भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ रोगी=मैथुनसंवर्जनीयरोगयुक्तः ।।२९८।। 'रोगी' अर्थात् 'जिस रोग में मैथुन करना वर्जित हो उस रोग से युक्त' रोगी ।।२९८।। अथ मैथुनयोग्याः स्त्रियःआह- भार्यां रूपगुणोपेतां तुल्यशीलां कुलोद्भवाम् । अतिकामोऽभिकामां तु हृष्टो हृष्टामलंकृताम् ।। सेवेत प्रमदां युक्त्या वाजीकरणबृंहितः ।। २९९ ।। मैथुन के योग्य स्त्री—वाजीकरण ओषधियों से मैथुन करने में विशेष शक्ति को प्राप्त कर रूप और सद्गुणों से युक्त, अपने समान शीलवाली, अच्छे कुल में उत्पन्न अत्यन्त कामासक्त, प्रसन्न चित्तवाली और अलङ्कारों से युक्त स्त्री के साथ विधिपूर्वक संभोग करना चाहिये ।।२९९ ।। अथ मैथुनायोग्याः स्त्रियःआह- रजस्वलामकामां च मलिनामप्रियां तथा ।। ३०० ।। वर्णवृद्धां वयोवृद्धां तथा व्याधिप्रपीडिताम् । हीनाङ्गीं गर्भिणीं द्वेष्यां योनिरोगसमन्विताम् ।। ३०१ ।। सगोत्रां गुरुपत्नीं च तथा प्रव्रजितामपि । नाधिगच्छेत् पुमान्नारीं भूरिवैगुण्यशङ्कया ।। ३०२ ।। मैथुन के अयोग्य स्त्री—रजस्वला, काम चेष्टा से हीन, मलिन वेषवाली, मनको प्रिय न लगने वाली, अपने से बड़ी जाति व अवस्था वाली, रोग से पीड़ित, हीन अङ्गोंवाली, गर्भिणी, द्वेष्या (द्वेष करने वाली), योनिसम्बन्धी रोग वाली, अपने गोत्र में उत्पन्न हुई, गुरुकी पत्नी तथा संन्यास ग्रहण किये हुई स्त्रियों के साथ पुरुष को कभी संभोग न करना चाहिये क्योंकि ऐसी स्त्रियों के साथ संभोग करने से हानि होती है ।।३००-३०२।। अथ पुनर्विशेषेण रजस्वलागमने दोषनाह- रजस्वलो गतवतो नरस्यासंयतात्मनः । दृष्ट्यायुस्तेजसां हानिरधर्मश्च ततो भवेत् ।। ३०३ ।। रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करने से दोष—जो पुरुष इन्द्रिय के वशीभूत होकर रजस्वला स्त्री के साथ संभोग करते हैं उनकी दृष्टि, आयु तथा तेज की हानि और अधर्म भी होता है ।।३०३।। अथ पुनर्विशेषेण सन्यासिन्यादीनां स्त्रीणां गमने पर्वसु च स्त्रीगमने दोषमाह- लिंगिनीं गुरुपत्नीं च सगोत्रामथ पर्वसु । वृद्धां च सन्ध्ययोश्चापि गच्छतो जीवनक्षयः ।। ३०४ ।। संन्यासिनी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में दोषान्तर—संन्यास ग्रहण किये हुई, गुरु की पत्नी, अपने गोत्र में उत्पन्न हुई तथा वृद्धा स्त्रियों के साथ संभोग करने से तथा पर्व (अमावास्यादि विशेष तिथियों) में एवं दोनों काल की सन्ध्याओं में स्त्री गमन करने वाले पुरुष की आयु नष्ट होती हैं ।।३०४।। ❖ लिङ्गिनीं=प्रव्रजिताम् ।। ३०४ ।। 'लिङ्गिनी' पद का अर्थ है 'प्रव्रजिता अर्थात् संन्यास ग्रहण किये हुई ।।३०४।। अथ पुनर्विशेषेण गर्भिण्यादिषु गमने प्रकाशे स्त्रीसेवने च दोषानाह- गर्भिण्यां गर्भपीडा स्याद्व्याधितायां बलक्षयः ।। ३०५ ।। हीनाङ्गीं मलिनां द्वेष्यां क्षामां बन्ध्यामसंवृते । देशेऽभिगच्छतो रेतः क्षीणं म्लानं मनो भवेत् ।। ३०६ ।। गर्भिणी आदि स्त्रियों के साथ संभोग करने में दोषान्तर—गर्भिणी स्त्रियों के साथ संभोग करने से गर्भ को पीड़ा होती है, रोगिणी स्त्रियों के साथ गमन करने से बल का क्षय होता है। तथा हीन अङ्गवाली, मैली-कुचैली रहनेवाली,