भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४९ रात्रि की चाँदनी, ओस और अन्धकार के गुण—रात्रि की चाँदनी शीतल, कामदेवसम्बन्धी आनन्द को बढ़ाने वाली, प्यास, पित्त तथा दाह को दूर करने वाली होती है और रात्रि की ओस चाँदनी की अपेक्षा स्वल्पमात्रा में पूर्वोक्त गुणों से युक्त होती है किन्तु वायु और कफ को उत्पन्न करनेवाली होता है तथा रात्रि का अन्धकार भयदायक, मोह तथा दिशाओं के विषय में भ्रम उत्पन्न करने वाला, पित्त और कफ को दूर करने वाला, कामवर्धक एवं शरीर में क्लान्ति उत्पन्न करने वाला होता है ॥२७७-२७८॥ अथ रात्रौ भोजनस्य समयं परिमाणं चाह— रात्रौ च भोजनं कुर्यात्प्रथमप्रहरान्तरे। किञ्चिदूनं समश्नीयाद् दुर्जरं तत्र वर्जयेत् ॥२७९॥ रात्रि भोजन का विधान—रात्रि में प्रथम प्रहर के मध्य में ही दिन की अपेक्षा कुछ कम भोजन करना चाहिये, उसमें जो देर में पचने वाला आहार हो उसे नहीं खाना चाहिये ॥२७९॥ अथ मैथुनमाह, तत्रादौ मैथुनेच्छायां सत्यामपि तदकरणे दोषानाह— शरीरे जायते नित्यं देहिनः सुरतस्पृहा। अव्यावायान्मेह मेदोवृद्धिः शिथिलता तनोः ॥२८०॥ इच्छा होने पर मैथुन न करने से दोष—मनुष्यों के शरीर में प्रायः मैथुन करने की इच्छा नित्य ही उत्पन्न होती है, किन्तु जब प्रबल इच्छा हो उस समय यदि मैथुन न किया जाय तो उससे प्रमेह तथा मेद की वृद्धि और शरीर में शिथिलता होती है ॥२८०॥ अथ स्त्रीणां बालाद्यवस्थानामवधिमाह— बालेति गीयते नारी यावद्वर्षाणि षोडश। ततस्तु तरुणी ज्ञेया द्वात्रिंशद्वत्सरावधि ॥२८१॥ स्त्रियों की बालादि अवस्था का विचार—स्त्रियाँ १६ वर्ष तक 'बाला' उसके बाद ३२ वर्ष तक 'तरुणी' कहलाती हैं ॥२८१॥ तदूर्ध्वमधिरूढा स्यात्पञ्चाशद्वत्सरावधि। वृद्धा तत्परतो ज्ञेया सुरतोत्सववर्जिता ॥२८१॥ तदुपरान्त ५० वर्ष तक प्रौढ़ा तथा उसके बाद वृद्धा कहलाती हैं और उस समय उनके हृदय में कामचेष्टा बहुत कम होती है अतः सुन्दर रति के लिये वे त्याज्य हैं ॥२८२॥ अधिरूढा=प्रौढ़ा ॥२८२॥ 'अधिरूढा' का 'प्रौढ़ा' अर्थ समझना चाहिये ॥२८२॥ अथ बालाऽऽदिस्त्रीणां सेवनस्य समयं फलञ्चाह— निदाघशरयोर्बाला हिता विषयिणां१ मता। तरुणी शीतसमये प्रौढा वर्षावसन्तयोः ॥२८३॥ नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्धयते बलम्। तरुणी ह्रासयेच्छक्तिं प्रौढोद्भावयते जराम् ॥२८४॥ बाला, तरुणी और प्रौढ़ा स्त्री सेवन का समय—विषयी पुरुषों के लिये ग्रीष्म तथा शरद् ऋतु में 'बाला', शीतकाल में 'तरुणी' और वर्षा तथा वसन्त ऋतु में 'प्रौढ़ा' स्त्री हितकारिणी मानी गई हैं। यदि नित्य 'बाला' स्त्री का सेवन किया जाय तो वह नित्य बल को बढ़ाती हैं, किन्तु नित्य सेवन करने से 'तरुणी' स्त्री शक्ति का ह्रास करती हैं तथा नित्य सेवन करने से 'प्रौढ़ा' स्त्री पुरुष को वृद्धावस्था उत्पन्न करके वृद्ध बना देती है ॥२८३-२८४॥ १. 'विषयिणी'ति पा. अयुक्तम्।