भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १५९ इति कालस्वभावोऽयमाहारादिवशात्पुनः । चयादीन् यान्ति सद्योऽपि दोषाः काले विशेषतः ।।३३९।। इन पूर्वोक्त प्रकारों से जो यह वातादि दोषों का चय, कोप और शम होता है, उसका कारण काल का स्वभाव ही जानना चाहिये । किन्तु आहारादि कारणवश से भी वातादि सभी दोष सद्यः चय, कोप तथा शमभाव को प्राप्त होते हैं और विशेष कर अहोरात्र में भी अपने-अपने समयों में चयादि प्राप्त होते हैं ।।३३९।। ❖ (१चयादीन्) चयकोपोपशमान् पूर्वाह्णे वसन्तस्य लिङ्गम्, मध्याह्ने ग्रीष्मस्य, अपराह्णे प्रावृषः, प्रदोषे वार्षिकम् । शारदमर्धरात्रे, प्रत्यूषसि हेमन्तमुपलक्षयेत् । एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णवर्षा (२दिलक्षणम्) दोषोपचय प्रकोपोपशमैर्जानीयादिति सुश्रुतः ३ ।।३३९।। यहाँ 'चयादि' से 'चय, कोप तथा शम' का ग्रहण करना चाहिये और अहोरात्र में भी वातादि दोष अपने-अपने समयों में चयादि को प्राप्त होते हैं । इसी विषय में 'सुश्रुत' भी कहते हैं कि—'दिन के प्रथम भाग में वसन्त के, मध्याह्न में ग्रीष्म के, दिन के अन्त भाग में प्रावृड् के, प्रदोष में वर्षा के, अर्धरात्र में शरद के और प्रत्यूष (पिछली रात्रि) में हेमन्त के लक्षण उपस्थित होते हैं । इस प्रकार अहोरात्र को भी वर्ष की भाँति दोषों के चय, कोप तथा शम होने के द्वारा शीत, उष्ण तथा वर्षा आदि लक्षणों से युक्त समझना चाहिये' ।।३३९।। अथाकाले दोषवृद्धिमाह- चयकोपोपशमान्दोषा विहाराहारसेवनैः । समानैर्यान्त्यकालेऽपि विपरीतैर्विपर्ययम् ।।३४०।। अकाल में दोषों की वृद्धि—तुल्य आहार-विहार का सेवन करने से वातादि सभी दोष अकाल में भी अर्थात् उनके चयादि होने का समय न होने पर भी चय, कोप तथा उपशम को प्राप्त होते हैं और विपरीत आहार-विहार के सेवन करने से दोषों के चयादि का भी विपर्यय हो जाता है । ❖ समानैः=तुल्यैः, चयादियोग्यैरिति यावत् । विपर्ययं कालेऽपि वैपरीत्यं बोध्यम् ।।३४०।। 'समानैः' पदका 'तुल्य अर्थात् दोषों के चयादि होने के योग्य' और 'विपरीतैः' पद का 'चयादि होने के अयोग्य' तथा 'विपर्यय' पद का 'चयादि होने का काल उपस्थित होने पर भी विपरीत होता है अर्थात् दोषों का चयादि नहीं होता' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३४०।। अथ दोषचयलक्षणमाह सुश्रुतः- स्वस्थानस्थस्य दोषस्य वृद्धिः स्यात्स्तब्धकोष्ठता४। पीतावभासता वह्निमन्दता चाङ्गगौरवम् ।।३४१।। आलस्यं चयहेतौ तु द्वेषश्च चयलक्षणम् । सञ्चये ऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरां गतिम् ।।३४२।। ते तूत्तरासु गतिषु भवन्ति बलवत्तराः ।।३४३।। दोषों के चय होने के लक्षण—अपने स्थान में स्थित दोष की वृद्धि, कोष्ठ में स्तब्धता, शरीर में पीलापन, अग्नि की मन्दता, अङ्गों में गुरुता (भारीपन), आलस्य और दोषों के चय होने के कारण स्वरूप आहारादि से द्वेष (अरुचि) होना ये सब दोषों के चय होने के लक्षण हैं । सञ्चय होने के समय यदि औषधादि द्वारा दोषों की चिकित्सा कर दी जाय तो वे सञ्चय होने के बाद की गति अर्थात् प्रकोप को नहीं प्राप्त करते हैं । किन्तु चिकित्सा न करने से उत्तर गति (प्रकोप) को प्राप्त होने पर तो वे (दोष) अत्यन्त बलवान् हो जाते हैं । अतः सञ्चयावस्था ही में दोषों की चिकित्सा कर लेना उत्तम है ।।३४१-३४३।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ३. शमा इति पा. । ४. 'च्छवासे'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ वर्षत्तौ नियमानाह- वर्षासु प्रबलो वायुस्तस्मान्मिष्टादयस्त्रयः। रसाः सेव्या विशेषेण पवनस्योपशान्तये ।।३४४।। वर्षा ऋतु के नियम—वर्षाकाल में वायु प्रबल होती है अतः वायु की शान्ति के लिये विशेषरूप से मधुरादि तीनों रसों का सेवन करना चाहिये ।।३४४।। ❖ मिष्टादयस्त्रयः=मधुराम्ललवणाः ।।३४४।। 'मधुरादयस्त्रयः' अर्थात् मधुर, अम्ल और लवण इन तीन रसों से युक्त ।।३४४।। भवेद्वर्षासु वपुषः क्लिन्नत्वं यद्विशेषतः । यत्क्लेदशान्तये१ सेव्या अपि कट्वादयस्त्रयः ।।३४५।। वर्षाकाल में प्रायः करके शरीर क्लिन्न (आर्द्र) रहा करता है, उसकी शान्ति के लिये कटु आदि तीनों रसों का भी सेवन करना चाहिये ।।३४५।। कट्वादयस्त्रयः=कटुतिक्तकषायाः ।।३४५।। 'कट्वादयस्त्रयः' अर्थात् कटु, तिक्त तथा कसैला इन तीन रसों से युक्त ।।३४५।। स्वेदनं मर्दनं सेव्यं दध्युष्णाजाङ्गलामिषम् । शालयो२ यवगोधूमा जलं कौपं जलं च्युतम् ।।३४६।। न भजेत्पूर्वपवनं वृष्टिं घर्मं हिमं श्रमम् । नदीतीरं दिवास्वप्नं रूक्षं नित्यं च मैथुनम् ।।३४७।। वर्षाकाल में स्वेदन, मर्दन, गरम दही, जङ्गली जीवों का मांस, जौ, गेहूँ, शालि (अगहनि धान का चावल) और कूप तथा झरना का जलपान, पूर्वदिशा की वायु का सेवन, वर्षा में भीगना, घाम में घूमना, हिम (ओस) में सोना, परिश्रम, नदी के तट पर रहना, दिन में सोना, रूक्ष द्रव्यों का सेवन और नित्य मैथुन करना, इन सबको नहीं करना चाहिये ।।३४६-३४७।। अथ शरदृतौ नियमानाह- सर्पिः स्वादुकषायतिक्तकरसा यच्छीतलं यल्लघु क्षीरं स्वच्छसितैक्षवः पटुरसः स्वल्पं पलं जाङ्गलम् । गोधूमा यवमुद्गशालिसहिता नादेयमं शूदकं चन्द्रश्चन्दमिन्दुरादिरजनी३ माल्यं पटो निर्मलाः ।।३४८।। शरद् ऋतु के नियम—शरदऋतु में, घृत, मधुर, कसैला तथा तिक्त रस, शीतल तथा लघु पदार्थ, दूध, साफ शक्कर, गुड़, नमकीन पदार्थ, थोड़ी मात्रा में जङ्गली जीवों का मांस, गेहूँ, यव, मूंग, शालि (अग
में विश्राम तथा मधुर वार्तालाप, तालाबों में क्रीडा, पित्त का विरेचन एवं जो बलवान् व्यक्ति हो उनका" "रक्तमोक्षण (फस्त खुलवाना) ये सब भी शरद ऋतु में हितकर है और दही, व्यायाम (कसरत), अम्ल, कटु, उष्ण और" "तीक्ष्ण पदार्थों का सेवन, दिन में सोना और ओस तथा घाम का सेवन करना वर्ज्य है ॥३४९॥"
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"इक्ष्वः शालयो मुद्गाः सरोऽम्भः क्वथितं पयः । शरद्येतानि पथ्यानि प्रदोषे चेन्दुरश्मयः ॥३५०॥"
Wait! Is it "इक्ष्वः" or "इक्षवः"?
Look at the first word: `इ` `क` `्` `ष` `्` `व` `ः` -> "इक्ष्वः" or "इक्षवः"?
There is NO virama on ष! It is `इ` `क्ष` `व` `ः` = "इक्षवः"!
Let's look closely: `इ` `क्ष` `व` `ः`. It's definitely "इक्षवः"!
