भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५९ इति कालस्वभावोऽयमाहारादिवशात्पुनः । चयादीन् यान्ति सद्योऽपि दोषाः काले विशेषतः ।।३३९।। इन पूर्वोक्त प्रकारों से जो यह वातादि दोषों का चय, कोप और शम होता है, उसका कारण काल का स्वभाव ही जानना चाहिये । किन्तु आहारादि कारणवश से भी वातादि सभी दोष सद्यः चय, कोप तथा शमभाव को प्राप्त होते हैं और विशेष कर अहोरात्र में भी अपने-अपने समयों में चयादि प्राप्त होते हैं ।।३३९।। ❖ (१चयादीन्) चयकोपोपशमान् पूर्वाह्णे वसन्तस्य लिङ्गम्, मध्याह्ने ग्रीष्मस्य, अपराह्णे प्रावृषः, प्रदोषे वार्षिकम् । शारदमर्धरात्रे, प्रत्यूषसि हेमन्तमुपलक्षयेत् । एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णवर्षा (२दिलक्षणम्) दोषोपचय प्रकोपोपशमैर्जानीयादिति सुश्रुतः ३ ।।३३९।। यहाँ 'चयादि' से 'चय, कोप तथा शम' का ग्रहण करना चाहिये और अहोरात्र में भी वातादि दोष अपने-अपने समयों में चयादि को प्राप्त होते हैं । इसी विषय में 'सुश्रुत' भी कहते हैं कि—'दिन के प्रथम भाग में वसन्त के, मध्याह्न में ग्रीष्म के, दिन के अन्त भाग में प्रावृड् के, प्रदोष में वर्षा के, अर्धरात्र में शरद के और प्रत्यूष (पिछली रात्रि) में हेमन्त के लक्षण उपस्थित होते हैं । इस प्रकार अहोरात्र को भी वर्ष की भाँति दोषों के चय, कोप तथा शम होने के द्वारा शीत, उष्ण तथा वर्षा आदि लक्षणों से युक्त समझना चाहिये' ।।३३९।। अथाकाले दोषवृद्धिमाह- चयकोपोपशमान्दोषा विहाराहारसेवनैः । समानैर्यान्त्यकालेऽपि विपरीतैर्विपर्ययम् ।।३४०।। अकाल में दोषों की वृद्धि—तुल्य आहार-विहार का सेवन करने से वातादि सभी दोष अकाल में भी अर्थात् उनके चयादि होने का समय न होने पर भी चय, कोप तथा उपशम को प्राप्त होते हैं और विपरीत आहार-विहार के सेवन करने से दोषों के चयादि का भी विपर्यय हो जाता है । ❖ समानैः=तुल्यैः, चयादियोग्यैरिति यावत् । विपर्ययं कालेऽपि वैपरीत्यं बोध्यम् ।।३४०।। 'समानैः' पदका 'तुल्य अर्थात् दोषों के चयादि होने के योग्य' और 'विपरीतैः' पद का 'चयादि होने के अयोग्य' तथा 'विपर्यय' पद का 'चयादि होने का काल उपस्थित होने पर भी विपरीत होता है अर्थात् दोषों का चयादि नहीं होता' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३४०।। अथ दोषचयलक्षणमाह सुश्रुतः- स्वस्थानस्थस्य दोषस्य वृद्धिः स्यात्स्तब्धकोष्ठता४। पीतावभासता वह्निमन्दता चाङ्गगौरवम् ।।३४१।। आलस्यं चयहेतौ तु द्वेषश्च चयलक्षणम् । सञ्चये ऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरां गतिम् ।।३४२।। ते तूत्तरासु गतिषु भवन्ति बलवत्तराः ।।३४३।। दोषों के चय होने के लक्षण—अपने स्थान में स्थित दोष की वृद्धि, कोष्ठ में स्तब्धता, शरीर में पीलापन, अग्नि की मन्दता, अङ्गों में गुरुता (भारीपन), आलस्य और दोषों के चय होने के कारण स्वरूप आहारादि से द्वेष (अरुचि) होना ये सब दोषों के चय होने के लक्षण हैं । सञ्चय होने के समय यदि औषधादि द्वारा दोषों की चिकित्सा कर दी जाय तो वे सञ्चय होने के बाद की गति अर्थात् प्रकोप को नहीं प्राप्त करते हैं । किन्तु चिकित्सा न करने से उत्तर गति (प्रकोप) को प्राप्त होने पर तो वे (दोष) अत्यन्त बलवान् हो जाते हैं । अतः सञ्चयावस्था ही में दोषों की चिकित्सा कर लेना उत्तम है ।।३४१-३४३।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ३. शमा इति पा. । ४. 'च्छवासे'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA