भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चीयते लघुरूक्षाभिरोषधीभिः समीरणः । तद्विधस्तद्विधे देहे कालस्यौष्ण्यान्न कुप्यति ।।३३४।। वायु स्वभावतः लघु तथा रूक्ष है और ग्रीष्म-काल में जितनी ओषधियाँ हैं वे सब भी लघु तथा रूक्ष हो जाती हैं अतएव ओषधियों के सेवन से वायु और भी लघु तथा रूक्ष हो जाता है और उस समय मनुष्यों का शरीर भी लघु तथा रूक्ष होता है अतएव पूर्वोक्त प्रकार की वायु पूर्वोक्त प्रकार की देह में केवल सञ्चित ही होता है अर्थात् क्रमशः बढ़ता ही रहता है किन्तु जो कुपित नहीं होता उसमें केवल ग्रीष्मकाल की उष्णता ही कारण है ।।३३४।। ❖ तद्विधो रूक्षो लघुश्च । तद्विधे रूक्षे लघौ च ।।३३४।। ‘तद्विधः’ (उक्त प्रकार की वायु) इस पद से ‘रूक्ष और लघु स्वभाव वाली वायु और ‘तद्विधे’ (उक्त प्रकार के देह में) इस पद से’ तात्कालिक रूक्ष और लघु स्वभाव वाली देह में’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये ।।३३४।। अद्भिरम्लविपाकाभिरोषधीभिश्च तादृशम् । पित्तं याति चयं कोपं न तु कालस्य शैत्यतः ।।३३५।। पित्त स्वभावतः अम्लविपाकी है और वर्षा काल में जल और सभी ओषधियाँ भी अम्लविपाकी होती हैं अतएव उन्हीं अम्लविपाकी जल और ओषधियों के सेवन करने से अम्लविपाकी पित्त और भी अम्लविपाकी होकर मनुष्यों के शरीर में सञ्चित होने लगता है, किन्तु वर्षा का समय होने से शीत प्रबल रहता है अतएव उस समय वह (पित्त) कुपित नहीं होने पाता है ।।३३५।। चीयते स्निग्धशीताभिरुदकौषधिभिः कफः । तुल्ये च काले देहे च स्कन्नत्वान्न प्रकुप्यति ।।३३६।। कफ स्वभावतः स्निग्ध तथा शीतल पदार्थ है और शिशिर काल में जल और ओषधियाँ भी स्निग्ध तथा शीतल होती हैं अतएव ऐसे (स्निग्ध तथा शीतल) जल और ओषधियों के सेवन करने से स्निग्ध व शीतल स्वभाव कफ और भी स्निग्ध तथा शीतल हो जाता है उस समय मनुष्यों का शरीर भी स्निग्ध व शीतल होता है अत एव जलादि के समान गुण वाले अर्थात् स्निग्ध तथा शीतल काल व देह में कफ सञ्चित होता है किन्तु स्कन्नत्व अर्थात् देह में शीत की अधिकता से शुष्क होने के कारण वह (कफ) कुपित नहीं होता है ।।३३६।। ❖ तुल्ये च काले स्निग्धे शीतले च । स्कन्नत्वाद् देहे शुष्कत्वात् ।।३३६।। ‘तुल्ये च काले’ इस पद का ‘तात्कालिक जलादिकों के समान गुण वाले अर्थात् स्निग्ध व शीतल काल व देह में’ और ‘स्कन्नत्वाद्’ इस पद का ‘देह में शुष्क हो जाने से’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।३३६।। हिमे याति शमं पित्तं वायुः श्लेष्मा च चीयते । स वायुः शिशिरे कोपं यात्येवोपचितः१ कफः ।।३३७।। हेमन्त ऋतु में पित्त का शमन एवं वायु और कफ का सञ्चय होता है और वही सञ्चित वायु शिशिर ऋतु में कुपित होती है और कफ उस समय केवल उपचित (वृद्धि को प्राप्त) हो कर रहता है ।।३३७।। हेमन्ते सञ्चितः श्लेष्मा शिशिरे त्वतिचीयते । शीतस्निग्धगुरुद्रव्यैः शैत्यस्कन्नो न कुप्यति ।।३३८।। हेमन्त ऋतु में सञ्चित जो कफ है वह शिशिर ऋतु में शीतल, स्निग्ध और गुरुपाकी द्रव्यों के सेवन करने से अत्यन्त सञ्चित हो जाता है किन्तु शीत की अधिकता से कठिनता को प्राप्त हो जाने से कुपित नहीं होता ।।३३८।। ❖ स्कन्नः=कठिनीभूतः ।।३३८।। ‘स्कन्न’ का ‘कठिनीभूत’ अर्थात् ‘कठिनता को प्राप्त हो जाने से’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।३३८।। १. ‘यात्येवोपहित’ इति पा. ।