"इक्षवः शालयो मुद्गाः सरोऽम्भः क्वथितं पयः । शरद्येतानि पथ्यानि प्रदोषे
१६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मिष्टमम्लं दधि स्निग्धं दिवास्वप्नं च दुर्जरम्। अवश्यायमपि प्राज्ञो वसन्ते परिवर्जयेत्।।३५४।। वसन्त ऋतु के नियम—वसन्त ऋतु में औषधों के द्वारा वमन तथा औषधों का नस लेना, मधु के साथ हरड़ का खाना, कसरत करना, उबटन लगाना, कफ नाशक औषधों का कुल्ला करना, लोहे की शलाका में खोंस कर अग्नि में सके हुये जङ्गली जीवों का मांस खाना, गेहूँ, अनेक प्रकार के चावल, मूँग, यव और साठी चावल खाना, चन्दन, केसर और अगर का लेप करना और रूक्ष, कटु रसयुक्त, उष्ण तथा हल्के पदार्थों का सेवन करना हितकर है और मीठा, खट्टा तथा स्निग्ध पदार्थ एवं दही का खाना और दिन में सोना तथा देर में पचने वाले पदार्थों का खाना और ओस में सोना अहितकर है अतः वसन्त ऋतु में इन सबों का परित्याग अवश्य कर देवे ।।३५३-३५४।। अथ ग्रीष्मर्तुनियमानाह- स्वादुस्निग्धहिमं लघु द्रवमयं द्रव्यं रसालां सितांसक्तुक्षीरमजाङ्गलानि सितया शालिं रसं मांसजम्। शीतांशुं शयनं दिवा मलयजं शीतं पयः पानकं सेवेतोष्णादिने त्यजेत्तु कटुकक्षाराम्लघर्मश्रमान् ।। ३५५ ।। ग्रीष्म ऋतु के नियम—ग्रीष्म ऋतु में मधुर रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, पचने में हल्के द्रवरूपं (पतला) द्रव्यों का सेवन, सिखरन, चीनी तथा चीनी मिले हुए सत्तू, दूध, जङ्गली जीवों से भिन्न जीवों का मांस, शालि धान्य के चावल, मांसरस, चन्द्रसेवन (चाँदनी में सोना), दिन में सोना, चन्दन लगाना, शीतल जल और शर्वत पीना हितकर होता है और कटुक्षार (नमकीन) तथा अम्ल रस युक्त द्रव्यों का सेवन, घाम में रहना और परिश्रम करना अहितकर है अतः इन सब कामों को त्याग देना चाहिये ।।३५५।। अथ पूर्वोक्तर्तुचर्य्याऽऽचरणे फलमाह- ऋतुष्वेपु य एतैस्तु विधिभिर्वर्त्तते नरः। दोषानृतुकृतानैव लभते स कदाचन ।। ३५६ ।। इति श्रीलटकनतनय-श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे दिनचर्यादिप्रकरणं पञ्चमम् ।। ५ ।। ऋतुचर्याओं का आचरण करने से लाभ—जिन-जिन ऋतुओं में जो-जो विधियाँ कही हुई हैं, उन-उन ऋतुओं में उन-उन विधियों के अनुसार जो मनुष्य रहता है, उसे उन-उन ऋतुओं में होने वाले कोई भी दोष कभी नहीं प्राप्त होते हैं ।।३५६।। इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां पञ्चमदिनचर्यादिप्रकरणम् समाप्तम् ।।५।।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् अथ वाग्भटोक्तं व्याधेर्लक्षणम्- रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता। रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ।।१।। रोग के लक्षण-दोषों की विषमता ही को रोग तथा दोषों की समता ही को अरोगता (रोगों का न रहना) कहते हैं, इनमें से जो रोग हैं वे प्राणियों को दुःख देनेवाले होते हैं और वे ज्वर आदि कहलाते हैं ।।१।। ते च स्वाभाविकाः केचित्केचिदागन्तवः स्मृताः। मानसाः केचिदाख्याताः कथिताः केऽपि कायिकाः ।।२।। चार प्रकार के रोग-उन रोगों में कोई 'स्वाभाविक', कोई 'आगन्तुक', कोई 'मानस' और कोई 'कायिक' कहलाते हैं ।।२।। ❖ तत्र स्वाभाविकाः = शरीरस्वभावादेव जाताः क्षुत्पिपासासुषुप्तिजरामृत्युप्रभृतयः। अथवा स्वभावादुत्पत्तेर्जाता स्वाभाविकाः = सहजा इति यावत्। ते च जन्मान्धत्वादयः। आगन्तवोऽभिघातादिजनिताः। अथवा जन्मोत्तरभाविनः। मानसाः = कामक्रोधलोभमोहभयाभिमानदैन्यपैशुन्यशोकविषादेर्ष्याऽसूया-मात्सर्यप्रभृतयः, अथवा उन्मादापस्मारमूर्च्छाभ्रममोहतमःसंन्यासप्रभृतयः। कायिकाः = पाण्डुरोगप्रभृतयः ।।