भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१४८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे के समय, उदय तथा अस्त होते हुये सूर्य को तथा जल में पड़े हुये सूर्य के प्रतिबिम्ब को भी कभी न देखे। निरन्तर सूक्ष्म, चमकती हुई, अपवित्र तथा अप्रिय वस्तु को न देखे। इन्द्र धनुष को कभी किसी दूसरे को न दिखावे। बलवान् पुरुष के साथ कभी युद्ध करने की इच्छा न करे। शिर के ऊपर बोझ रख कर न ढोवे। हाथ आदि से ठोक कर शरीर न बजावे। हाथ से केशों को कभी न हिलावे। पूज्य व्यक्तियों के तथा विवाहित स्त्री-पुरुष के मध्य से होकर न जावे और कभी भी शत्रु तथा वेश्या का अन्न न खावे ॥२६२-२६८॥ प्रतिभूर्न भवेत्क्वापि न च साक्षी वृथा भवेत् ॥२६९॥ कभी किसी का जामिन न होवे तथा व्यर्थ किसी का साक्षी (गवाह) भी न होवे ॥२६९॥ ❖ प्रतिभूः = जामिन् ॥२६९॥ 'प्रतिभूः' अर्थात् 'जामिन' जमानतदार ॥२६९॥ स्थागं १ न धारयेज्जातु द्यूतं दूरात्परित्यजेत् ॥२७०॥ विश्वासं नाचरेत्