भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 1167 में से

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५७ (१तस्या एवोत्तरे देशे हिमप्रचुरभावतः। एतावुभौ समाख्यातौ हेमन्तशिशिरावृतू ।।३२८।।) ऋतुओं के नाम में मतभेद का कारण—गङ्गा से दक्षिण देशों में अधिक वृष्टि होने से प्रावृट् तथा वर्षा ये दो पृथक्-पृथक् ऋतु मानते हैं किन्तु शीत कम होने से शिशिर ऋतु को नहीं मानते। इसी प्रकार गङ्गा के उत्तर देशों में हिम (ठण्डक) अधिक होने से हेमन्त तथा शिशिर ये दो पृथक्-पृथक् ऋतु मानते हैं किन्तु वर्षा कम होने से प्रावृट् को नहीं मानते ॥३२७-३२८॥ अथ दक्षिणोत्तरायणयोर्लक्षणं गुणांश्चाह- उत्तरायणमाद्यैस्तैः परैः स्याद्दक्षिणायनम्। आद्यमुष्णं बलहरं ततोऽन्यद्वलदं हिमम् ।।३२९।। दक्षिणायन तथा उत्तरायण के लक्षण और गुण—पूर्वोक्त छः ऋतुओं में से प्रथम तीन (शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म) ऋतुओं में सूर्य 'उत्तरायण' और आगे के तीन (वर्षा, शरद् और हेमन्त) ऋतुओं में 'दक्षिणायन' होता है। इन में जो पहला उत्तरायण है वह उष्णप्रधान तथा बल का हरण करने वाला और दूसरा जो दक्षिणायन है वह हिम प्रधान तथा बल का देने वाला होता है ॥३२९॥ अथ ऋतूनां गुणदोषानाह- हेमन्तः शीतलः स्निग्धः स्वादुर्जठरवह्निकृत् । शिशिरः शीतलोऽतीव रूक्षो वाताग्निवर्धनः ।।३३०।। ऋतुओं के गुण-दोष—हेमन्त ऋतु मनुष्यों के लिये शीतल, स्निग्ध, स्वादु, जठराग्नि को बढ़ाने वाला और शिशिर ऋतु शीतल, अत्यन्त रूक्ष, वायु तथा अग्नि का बढ़ानेवाला होता है ॥३३०॥ ❖ हेमन्तः स्वादुः प्रायेण द्रव्येषु स्वादुरसजनकः। एवमन्यत्रापि बोद्धव्यम् ।।३३०।। 'हेमन्त स्वादु है अर्थात् प्रायः करके द्रव्यों में मधुर रस का उत्पादक है' यह समझना चाहिये। इसी भाँति आगे जहाँ कहीं मधुर, कटुकादि रसों का नाम जिन-जिन ऋतुओं के गुण वर्णन में आवे वहाँ द्रव्यों में उन-उन रसों के उत्पादक वे ऋतुयें हैं ऐसा समझना चाहिये ॥३३०॥ वसन्तो मधुरः स्निग्धः श्लेष्मवृद्धिकरश्च सः। ग्रीष्मो रूक्षोऽतिकटुकः पित्तकृत्कफनाशनः ।।३३१।। वर्षाः शीता विदाहिन्यो वह्निमान्द्यानिलप्रदाः। शरदष्णा पित्तकर्त्री नृणां मध्यबलावहा. ।।३३२।। वसन्त ऋतु—मधुर, स्निग्ध और कफ की वृद्धि करने वाला है। ग्रीष्म ऋतु—रूक्ष, अत्यन्त कटु, पित्त का उत्पादक तथा कफ का नाशक है। वर्षा ऋतु—शीतल, दाहकारक, अग्नि की मन्दता तथा वायु की वृद्धि करने वाला है और शरद् ऋतु—उष्ण, पित्त का उत्पादक तथा मध्यम बल को देने वाला है ॥३३१-३३२॥ अथ कस्मिन् ऋतौ कस्य दोषस्य चयप्रकोपोपशमा भवन्तीति सहेतुकमाह- चयप्रकोपोपशमा वायोर्ग्रीष्मादिषु त्रिषु । वर्षाऽऽदिषु च पित्तस्य श्लेष्मणः शिशिरादिषु ।।३३३।। ऋतुभेद से दोषों के उपचयापचयादि—ग्रीष्मादि तीन ऋतुओं में वायु का, वर्षा आदि तीन ऋतुओं में पित्त का, शिशिर आदि तीन ऋतुओं में कफ का क्रम से चय (वृद्धि), प्रकोप तथा उपशम (शमन) होता है अर्थात् ग्रीष्म में वायु का चय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में उपशम होता है। एवं पित्त का वर्षा में चय, शरद् में प्रकोप तथा हेमन्त में उपशम होता है और कफ का—शिशिर में चय, वसन्त में प्रकोप तथा ग्रीष्म में उपशम होता है ॥३३३॥ १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

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