भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 200

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४७ विरत नहीं होना चाहिये तथा किसी भी व्यक्ति के फल अर्थात् उद्योगादि करने से प्राप्त हुये धनादि के विषय में ईर्ष्या (डाह) नहीं करना चाहिये ॥२५८॥ ❖ हेतौ=फलहेतौ उद्यमे, फले=धनादौ ।। २५८ ।। 'हेतु' से 'फल प्राप्ति के हेतुस्वरूप उद्यम' तथा 'फल' से 'धनादि' अर्थ समझना चाहिये ॥२५८॥ वेगान्न धारयेज्जातु मनोवेगान्विधारयेत् । न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतानतिलालयेत् ।।२५९।। मलमूत्रादि के वेगों को कभी रोकना नहीं चाहिये। किन्तु मन के वेग को सदा रोकना चाहिये। इन्द्रयों को पीड़ित अर्थात् एकाएक हठ पूर्वक विषयों से विरत नहीं करना चाहिये अर्थात् शनैः-शनैः इन्द्रियों को वश में लाना चाहिये और इन्द्रियों का अत्यन्त लालन भी नहीं करना चाहिये अर्थात् शब्दस्पर्शादि विषयों का अधिक ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥२५९॥ वर्षाऽऽतपादिषुच्छत्री दण्डी रात्रौ भषेषु च । सोपानत्कस्तनुं रक्षेद्विचरेद्युगमात्रदृक् ।। २६० ।। वर्षा तथा धूप आदि होने पर छाता लगाकर एवं रात्रि तथा भय उपस्थित होने पर दण्ड धारण कर सर्वदा शरीर की रक्षा करनी चाहिये। जूता पहन कर आगे की ओर चार हाथ तक की भूमि को देखता हुआ चलना चाहिये ॥२६०॥ ❖ युगमात्रदृक्= अग्रतो हस्तचतुष्टयमितां भूमिं पश्यन् ।।२६०।। 'युगमात्रदृक्' अर्थात् 'आगे चार हाथ तक की भूमि को देखता हुआ' ॥२६०॥ नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाग्निस्कन्धमभिव्रजेत् । सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद्दुष्टयानकम् ।।२६१।। नदी को बाहुओं से तैर कर नहीं किन्तु नौका आदि से पार करना चाहिये और जिस ओर अग्नि-समूह हो उधर नहीं जाना चाहिये। जिस नौका पर सवार होने से डूबने का और जिस वृक्ष पर चढ़ने से टूट जाने या स्वयं गिर पड़ने का सन्देह हो ऐसी नौका तथा वृक्ष पर नहीं चढ़ना चाहिये। दुष्ट-वाहन-हाथी, घोड़ा आदि पर भी नहीं चढ़ना चाहिये ॥२६१॥ ❖ दुष्टयानं=दुष्टगजघोटकादि ।।२६१।। 'दुष्टयान' अर्थात् 'बदमाश घोड़े और मतवाले हाथी आदि वाहन' ॥२६१॥ नासंवृतमुखं कुर्यात्सभायां च विचक्षणः । कासं हासं¹ तथोद्गारं जृम्भणं क्षवथुं यथा ।। २६२ ।। नासिकां न विकुष्णीयान्नासीतोत्कटकः क्वचित् । नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेन्न नखेन लिखेद्भुवम् ।। २६३ ।। सम्मार्जनीरजो नैव देहे दद्यात्कदाचन । न नखेन तृणं छिन्द्यान्नोच्छिष्टो ब्राह्मणं स्पृशेत् ।। २६४ ।। नोपरक्तं न चोद्यन्तं नास्तं यातं दिवाकरम् । सर्वथा न समीक्षेत न जले प्रतिबिम्बितम् ।।२६५।। नेक्षेत सततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च । पौरन्दरं धनुनैव दर्शयेत्कमपि क्वचित् ।।२६६।। नेच्छेद्वलवता युद्धं न भारं शिरसा वहेत् । गात्रं न वादयेत्केशान्हस्तेन धुनयान्न च ।।२६७।। न गच्छेत्पूज्ययोर्मध्ये दम्पत्योरन्तरेण च । रिपोरन्नं न भुञ्जीत गणिकाऽन्नमपि क्वचित् ।। २६८ ।। बुद्धिमान् मनुष्य सभा के मध्य में हाथ आदि से बिना मुख ढँके खाँसना, हँसना, उद्गार (डकार) तथा जँभाई लेना एवं छींकना तथा नाक से मैल निकालना इन सब कर्मों को न करें। (मल-मूत्र त्याग करने के अतिरिक्त और) किसी समय में उत्कटासन (उँकरू) होकर तथा अधिक देर तक जानुओं (घुटनों) को ऊँचे करके नहीं बैठे। नख से भूमि को न खोदे। शरीर पर कभी भी.झाड़ू की धूलि न पड़ने दे। नख से तृण को न तोड़े। जूठे मुख होकर ब्राह्मण को न छुवे। ग्रहण


१. 'श्वासमिति पाठः ।