भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

१५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नासा जलपान के विशेष गुण—रात्रि व्यतीत होने पर नासा से जलपान करना व्यङ्ग (झाँई), बली, पलित, पीनस, स्वरभङ्ग, खाँसी और शोथ इन सब रोगों को दूर करता है तथा रसायन और दर्शनशक्ति को बढ़ाने वाला होता है ॥३२१॥ अथ नासावारिपानानर्हजनानाह- स्नेहे पीते क्षते शुद्धावाध्माने स्तिमितोदरे । हिक्कायां कफवातोत्थे व्याधौ तद्वारि वारयेत् ।।३२२।। नासा जलपान के अयोग्यजन—जो स्नेह पान किये हों या जिन्हें क्षत हो गया हो अथवा जिन्होंने वमन या विरेचन द्वारा तत्काल में शरीर की शुद्धि की हो या जिन्हें उदर में आध्मान (अफरा) हो गया हो या पेट में स्तिमित हो गया हो अर्थात् मन्दाग्नि हो गई हो या जो हिचकी और कफ तथा वात से होनेवाली व्याधियों से युक्त हों उन्हें उस जल का पान नहीं करना चाहिये ॥ ❖ तद्वारि नासा पेयम् ।।३२२।। 'तद्वारि' अर्थात् 'नासिका द्वारा पिये जानेवाले जलका' ।।३२२।। अथर्तुचर्यामाह । तत्रादौ नामनिर्देशपूर्वकमृतुषट्कमाह- क्षयकोपशमा१ यस्मिन्दोषाणां सम्भवन्ति हि । ऋतुषट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु संक्रमात् ।।३२३।। ऋतुभेद और ऋतुचर्या—जिस समय दोषों की वृद्धि, कोप तथा शमन हुआ करता है, उस समय को ऋतु कहते हैं और वह रवि के मेषादि बारह राशियों में भ्रमण करने से छः प्रकार का होता है ।।३२३।। ग्रीष्मौ मेषवृषौ प्रोक्तः प्रावृण्मिथुनकर्कटौ । सिंहकन्ये स्मृता वर्षा तुलावृश्चिकयोः शरत् ।।३२४।। धनुर्ग्राहौ च हेमन्तो वसन्तः कुम्भमीनयोः ।।३२५।। जब सूर्य मेष तथा वृष राशि तक रहते हैं तब ग्रीष्म और जब मिथुन तथा कर्क तक होते हैं तब प्रावृट, इसी प्रकार सिंह से कन्या तक वर्षा तुला से वृश्चिक तक शरद, धनु से मकर तक हेमन्त और कुम्भ से मीन तक वसन्त ऋतु कहलाता है ॥३२४-३२५॥ मेषवृषौ रविणा संक्रान्तौ । एवं मिथुनकर्कटावित्यादि ।।३२४-३२५।। 'मेषवृषौ' पद से 'रवि से संकान्त मेष और वृष' इसी प्रकार 'मिथुनकर्कटौ' इत्यादि का भी अर्थ समझना चाहिये ।।३२४-३२५।। अन्ये तु- शिशिरः पुष्पसमयो ग्रीष्मो वर्षा शरद्धिमाः । माघादिमासयुग्मैः स्युऋर्तवः षट् क्रमादमी ।।३२६।। ऋतुओं के विषय में अन्य मत—शिशिर वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् और हेमन्त ये छः ऋतु माघ से लेकर दो-दो महीने के एक-एक ऋतु क्रम से होते हैं, जैसे—माघ-फाल्गुन शिशिर, चैत्र-वैशाख वसन्त, ज्येष्ठ-आषाढ़ ग्रीष्म, श्रावण-भाद्रपद वर्षा, आश्विन-कार्तिक शरद् और अगहनपौष हेमन्त ऋतु है ।।३२६।। अथर्तुषट्कनामविषयकमतभेदे हेतुमाह- गङ्गाया दक्षिणे देशे वृष्टेर्बाहुलभावतः । उभौ मुनिभिराख्यातौ प्रावृड्वर्षाभिधावृतू ।।३२७।। १. 'समा' इति पा. ।