भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५१ इस विषय में 'सुश्रुत' का मत है कि—सभी ऋतुओं में तीन-तीन दिन के बाद और ग्रीष्म ऋतु में एक-एक पक्ष के बाद स्त्रीसङ्ग करे ॥२९१॥ क्वसमेयातसंगच्छेत्। घर्मे = ग्रीष्मे ॥२९१॥ 'समेयात्' का 'स्त्रीसङ्ग करे' और 'धर्मे' का 'ग्रीष्म ऋतु में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२९१॥ अथर्तुभेदेन स्त्रीसेवनसमयभेदमाह- शीते रात्रौ दिवा ग्रीष्मे वसन्ते तु दिवा निशि। वर्षासु वारिदध्वाने शरत्सु सरसः १स्मरः ॥२९२॥ ऋतुभेद से स्त्रीसेवन के समय—शीतकाल में रात्रि में, ग्रीष्म ऋतु में दिन में, वसन्त ऋतु में दिन या रात्रि दोनों ही में, वर्षा ऋतु में जब बादल गरजे तब अन्य ऋतु में जब काम की प्रबलता हो तभी सम्भोग करना चाहिये ॥२९२॥ अथ स्त्रीसेवननिषिद्धसमयमाह- उपेयात्पुरुषो नारीं संध्ययोर्न च पर्वसु। गोसर्गे चार्द्धरात्रे च तथा मध्यदिनेऽपि च ॥२९३॥ स्त्रीसम्भोग का निषिद्ध समय—प्रातः और सायं की सन्ध्या, पर्व-दिन (अमावस्या, पूर्णिमा आदि तिथि विशेष), गोसर्ग (गौओं को चराने के लिये प्रातः काल छोड़ने के समय), आधीरात तथा मध्याह्न (दोपहर) इन सब समयों में स्त्री के साथ सम्भोग नहीं करना चाहिये ॥२९३॥ अथ स्त्रीसेवनयोग्यस्थानमाह- विहारं भार्यया कुर्याद् देशेऽतिशयसंवृते। रम्ये श्राव्याङ्गनागाने सुगन्धे सुखमारुते ॥२९४॥ स्त्रीसम्भोग करने योग्य स्थान—अत्यन्त गुप्त अर्थात् जहाँ किसी दूसरे व्यक्ति की दृष्टि न पड़ती हो तथा रम्य और जहाँ पर स्त्रियों का सुमधुर गान सुनाई पड़ता हो एवं सुगन्धित तथा सुखकर वायु बह रही हो ऐसे स्थानों में स्त्री के साथ विहार (सम्भोगादि) कार्य करना चाहिये ॥२९४॥ अथ स्त्रीसेवनअयोग्यस्थानमाह- देशे गुरुजनासन्ने विवृतेऽतित्रपाकरे। श्रूयमाणे व्यथाहेतुवचने न रमेत ना ॥२९५॥ स्त्रीसम्भोग के अयोग्य स्थान—जो स्थान गुरुजनों के स्थान के निकट हो तथा लोगों की दृष्टि पड़ने के लायक हो तथा अत्यन्त लज्जा उत्पन्न करनेवाला हो और जहाँ पर मन में व्यथा पहुँचाने वाले वचन सुनाई पड़ते हों ऐसे स्थान में स्त्री सम्भोग नहीं करना चाहिये ॥२९५॥ अथ स्त्रीसेवनकालिकपुरुषाणां वेषादिकमाह- स्नातश्चन्दनलिप्ताङ्गः सुगन्धः सुमनोऽन्वितः। भुक्तवृष्यः सुवसनः सुवेषः समलंकृतः ॥२९६॥ ताम्बूलवदनः पत्यामनुरक्तोऽधिकस्मरः। पुत्रार्थी पुरुषो नारीमुपेयाच्छयने शुभे ॥२९७॥ स्त्रीसंभोग करने के समय पुत्रार्थी पुरुषों का वेषादि—पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पुरुष स्नान करके शरीर में चन्दन, इत्र आदि सुगन्धित द्रव्य लगा कर, प्रसन्न चित्त से वीर्यवर्धक पदार्थ खाये हुये, सुन्दर वस्त्र तथा सुन्दर वेष से भलीभाँति अलङ्कृत होकर मुख में पान का बीड़ा रखे हुये, पत्नी के विषय में अनुरक्त होकर अधिक काम चेष्टा से युक्त सुन्दर शय्या पर स्त्री के साथ सम्भोग करे ॥२९६-२९७॥ अथ मैथुनानर्हपुरुषानाह- अत्याशितोऽधृतिःक्षुद्वान्सव्यथाङ्गः पिपासितः। बालो वृद्धोऽन्यवेगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ॥२९८॥ मैथुन करने के अयोग्य पुरुष—अत्यन्त भोजन किया हुआ, काम से अधीर चित्त वाला, भूखा, अङ्ग पीड़ा से युक्त, प्यासा, बालक, वृद्ध, मूत्रादि वेगसे युक्त अथवा रोगी पुरुष को मैथुन नहीं करना चाहिये ॥२९८॥ १. 'सरसी' ति पा.। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA