भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५३ द्वेष्या (द्वेष करनेवाली), दुबली-पतली या बन्ध्या स्त्री के साथ अथवा खुले बेपर्द स्थान में स्त्रीगमन करने से पुरुषों का वीर्य क्षीण तथा मन म्लान हो जाता है ॥३०५-३०६॥ ❖ गर्भिणीं गर्भवासदिवसाद् द्वितीये मासि गर्भस्थितेरनिश्चये यथोक्तनक्षत्रादिलाभाभावे वा तृतीये मासि पुंसवने कृते नाभिगच्छेत्। यतो पुंसवनानन्तरमाह व्यासः- ततस्त्यजेन्नदीतीरं देवखातोदकं तथा । भर्तुः शय्यां मृतापत्यां तथैवामिषभोजनम् ।।४।। 'गर्भिणी' अर्थात् गर्भ की स्थिति होने के दिन से दूसरे मास में अथवा गर्भस्थिति का अनिश्चय होने पर किंवा जैसा चाहिये वैसा ज्योतिः शास्त्रोक्त पुंसवन के योग्य नक्षत्रादि के न मिलने पर तीसरे मास में पुंसवन संस्कार हो चुकने पर गर्भिणी स्त्री का सङ्ग नहीं करना चाहिये। 'पुंसवन' के बाद गर्भिणी स्त्रियों के लिए व्यास का मत है कि—पुंसवन संस्कार हो चुकने के बाद गर्भिणी स्त्री नदी के तीर पर जाना, प्राकृतिक जलाशयों का जल पीना, पति की शय्या पर सोना अर्थात् मैथुन करना, मरी हुई सन्तान वाली स्त्रियों का साथ तथा मांस भोजन करना छोड़ देवे ॥४॥ ❖ अन्यच्च— आमिषस्याशनं यत्नात्प्रमदा परिवर्जयेत्। देवारामनदीयानं प्रयोगं पुरुषस्य च ।।५।। इति ।। ३०५-३०६।। और भी कहा है कि—गर्भिणी स्त्री मांस का भोजन एवं देवमन्दिर, बगीचा तथा नदी पर जाना तथा पुरुष के साथ सहवास, इन सब कर्मों का यत्नपूर्वक परित्याग कर देवे ॥५॥३०५-३०६॥ अथ बुभुक्षितादीनां पुरुषाणां स्त्रीसंभोगे मध्याह्ने स्त्रीसेवने च दोषानाह- क्षुधितः क्षुब्धचित्तश्च मध्याह्नेतृषितोऽबला । स्थितस्य हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ।।३०७।। भूखे प्यासे आदि होकर तथा मध्याह्न में स्त्रीसङ्ग करने से दोष—जो पुरुष भूखा हो अथवा जिसको क्षोभ प्राप्त हुआ हो या जो प्यासा अथवा निर्बल हो वह यदि स्त्रीसंभोग करे अथवा जो मध्याह्न में स्त्री प्रसङ्ग करे उसके अन्दर रहनेवाले शुक्र की हानि तथा वायु का कोप होता है ॥३०७॥ अथ व्याधितस्य पुंसस्तथा प्रत्यूषादिसमये स्त्रीगमने दोषानाह- व्याधितस्य रुजा श्लीहा मूर्च्छा मृत्युश्च जायते । प्रत्यूषे चार्थरात्रे च वातपित्ते प्रकुप्यतः ।।३०८।। रुग्णावस्था या प्रातः काल में स्त्रीसंभोग से दोष—रोगी पुरुष यदि स्त्री प्रसङ्ग करे तो उसे पीड़ा, प्लीहा रोग तथा मूर्च्छा होती है और अन्त में मृत्यु तक भी हो जाती है। एवं जो पुरुष प्रत्यूष अर्थात् सूर्योदय के पूर्व अथवा आधीरात में स्त्रीप्रसङ्ग करता है उस के वात तथा पित्त कुपित हो जाते हैं ॥३०८॥ अथ तिर्यगादियोनौ मैथुने दोषानाह- तिर्यग्योनावयोनौ वा दुष्टयोनौ तथैव च । उपदंशस्तथा वायोः कोपः शुक्रसुखक्षयः ।।३०९।। पशु आदि की योनि में मैथुन करने के दोष—पशु की योनि अथवा अयोनि (गुदा वा कृत्रिम योनि) में एवं वातादि दोषों से दूषित योनि में मैथुन करने से उपदंश (गर्मी, सुजाक) या वायु का कोप, किंवा वीर्य तथा सुख का क्षय होता है ॥३०९॥ अथ मलमूत्रयोर्वेगावस्थायां मैथुने चलितशुक्रधारणे । विपरीत मैथुने च दोषमाह- उच्चारिते मूत्रिते च रेतसश्च विधारणे । उत्ताने च भवेच्छीघ्रं शुक्राश्मर्यास्तु सम्भवः ।।३१०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA