भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ सेवनेन सद्यः प्राणकराणि द्रव्याण्याह- सद्यो मांसं नवं चान्नं बाला स्त्री क्षीरभोजनम् । घृतमुष्णोदके स्नानं सद्यःप्राणकराणिषट् ।।२८५।। सद्यः बल उत्पन्न करने वाले पदार्थ-(१) ताजा मांस, (२) नवीन अन्न, (३) बाला स्त्री, (४) दूध तथा (५) घृत का भोजन और (६) उष्णजल से स्नान ये छः पदार्थ सद्यःप्राण (बल) उत्पन्न करने वाले होते हैं ।।२८५।। ❖ प्राणशब्दोऽत्र बलवाचकः ।।२८५।। 'प्राण' शब्द यहाँ 'बल' का वाचक है ।।२८५।। अथ सेवनेन सद्यः प्राणहराणि द्रव्याण्याह- पूतिमांसं स्त्रियो वृद्धा बालार्कस्तरुणं दधि । प्रभाते मैथुनं निद्रा सद्यःप्राणहराणि षट् ।।२८६।। सद्यः बल को हरण करने वाले पदार्थ-(१) दुर्गन्धियुक्त मांस, (२) वृद्धा स्त्री, (३) कन्याराशिस्थित सूर्य की धूप, (४) तत्काल का जमाया हुआ दही, (५) प्रातः काल का मैथुन और (६) प्रातः काल में सोते रहना ये छः पदार्थ सेवन करने पर प्राण (बल) के हरण करने वाले होते हैं ।।२८६।। ❖ बालार्कः=कन्यार्कः ।।२८६।। 'बालार्कः' से 'कन्याराशिस्थित (क्वार का) सूर्य की धूप, यह अर्थ समझना चाहिये ।।२८६।। अथ वृद्धस्य तरुणीगमने तरुणस्य च वृद्धागमने फलमाह- वृद्धोऽपि तरुणीं गत्वा तरुणत्वमवाप्नुयात् । वयोधिकां स्त्रियं गत्वा तरुणः स्थविरायते ।।२८७।। तरुणी और वृद्धा स्त्रीसंभोग का फल-वृद्ध पुरुष यदि तरुणी स्त्री के साथ भोग करे तो वह भी तरुण हो जाता है और तरुण पुरुष यदि वृद्धा स्त्री के साथ संभोग करे तो वह भी वृद्ध की भाँति हो जाता है ।।२८७।। अथ नियमपूर्वक स्त्रीगमने गुणानाह- आयुष्मन्तो मन्दजरा वपुर्वर्णबलान्विताः । स्थिरोपचितमांसाश्च भवन्ति स्त्रीषु संयताः ।।२८८।। नियम पूर्वक स्त्री संभोग के गुण-जो लोग स्त्रियों के विषय में संयत भाव से रहते हैं अर्थात् नियम पूर्वक स्त्रीगमन करते हैं, वे दीर्घ आयुवाले होते हैं तथा उन्हें वृद्धावस्था धीरे-धीरे देर में आती है और उनके शरीर का वर्ण और बल देर तक बना रहता है तथा मांस की दृढ़ता तथा वृद्धि भी चिरकाल तक बनी रहती है ।।२८८।। अथर्तुभेदेन स्त्रीसेवनप्रकारमाह- सेवेत कामतः कामं बलाद्वाजीकृतो हिमे । प्रकामं तु निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ।।२८९।। ऋतु भेद से स्त्री सेवन का प्रकार-हेमन्त (अगहण तथा पौष) ऋतु में तो वाजीकरण औषधियाँ खाकर बलानुसार किन्तु शिशिर (माघ व फागुन) ऋतु में तो यथेच्छ स्त्री सेवन करना चाहिये ।।२८९।। अथ वसन्तादिष्वृतुषु कियता कालेन स्त्री सेवनं युक्तमित्याह- त्र्यहाद्वसन्तशरदोः पक्षाद् दृष्टिनिदाघयोः ।।२९०।। वसन्तादि ऋतुओं में स्त्रीसेवन के मध्यन्तर काल-वसन्त तथा शरद् ऋतु में तीन-तीन दिन के बाद और वर्षा तथा ग्रीष्म ऋतु में एक-एक पक्ष (१५ दिन) के बाद स्त्री सम्भोग करना चाहिये ।।२९०।। सुश्रुतस्तु- त्रिभिस्त्रिभिरहोभिर्हि समेयात्प्रमदां नरः । सर्वेष्वृतुषु धर्मे तु पक्षात्पक्षाद् व्रजेद् बुधः ।।२९१।।