भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे वेग रोकने से या विपरीत मैथुन करने से दोष—मल या मूत्र के वेगको रोककर मैथुन करने से तथा उत्तान होकर (विपरीत) मैथुन करने से अथवा मैथुनके समय शुक्र के वेग को रोकने से शीघ्र ही शुक्राश्मरी (वीर्य की पथरी) नामक रोग उत्पन्न होने की सम्भावना हो जाती है ॥३१०॥ अथ पुनर्विशेषेणोपस्थितशुक्रधारणनिषेधमाह— सर्वमेतत्त्यजेत्तस्माद्यतो लोकद्वयाहितम्। शुक्लं तूपस्थितं मोहान्न सन्धार्यं कदा चन ।।३११।। स्खलित होते हुये शुक्र के रोकने का निषेध—पूर्वोक्त इन सब बातों को मैथुन करने में छोड़ दे क्योंकि न छोड़ने से दोनों लोक में उसका अहित होता है और उन सबों में विशेष कर उपस्थित शुक्र का धारण तो भूल से भी कभी न करे ॥३११॥ अथ सुरतान्ते हितकराणि द्रव्याण्याह— स्नानं सशर्करं क्षीरं भक्ष्यमैक्षवसंस्कृतम् । वातो मांसरसः स्वप्नः सुरतान्ते हिता अमी ।।३१२।। मैथुन करने के बाद हितकारक द्रव्य—स्नान, शक्कर (चीनी) मिला हुआ दूध, शक्कर मिला हुआ (मीठा) भोजन, वायु सेवन, मांस-रस (शुरुवा) और नींद से सो जाना ये सब कार्य मैथुन करने के बाद हितकर होते हैं ॥३१२॥ अथातिव्यवायजान् रोगानाह— शूलकासज्वरश्वासकार्श्यपाण्ड्वालयक्षयः । अतिव्यवायाज्जायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः ।।३१३।। अत्यन्त मैथुन करने से होनेवाले रोग—अत्यन्त मैथुन करने से शूल, खाँसी, ज्वर, श्वास (दमा), कृशता, पाण्डु, क्षय तथा आक्षेपक आदि रोग उत्पन्न होते हैं ॥३१३॥ अथ रात्रिनिद्राजागरणयोर्गुणानाह— रात्रौ जागरणं रूक्षं कफदोषविषार्त्तिजित् । निद्रा तु सेविताकाले धातुसाम्यमतन्द्रिताम् ।।३१४।। पुष्टिं वर्णं बलोत्साहं वह्निदीप्तिं करोति हि ।।३१५।। रात्रि में सोने तथा जागने के गुण-दोष—रात्रि में जागना रूक्षताकारक तथा कफ-दोष व विष-सम्बन्धी पीड़ा का हरण करनेवाला है और समय पर निद्रा-सेवन करना (नींद से सो जाना) धातुओं की समता, तन्द्रा का न आना, पुष्टि, वर्ण, बल, उत्साह और जठराग्नि की दीप्ति इन सबों को करता है ॥३१४-३१५॥ अथ सुखपूर्वकनिद्रालाभार्थमौषधमाह— यो लेढि शयनसमये मधुमित्रं बीजपूरदलचूर्णम् । स तु १ लज्जाकरवातप्रसरनिरोधात्सुखं स्वपिति ।।३१६।। सुखपूर्वक नींद आने के लिये औषध—जो सोने के समय बिजौरा नींबू के पत्ते का चूर्ण मधु के साथ खाता है, उसकी लज्जा पैदा करनेवाली अधोवायु का वेग रुक जाता है और वायु शमन होने से वह सुखपूर्वक सोता है ॥३१६॥ अथोषःकाले जलपानगुणानाह— सवितुः समुदयकाले प्रसृतीः सलिलस्य पिबेदष्टौ । रोगजरापरिमुक्तो जीवेद्वत्सरशतं साग्रम् ।।३१७।। उषाकाल (सूर्योदय के पूर्व) जल पीने के गुण—सूर्य के उदय होने के आसन्न समय में जो आठ प्रसृति (पसर)