२।। उनमें 'स्वाभाविक' रोग वे कहलाते हैं जो शरीर के स्वभाव से ही उत्पन्न होते हैं, जैसे—भूख, प्यास, गाढ़ निद्रा, वृद्धता तथा मृत्यु आदि। अथवा जो जन्म से (माँ के पेट से) ही उत्पन्न होते हैं, वे भी 'स्वाभाविक' कहलाते हैं। जैसे— जन्म से ही अन्धा, बहिरा आदि। आगन्तुक-रोग वे हैं जो चोट आदि लगने से अथवा जन्म के बाद होनेवाले हैं। 'मानस' रोग वे कहलाते हैं, जो मन में उत्पन्न होते हैं, जैसे-काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, अभिमान, दीनता, पिशुनता (चुगलखोरी), शोक, विषाद, ईर्ष्या, असूया और मत्सरता आदि, अथवा उन्माद (पागलपन), अपस्मार (मिर्गी), मूर्च्छा, भ्रम, मोह, अन्धकार और संन्यास आदि। 'कायिक' रोग वे कहलाते हैं, जो शरीर में उत्पन्न होते हैं, जैसे-पाण्डु आदि ।।२।। अथ व्याधिभेदानाह- कर्मजाः कथिताः केचिद्दोषजाः सन्ति चापरे। कर्मदोषोद्भवाश्चान्ये व्याधयस्त्रिविधाः स्मृताः ।।३।। व्याधियों के भेद—कोई व्याधियाँ 'कर्मज' और कोई 'दोषज' तथा कोई कर्मज तथा दोषज दोनों होने से 'कर्मदोषोद्भव' अर्थात् 'कर्मदोषज' कहलाती हैं। इस प्रकार हेतुभेद से व्याधियों के तीन भेद होते हैं ।।३।। तत्र कर्मजान् व्याधीनाह- यत्राक्तनं दुष्कर्म प्रबलं केवलभोगनाश्यम्, प्रायश्चित्तनाश्यं वा, ततो जाताः, न तु दुष्टवातादिदोषेण जनितास्तथा- यथाशास्त्रं तु निर्णीतो यथाव्याधिचिकित्सतः। न शमं याति यो व्याधिः स ज्ञेयः कर्मजो बुधैः ।।१।। 'कर्मज' व्याधि—जो पूर्वजन्मकृत दुष्कर्म (पाप) प्रबल होते हैं वे केवल भोग से अथवा प्रायश्चित्त से नाश होने वाले होते हैं, अत एव जो व्याधियाँ उन्हीं से उत्पन्न हैं, किन्तु दूषित वातादि दोषों से नहीं उत्पन्न हुई हैं, वे ही 'कर्मज' कहलाती हैं। उसका लक्षण यह है कि—'जिसका शास्त्रानुसार निर्णय करके उसी निर्णीत के अनुकूल चिकित्सा भी हुई हो किन्तु फिर भी जो शान्त न हो उसी को 'कर्मज' व्याधि जानना चाहिये ।।१।।
१६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ दोषजान् व्याधीनाह- ❖ दोषजाः-मिथ्याऽऽहारविहारप्रकुपितवातपित्तकफजाः। ननु मिथ्याहारविहाराणामपि प्राक्तनसुकृतेन नैरूज्यं दृश्यत एव। ततो दोषजेष्वपि प्राक्तनं दुष्कर्मैव कारणम्, तत्कथं दोषजा इति ? उच्यते-दोषजेष्वपि वस्तुत आदिकारणं दुष्कर्म वर्तत एव, किन्तु तत्र मिथ्याऽऽहार-विहारदूषिता दोषा हेतवो दृश्यन्त इति दोषजा इत्युच्यन्त इति समाधिः। 'दोषज' व्याधि- 'दोषज' व्याधि वे कहलाती हैं जो मिथ्या (अवैध) आहार-विहार करने से कुपित हुये वात, पित्त तथा कफ से उत्पन्न होती है। यहाँ यदि ऐसा कहा जाय कि जब मिथ्या आहार-विहार करने वाले लोगों को भी प्राक्तन पुण्य के बल से रोग रहित देखते हैं, अतः दोषों से उत्पन्न होने वाले रोगों का भी प्राक्तन पाप ही प्रधान कारण है, तब व्याधियाँ कैसे 'दोषज' होती हैं ? इसका उत्तर यह है कि- यद्यपि दोषज व्याधियों में भी प्राक्तन पाप ही प्रधान कारण होता है, किन्तु तो भी यहाँ पर मिथ्या आहार-विहार से दूषित दोष भी कारणरूप से अवश्य दिखाई पड़ते हैं अतः पूर्वोक्त .व्याधियाँ दोषज कहलाती हैं। अथ कर्मदोषोद्भवान् व्याधीनाह- स्वल्पदोषा गरीयांसस्ते ज्ञेयाः कर्मदोषजाः ॥२॥ कर्म तथा दोष दोनों से उत्पन्न व्याधि- 'जो व्याधियाँ स्वल्प दूषित वातादि दोषों से उत्पन्न होने पर भी अधिक बढ़ जायें, उन्हें 'कर्मदोषज' समझना चाहिये ॥२॥ ❖ अत्र कारणं दुष्कर्म प्रबलं यतो दोषल्पत्वेऽपि व्याधेर्गरीयस्त्वं तत्कर्मक्षयादेव क्षीणं भवति। दोषाः स्वल्पा अपि निदानत्वेनोक्ता दृश्यन्त एवेति दोषाणां कारणतां मन्यत इति कर्मदोषोद्भवाः ॥३॥ पूर्वोक्त 'कर्मदोषज' व्याधियों में प्राक्तन दुष्कर्म ही प्रबल कारण होते हैं क्योंकि दोषों की दुष्टता में कमी होने पर भी व्याधियों की भयङ्करता बनी रहती है और भोग के द्वारा कर्मक्षय होने से ही क्षीण होती है और दोषों की स्वल्पता होने पर भी वे उत्पन्न होने में निदान (कारण) रूप से दिखलाई पड़ते हैं। अतः वे (दोष) भी कारण माने जाते हैं। इस भाँति से ये रोग 'कर्मदोषज' कहलाते हैं ॥