानि पथ्यानि प्रदोषे

१६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मिष्टमम्लं दधि स्निग्धं दिवास्वप्नं च दुर्जरम्। अवश्यायमपि प्राज्ञो वसन्ते परिवर्जयेत्।।३५४।। वसन्त ऋतु के नियम—वसन्त ऋतु में औषधों के द्वारा वमन तथा औषधों का नस लेना, मधु के साथ हरड़ का खाना, कसरत करना, उबटन लगाना, कफ नाशक औषधों का कुल्ला करना, लोहे की शलाका में खोंस कर अग्नि में सके हुये जङ्गली जीवों का मांस खाना, गेहूँ, अनेक प्रकार के चावल, मूँग, यव और साठी चावल खाना, चन्दन, केसर और अगर का लेप करना और रूक्ष, कटु रसयुक्त, उष्ण तथा हल्के पदार्थों का सेवन करना हितकर है और मीठा, खट्टा तथा स्निग्ध पदार्थ एवं दही का खाना और दिन में सोना तथा देर में पचने वाले पदार्थों का खाना और ओस में सोना अहितकर है अतः वसन्त ऋतु में इन सबों का परित्याग अवश्य कर देवे ।।३५३-३५४।। अथ ग्रीष्मर्तुनियमानाह- स्वादुस्निग्धहिमं लघु द्रवमयं द्रव्यं रसालां सितांसक्तुक्षीरमजाङ्गलानि सितया शालिं रसं मांसजम्। शीतांशुं शयनं दिवा मलयजं शीतं पयः पानकं सेवेतोष्णादिने त्यजेत्तु कटुकक्षाराम्लघर्मश्रमान् ।। ३५५ ।। ग्रीष्म ऋतु के नियम—ग्रीष्म ऋतु में मधुर रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, पचने में हल्के द्रवरूपं (पतला) द्रव्यों का सेवन, सिखरन, चीनी तथा चीनी मिले हुए सत्तू, दूध, जङ्गली जीवों से भिन्न जीवों का मांस, शालि धान्य के चावल, मांसरस, चन्द्रसेवन (चाँदनी में सोना), दिन में सोना, चन्दन लगाना, शीतल जल और शर्वत पीना हितकर होता है और कटुक्षार (नमकीन) तथा अम्ल रस युक्त द्रव्यों का सेवन, घाम में रहना और परिश्रम करना अहितकर है अतः इन सब कामों को त्याग देना चाहिये ।।३५५।। अथ पूर्वोक्तर्तुचर्य्याऽऽचरणे फलमाह- ऋतुष्वेपु य एतैस्तु विधिभिर्वर्त्तते नरः। दोषानृतुकृतानैव लभते स कदाचन ।। ३५६ ।। इति श्रीलटकनतनय-श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे दिनचर्यादिप्रकरणं पञ्चमम् ।। ५ ।। ऋतुचर्याओं का आचरण करने से लाभ—जिन-जिन ऋतुओं में जो-जो विधियाँ कही हुई हैं, उन-उन ऋतुओं में उन-उन विधियों के अनुसार जो मनुष्य रहता है, उसे उन-उन ऋतुओं में होने वाले कोई भी दोष कभी नहीं प्राप्त होते हैं ।।३५६।। इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां पञ्चमदिनचर्यादिप्रकरणम् समाप्तम् ।।५।।

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् अथ वाग्भटोक्तं व्याधेर्लक्षणम्- रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता। रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ।।१।। रोग के लक्षण-दोषों की विषमता ही को रोग तथा दोषों की समता ही को अरोगता (रोगों का न रहना) कहते हैं, इनमें से जो रोग हैं वे प्राणियों को दुःख देनेवाले होते हैं और वे ज्वर आदि कहलाते हैं ।।१।। ते च स्वाभाविकाः केचित्केचिदागन्तवः स्मृताः। मानसाः केचिदाख्याताः कथिताः केऽपि कायिकाः ।।२।। चार प्रकार के रोग-उन रोगों में कोई 'स्वाभाविक', कोई 'आगन्तुक', कोई 'मानस' और कोई 'कायिक' कहलाते हैं ।।२।। ❖ तत्र स्वाभाविकाः = शरीरस्वभावादेव जाताः क्षुत्पिपासासुषुप्तिजरामृत्युप्रभृतयः। अथवा स्वभावादुत्पत्तेर्जाता स्वाभाविकाः = सहजा इति यावत्। ते च जन्मान्धत्वादयः। आगन्तवोऽभिघातादिजनिताः। अथवा जन्मोत्तरभाविनः। मानसाः = कामक्रोधलोभमोहभयाभिमानदैन्यपैशुन्यशोकविषादेर्ष्याऽसूया-मात्सर्यप्रभृतयः, अथवा उन्मादापस्मारमूर्च्छाभ्रममोहतमःसंन्यासप्रभृतयः। कायिकाः = पाण्डुरोगप्रभृतयः ।।२।। उनमें 'स्वाभाविक' रोग वे कहलाते हैं जो शरीर के स्वभाव से ही उत्पन्न होते हैं, जैसे—भूख, प्यास, गाढ़ निद्रा, वृद्धता तथा मृत्यु आदि। अथवा जो जन्म से (माँ के पेट से) ही उत्पन्न होते हैं, वे भी 'स्वाभाविक' कहलाते हैं। जैसे— जन्म से ही अन्धा, बहिरा आदि। आगन्तुक-रोग वे हैं जो चोट आदि लगने से अथवा जन्म के बाद होनेवाले हैं। 'मानस' रोग वे कहलाते हैं, जो मन में उत्पन्न होते हैं, जैसे-काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, अभिमान, दीनता, पिशुनता (चुगलखोरी), शोक, विषाद, ईर्ष्या, असूया और मत्सरता आदि, अथवा उन्माद (पागलपन), अपस्मार (मिर्गी), मूर्च्छा, भ्रम, मोह, अन्धकार और संन्यास आदि। 'कायिक' रोग वे कहलाते हैं, जो शरीर में उत्पन्न होते हैं, जैसे-पाण्डु आदि ।।२।। अथ व्याधिभेदानाह- कर्मजाः कथिताः केचिद्दोषजाः सन्ति चापरे। कर्मदोषोद्भवाश्चान्ये व्याधयस्त्रिविधाः स्मृताः ।।३।। व्याधियों के भेद—कोई व्याधियाँ 'कर्मज' और कोई 'दोषज' तथा कोई कर्मज तथा दोषज दोनों होने से 'कर्मदोषोद्भव' अर्थात् 'कर्मदोषज' कहलाती हैं। इस प्रकार हेतुभेद से व्याधियों के तीन भेद होते हैं ।।३।। तत्र कर्मजान् व्याधीनाह- यत्राक्तनं दुष्कर्म प्रबलं केवलभोगनाश्यम्, प्रायश्चित्तनाश्यं वा, ततो जाताः, न तु दुष्टवातादिदोषेण जनितास्तथा- यथाशास्त्रं तु निर्णीतो यथाव्याधिचिकित्सतः। न शमं याति यो व्याधिः स ज्ञेयः कर्मजो बुधैः ।।१।। 'कर्मज' व्याधि—जो पूर्वजन्मकृत दुष्कर्म (पाप) प्रबल होते हैं वे केवल भोग से अथवा प्रायश्चित्त से नाश होने वाले होते हैं, अत एव जो व्याधियाँ उन्हीं से उत्पन्न हैं, किन्तु दूषित वातादि दोषों से नहीं उत्पन्न हुई हैं, वे ही 'कर्मज' कहलाती हैं। उसका लक्षण यह है कि—'जिसका शास्त्रानुसार निर्णय करके उसी निर्णीत के अनुकूल चिकित्सा भी हुई हो किन्तु फिर भी जो शान्त न हो उसी को 'कर्मज' व्याधि जानना चाहिये ।।१।।