भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 208

अथ पञ्चमं दिनचर्यादिप्रकरणम् १५५ ❖ अस्य जलपानस्योपक्रमकालो१ रात्रेश्चतुर्थप्रहरे प्रवेश । तथा च भोजः- पिबति पर्युषितं जलमन्वहं तिमिरिणी चरमे प्रहरे यदि ।। ६ ।। इति जलपान के प्रारम्भ करने का काल रात्रि के चौथे प्रहर से ही आरम्भ हो जाता है। क्योंकि इस विषय में 'भोज' का भी यह मत है कि 'यदि कोई रात्रि के अन्तिम प्रहर में नित्य बासी जल पीता है' इत्यादि ।। ६ ।। ❖ एतज्जुलपानकालमर्यादा सूर्योदयातिसन्निहितप्राक्२ कालः। तथा च तन्त्रान्तरे- अम्भसः प्रसुतीरष्टौ रवाननुदिते पिबेत्। वातपित्तकफाञ्जित्वा जीवेद्वर्षशतं सुखी ।। ७ ।। इति । इस जलपान के समय की मर्यादा सूर्योदय से अत्यन्त सन्निकट पूर्वका ही काल है। इसी विषय में दूसरे ग्रन्थ में भी लिखा है कि—'सूर्य उदय होने के पहले ही जो आठ पसर जल पीता है वह बात, पित्त तथा कफ सम्बन्धी विकारों को हटाकर सुखपूर्वक सौ वर्ष तक जीता है' ।। ७ ।। ❖ सलिलस्यात्र पर्युषितस्य ग्रहणं भोजनवचनानुरोधात् ।। ३१७ ।। यहाँ पर जल से बासी जल का ग्रहण पूर्वोक्त 'भोज' के वचन के अनुरोध से ही किया जाता है। अर्शःशोथग्रहण्यो ज्वरजठरजराकुष्ठमेदोविकारामूत्राघातास्रपित्तश्रवणगलशिरः श्रोणिशूलाक्षिरोगाः । ये चान्ये वातपित्तक्षतजकफकृता व्याधयः सन्ति जन्तो स्तांस्तानभ्यासयोगादपहरति पयः पीतमन्ते निशायाः ।। ३१८ ।। बवासीर, शोथ, ग्रहणी, ज्वर रोग, उदर-जरा-कोढ़ तथा मेद सम्बन्धी विकार और मूत्राघात, रक्तपित्त एवं कान- गला-शिर और कमर के शूल तथा नेत्र सम्बन्धी रोग अथवा इनके अतिरिक्त अन्य भी जो-जो बात-पित्त-कफ और क्षत से होने वाले रोग होते हैं वे सभी रात्रि के अन्त में जल पीने का अभ्यास करने से दूर हो जाते हैं ।। ३१८ ।। अथोषःकाले नासावारिपानगुणानाह- विगतघननिशीथे प्रातरुत्थाय नित्यं पिबति खलु नरो यो घ्राणरन्ध्रेण वारि । स भवति मतिपूर्णश्चक्षुषा तार्क्ष्यतुल्यो वलिपलितविहीनः सर्वरोगैर्विमुक्तः ।। ३१९ ।। उषःकाल में नासिका से जल पीने के गुण—जब रात्रि का घना अन्धकार दूर हो अर्थात् प्रातः काल हो जाय तब उठकर जो मनुष्य नित्य नासिका से जलपान करता है वह निश्चय ही बुद्धि से पूर्ण होता है यथा उसके नेत्रों की दर्शन शक्ति गरुड़ के तुल्य होती है तथा बली और पलित रोगों से हीन होकर वह सब रोगों से मुक्त हो जाता है ।। ३१९ ।। ❖ निशीथोऽत्र=निशान्धकारः ।। ३१९ ।। 'निशीथ' से यहाँ 'रात्रिका अन्धकार' समझना चाहिये ।। ३१९ ।। अथ नासाजलपाने जलपरिमाणमाह- पातव्यं नासया नीरं प्रसुतित्रयमात्रया ।। ३२० ।। नासाजलपान में जलका परिमाण—मनुष्य को नासिका के द्वारा तीन प्रसुति (पसर) प्रमाण जल पीना चाहिये ।। ३२० ।। अथ पुनर्विशेषेण नासाजलपाने गुणानाह- व्यङ्गवलीपलितघ्नं पीनसवैस्वर्यकासशोथहरम् । रजनीक्षयेऽम्बुनस्यं रसायनं दृष्टिसञ्जननम् ।। ३२१ ।। १. 'काले' इति पा. । २. 'प्राप्त' इति पा. ।