३॥ अथ रोगक्षयहेतूनाह- कर्मक्षयात्कर्मकृता दोषजाः स्वस्वभेषजैः। कर्मदोषोद्भवा यान्ति कर्मदोषक्षयात् क्षयम् ॥४॥ कर्मजादि रोगों के क्षीण होने के कारण-भोग के द्वारा प्राक्तन दुष्कर्मों का क्षय होने से 'कर्मज' व्याधियों का, अपनी-अपनी ओषधियों के अर्थात् जिस दोष की जो ओषधियाँ हैं, उनके सेवन करने से 'दोषज' व्याधियों का एवं भोगों के द्वारा प्राक्तन अशुभ कर्मों तथा ओषधियों के द्वारा दोषों के क्षय होने से 'कर्मदोषज' व्याधियों का क्षय होता है ॥४॥ ❖ दोषजाः स्वस्वभेषजैरिति। दोषजेषु आदिकारणं दुष्कर्म तद्भेषजार्थं द्रव्यक्षयादिजनितदुःखभोगेन कटुतिक्तकषायाद्यहृद्यभक्षणादिजनितदुःखभागेन च क्षयं याति। शेषा दुष्टा हेतवो दोषास्ते स्वस्वभेषजैः क्षयं यान्तीत्यर्थः ॥४॥ 'दोषजाः स्वस्वभेषजैः' इसका तात्पर्य यह है कि-दोषज व्याधियों में भी प्रधान कारण तो प्राक्तन दुष्कर्म ही है अतः वह (दुष्कर्म) औषध तैयार करने में जो धन का क्षय होने से दुःख होता है उसी का भोग करने के द्वारा एवं कटु- तिक्त तथा कषायादि रसों से युक्त होने से अप्रिय औषधों के भक्षण आदि से उत्पन्न हुये दुःख का भोग करने के द्वारा नष्ट होता है और इसके अतिरिक्त जो अवशिष्ट कारण वातादि दुष्ट दोष हैं, वे अपने-अपने औषधों के सेवन के द्वारा क्षीण होते हैं ॥४॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १६५ अथ साध्यादिभेदेन त्रिविधान् रोगानाह- साध्या याप्या असाध्याश्च व्याधयस्त्रिविधाः स्मृताः । सुखसाध्यः कष्टसाध्यो द्विविधः साध्य उच्यते ॥५॥ साध्यादि भेद से तीन प्रकार के रोग—साध्य, याप्य और असाध्य भेद से रोग तीन प्रकार के होते हैं उनमें ‘साध्य’ भी दो प्रकार का होता है—सुखसाध्य और कष्टसाध्य ॥५॥ अथ याप्यलक्षणमाह- यापनीयं तु तं विद्यात्क्रिया धारयते हि यम् । क्रियायां तु निवृत्तायां सद्यो यश्च विनश्यति ।। प्राप्ता क्रिया धारयति सुखिनं याप्यमातुरम् । प्रपतिष्यदिवागारं स्तम्भो यत्नेन योजितः ।।७।। ‘याप्य’ के लक्षण—‘याप्य’ रोग उसे कहते हैं जिस रोग की चिकित्सा करने से रोगी स्वस्थ रहता हो, किन्तु चिकित्सा बन्द कर देने पर रोग बढ़ जाने से रोगी शीघ्र मर जाता हो । जैसे यत्न पूर्वक स्तम्भ खड़ा करने से गिरते हुए मकान खड़ा रहता है वैसे ही याप्य रोगों में उपयुक्त चिकित्सा करने से वह भी रोगी को मरने से बचा कर सुखपूर्वक रखता है ॥६-७॥ अथ साध्ययाप्ययोश्चिकित्साऽऽवश्य कत्वमित्याह- साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्यश्चाध्यतां तथा । घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ।।८।। साध्य-याप्य रोगों से युक्त रोगी की आवश्यक किचित्सा—जिनकी चिकित्सा नहीं हो रही है ऐसे जो रोगी हैं, उनके जो साध्य रोग हैं वे वाप्य के रूप में हो जाते हैं और जो याप्य रोग हैं, वे असाध्य के रूप में परिणत हो कर प्राणों को नष्ट कर देते हैं अतः इन सबों की किचित्सा करना अत्यावश्यक है ॥८॥ अक्रियावतां=चिकित्सारहितानाम् ।।८।। ‘अक्रियावताम्’ का ‘चिकित्सा से रहित रोगी के’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥८॥ अथोपद्रवस्य लक्षणमाह- रोगारम्भकदोषस्य प्रकोप दुपजायते । योऽन्यो विकारः स बुधैरुपद्रव इहोदितः ।।९।। उपद्रव के लक्षण—कुपथ्यवश रोगों के उत्पन्न करने वाले दोषों के अत्यन्त कुपित होने से जो रोग के अतिरिक्त दूसरा विकार उत्पन्न हो जाता है, उसे ‘उपद्रव’ कहते हैं ॥९॥ अथारिष्टस्य लक्षणमाह- रोगिणो मरणं यस्मादवश्यम्भावि लक्ष्यते । तल्लक्षणमरिष्टं स्याद्रिष्टं चापि तदुच्यते ।।१०।। अरिष्ट के लक्षण—जिस लक्षण के प्रकट होने से ‘रोगी अवश्य मर जायगा’ ऐसा मालूम पड़े उसे ‘अरिष्ट’ तथा ‘रिष्ट’ भी कहते हैं ॥१०॥ अथ चिकित्साया लक्षणमाह- या क्रिया व्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते । दोषधातुमलानां या साम्यकृत्सैव रोगहृत् ।।११।। चिकित्सा के लक्षण—जिस क्रिया के द्वारा व्याधि का नाश हो अर्थात् जो क्रिया दोष, धातु तथा मल, इन सबों को सम भाव में रखती हुई रोगों को हरण करनेवाली हो, उसी को ‘चिकित्सा’ कहते हैं ॥११॥ ❖ क्रियाऽत्र कर्म । व्याधिर्हन्यतेऽनयेति व्याधिहरणी । करणाधिकरणयोश्चेति सूत्रेण करणार्थेल्युट् ।।११।।
१६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चिकित्सक को चाहिये कि वह पहले रोग का परिज्ञान करने में अर्थात् रोग की अवस्था कैसी है इसके समझने में आदि से लेकर अन्त तक प्रयत्न करे, तत्पश्चात् ओषधों का जैसा विधान हो उसके अनुकूल 'चिकित्सा' करे ॥२१॥ चिकित्सितमित्यत्र भावे क्तः ॥२१॥ 'चिकित्सितम्' इस प्रयोग में भाव में क्त प्रत्यय होने से इसका 'चिकित्सा' अर्थ होता है ॥२१॥ विकारनामाकुशलो न जिह्रीयात्कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥२१॥ यदि कोई वैद्य ऐसा हो कि वह सभी विकार अर्थात् रोगों का नाम न बतला सके तो उसे कभी लजाना नहीं चाहिये क्योंकि सम्पूर्ण रोगों की स्थिति नाम के द्वारा ही नियत नहीं है ॥२२॥ ❖ न जिह्रीयान्न लज्जेत् । ध्रुवा=नियता ॥२२॥ 'न जिह्रीयात्' का 'लजाना नहीं चाहिये' तथा ध्रुवा' पद का 'नियत' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२॥ नास्ति रोगो बिना दोषैर्यस्मात्तस्माच्चिकित्सकः । अनुक्तमपि दोषाणां लिङ्गैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥२३॥ बिना दोषों के कोई रोग नहीं होता अतः चिकित्सक को चाहिये कि जिन रोगों के नामों का शास्त्रों में उल्लेख न हो तो भी दोषों के लक्षणों से ही उन रोगों की चिकित्सा करे ॥२३॥ ये न कुर्वन्त्यसाध्यानां चिकित्सां ते भिषग्वराः । अतो वैद्यैः श्रमः कार्यः साध्यासाध्यपरीक्षणे ॥२४॥ जो वैद्य असाध्य रोगों की चिकित्सा नहीं करते वे परम चतुर कहलाते हैं अतः रोग साध्य अथवा असाध्य है, इसकी परीक्षा करने में वैद्यों को अवश्य श्रम करना चाहिये ॥२४॥ (१रोगज्ञानोपाया अग्रे वक्ष्यन्ते ॥२४॥) रोगज्ञान का उपाय आगे (चिकित्साप्रकरण में) कहेंगे ॥२४॥ अथ चिकित्सापद्धतिमाह- शीते शीतप्रतीकारमुष्णे तूष्णनिवारणम् । कृत्वा कुर्यात्क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥२५॥ चिकित्सा करने की पद्धति—शीत से उत्पन्न रोग में शीत का और गर्मी से उत्पन्न रोग में गर्मी का प्रतीकार कर जो उपयुक्त चिकित्सा हो उसे करना चाहिये । किन्तु चिकित्सा का समय उपस्थित होने पर उसे नहीं छोड़ना चाहिये ॥२५॥ अप्राप्तेवा क्रियाकाले प्राप्तेवा न क्रिया कृता । क्रियाहीनाऽतिरिक्ता च साध्येष्वापि न सिध्यति ।।२६।। चिकित्सा का समय होने के पूर्व ही चिकित्सा करने पर अथवा चिकित्सा का समय होने पर चिकित्सा न करके बाद में चिकित्सा करने पर किंवा हीन चिकित्सा अर्थात् प्रबल रोग में स्वल्प चिकित्सा अथवा अतिरिक्त चिकित्सा अर्थात् स्वल्प रोग में प्रबल चिकित्सा करने पर जो साध्य रोग हैं, उनमें भी लाभ नहीं होता अर्थात् रोग से आराम नहीं होता है ॥२६॥ ❖ अयमर्थः-काले=चिकित्साऽवसरे । अप्राप्ते=अनागते । या क्रिया=चिकित्सा । यथा ज्वरे जीर्णतामप्राप्ते तरुण एव कषायदानक्रिया न सिद्ध्यति । या च क्रिया चिकित्साऽवसरे प्राप्ते न कृता । अर्थात्पश्चात्कृता । यथा दाहे कथञ्चिच्छान्ते पश्चाच्छीतानुलेपनादि क्रिया तथा हीनाऽतिरिक्ता च क्रिया साध्येष्वापि न सिध्यति ।। २६ ।। यहाँ विशेष-विशेष पदों का यह अर्थ है कि—'काल' अर्थात् चिकित्सा का अवसर, अप्राप्त अर्थात् 'नहीं प्राप्त होने पर' जो 'क्रिया' (चिकित्सा) है, वह साध्य रोगों में भी नहीं काम देती, जैसे कि यदि ज्वर जीर्ण न हुआ हो १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १६९ अर्थात् तरुण (नवीन) ही हो तो उस समय काढ़ा आदि देने के द्वारा चिकित्सा करना लाभदायक नहीं होता और जो चिकित्सा काल अर्थात् चिकित्सा का उपयुक्त समय प्राप्त होने पर नहीं की जाती अर्थात् पीछे (चिकित्सा का समय बीत जाने पर) की जाती है वह निष्फल होती है । जैसे कि किसी प्रकार से दाह के शान्त हो जाने पर पीछे शीतल लेपादि द्वारा चिकित्सा करना व्यर्थ होता है । उसी प्रकार रोग की अपेक्षा हीन चिकित्सा तथा अतिरिक्त (रोग की अपेक्षा अधिक) चिकित्सा भी साध्य रोगों में सिद्ध (लाभदायक) नहीं होती ॥२६॥ अथातिरिक्तां हीनां च क्रियां वर्जयन्नाह- विकारेऽल्पे महत्कर्म क्रिया लघ्वी गरीयसी । द्वयमेतदकौशल्यं कौशल्यं युक्तकर्मता ॥२७॥ क्रियायास्तु गुणालाभे क्रियामन्यां प्रयोजयेत् । पूर्वस्यां शान्तवेगायां न क्रियासङ्करो हितः ॥२८॥ अतिरिक्त तथा हीन चिकित्सा का निषेध—स्वल्प रोग में उग्र ओषधियों द्वारा बड़ी चिकित्सा करना तथा प्रबल रोग में मामूली ओषधियों द्वारा साधारण चिकित्सा करना दोनों ही चिकित्सक निपुण नहीं हैं इस बात के द्योतक होते हैं । अतएव चिकित्सक की निपुणता इसी में हैं कि वह रोग के अनुकूल साधारण या विशेष चिकित्सा करे । रोग की शान्ति के लिये जो चिकित्सा की जाय, उससे यदि लाभ न होता हो तो दूसरी चिकित्सा करनी चाहिये किन्तु वह भी उसी अवस्था में जब कि पूर्व की हुई चिकित्सा का वेग शान्त हो जाय, क्योंकि चिकित्साओं का मेल होना हितकारक नहीं होता ॥२७-२८॥ भिन्नरूपाभिस्तु क्रियाभिः सांकर्यमपि न दोषाय । यत आह- क्रियाभिस्तुल्यरूपार्भिर्न क्रियासङ्करो हितः । ताभिस्तु भिन्नरूपाभिः साङ्कर्यं नैव दुष्यतिं ।। परस्पर भिन्न स्वरूपवाली चिकित्साओं का एकत्र विधान—परस्पर समान स्वरूपवाली चिकित्साओं के द्वारा जो चिकित्सा का मेल होता है, वही हितकर नहीं होता किन्तु यदि वे ही भिन्न स्वरूप वाली होवें तो उनका मेल होना हितकारी ही होता है ॥२९॥ ❖ अत एवोक्तम्- लङ्घनं बालुकास्वेदो नस्यं निष्ठीवनं तथा । अवलेहोऽञ्जनं चापि प्राक् प्रयोज्यं त्रिदोषजे ॥४॥ अत एव कहा है कि—लङ्घन (उपवास कराना), बालुकास्वेद (बालू के द्वारा पसीना निकलवाना), नस्य (ओषधियों के रस का नस लेना), निष्ठीवन (ओषधियों के द्वारा मुख से लार गिरवाना), अवलेह (ओषधियों की चटनी बना कर चटाना) और अञ्जन (आँखों में ओषधियों का अञ्जन लगाना), इन सब क्रियाओं का त्रिदोषज (सान्निपातिक) ज्वर में सबसे पहले प्रयोग करना चाहिये ॥४॥२९॥ ❖ ज्वर इति शेषः ।।४।।२९।। यहाँ श्लोक में 'त्रिदोषजे' के आगे यद्यपि 'ज्वरे' ऐसा नहीं कहा गया है तथापि 'त्रिदोषज ज्वर में' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४॥२९॥ न चैकान्तेन निर्दिष्टे शास्त्रे निविशते बुधः । स्वयमप्यत्र भिषजा तर्कणीयं चिकित्सता ॥३०॥ जो आयुर्वेद शास्त्र के विद्वान् चिकित्सक हैं वे केवल शास्त्र में कही हुई चिकित्साविधि के ऊपर निर्भर नहीं रहते हैं अतः वैद्य को चाहिये कि चिकित्सा करते समय स्वयं भी चिकित्सा के विषय में विचार करें ॥३०॥ यत आह- उत्पद्यते च साऽवस्था दोषकालबलं प्रति । यस्यां कार्यमकार्यं स्यात्कर्म कार्यं विवर्जितम् ॥३१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
१७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे क्योंकि दोष, काल तथा बल के अनुसार कभी-कभी ऐसी भी अवस्था उपस्थित हो जाती है कि उस समय शास्त्र में कही हुई विधियाँ नहीं वर्ती जातीं किन्तु वर्जित विधि से ही काम ली जाती है ॥ विवर्जितं कर्म कर्तव्यं भवतीत्यर्थः ।।३१।। ‘विवर्जितं कर्म कर्तव्यं भवति’ अर्थात् वर्जित की हुई ‘विधियाँ’ की जाती हैं’ ।।३१।। अथ चिकित्सायाः फलमाह- क्वचिदर्थः क्वचिन्मैत्री क्वचिद्धर्मः क्वचिद्यशः । कर्माभ्यासः क्वचिच्चेति चिकित्सा नास्ति निष्फला ।।३२।। आयुर्वेदोदितां युक्तिं कुर्वाणाश्च हिताय¹ ये । पुण्यायुर्वृद्धिसंयुक्ता नीरोगाश्च भवन्ति ते ।।३३।। चिकित्सा करने से फल—चिकित्सा करने से कहीं धन, कहीं मित्रता, कहीं धर्म, कहीं यश और कहीं चिकित्सा करने के अभ्यास का ही लाभ होता है। अत एव चिकित्सा कभी निष्फल नहीं होती। जो चिकित्सक केवल रोगों की हित कामना से ही आयुर्वेदशास्त्र में कही हुई युक्तियों से चिकित्सा करते हैं उनके पुण्य तथा आयु की वृद्धि होती है और वे नीरोग भी होते हैं ।।३२/३३।। अथ धनिभ्योऽर्थग्रहणं वैद्यानां समुचितमित्याह- नैव कुर्वीत लोभेन चिकित्सापुण्यविक्रयम् । ईश्वराणां वसुमतां लिप्सेतार्थं तु वृत्तये ।।३४।। धनियों से धन लेकर चिकित्सा का विधान—लोभ से धन लेकर चिकित्सा करने से उत्पन्न हुये महान् पुण्य का विक्रय न करे, किन्तु यदि जीवन निर्वाह के लिये धन लेना पड़े तो धनवान् तथा सामर्थ्यशाली से धन ग्रहण करने की इच्छा करे किन्तु गरीबों से धन न लेवे ।।३४।। अथ निःशुल्ककारितचिकित्साफलमाह- चिकित्सितं शरीरं यो न निष्क्रीणाति दुर्मतिः । स यत्करोति सुकृतं सर्वं तद्भिषगश्नुते ।।३५।। निःशुल्क चिकित्सा कराने में दोष—जो मूढ़ रोगी आरोग्य लाभ करने के पश्चात् चिकित्सक को धनादि नहीं देता वह जो कुछ पुण्य करता है, सब वैद्य को मिल जाता है । (अतः वैद्य को शक्त्यनुसार अवश्य कुछ देकर चिकित्सा करानी चाहिये) ।।३५।। अथ वैद्यवृत्तिः सर्वत्र सुसिद्धेत्याह- न देशो मनुजैर्हीनो न मनुष्या निरामयाः । ततः सर्वत्र वैद्यानां सुसिद्धा एव वृत्तयः ।।३६।। वैद्य की चिकित्सा वृद्धि का प्रसार—कोई देश मनुष्यों से हीन नहीं है और कोई मनुष्य रोग से हीन नहीं है अतः सर्वत्र वैद्यों की वृत्ति (आजीविका) सर्वथा सिद्ध (बनी बनाई) है ।।३६।। अथ चिकित्साया अङ्गान्याह- रोगी दूतो भिषग्दीर्घमायुर्द्रव्यं सुसेवकः । सदौषधं चिकित्साया इत्यङ्गानि बुधा जगुः ।।३७।। चिकित्सा के अङ्ग—(१) रोगी, (२) दूत, (३) वैद्य, (४) दीर्घ आयु, (५) द्रव्य, (६) सुन्दर सेवक और (७) उत्तम औषध इन सबों को चिकित्सा का अङ्ग कहा है अर्थात् बिना इनके चिकित्सा नहीं हो सकती ।।३७।।
१. 'विहिताश्चै'ति पाठा. ।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७१ तत्र रोगिणो लक्षणमाह- रोगो यस्यास्ति रोगी स सचिकित्स्यस्तु यादृशः । यादृशश्चाचिकित्स्योऽपि वक्ष्यमाणो निशम्यताम् ।।३८।। रोगी के लक्षण—जिसे रोग हो वह रोगी कहलाता है। वह रोगी जिस प्रकार चिकित्सा करने के योग्य अथवा अयोग्य होता है उसके लक्षण आगे कह रहे हैं ।।३८।। तत्र चिकित्स्यस्य लक्षणमाह- निजप्रकृतिवर्णाभ्यां युक्तःसत्त्वेन चक्षुषा । चिकित्स्यो भिषजां रोगी वैद्यभक्तो जितेन्द्रियः ।।३९।। चिकित्स्य रोगी के लक्षण—वैद्यों के लिये वही रोगी चिकित्सा करने योग्य है जिसकी प्रकृति तथा शरीर का रङ्ग बदला न हो एवं सत्त्व से युक्त तथा देखने की शक्ति जिसकी बनी हो तथा वैद्य में भक्ति रखनेवाला और जितेन्द्रिय हो ।।३९।। ❖ सत्त्वं=व्यसनाभ्युदयक्रियादिष्वविह्वलत्ताकरं, तेन युक्तः । चक्षुषा=चक्षुरुपलक्षितेन, ततोऽन्येनापीन्द्रियेण । चिकित्स्यः=रोगान्मोक्षयितव्यः ।।३९।। सत्त्व से युक्त अर्थात् विपत्ति तथा अभ्युदय (तरक्की) होने पर विह्वल न होना 'सत्त्व' कहलाता है उससे युक्त तथा 'चक्षुरिन्द्रिय' यह उपलक्षण मात्र है अतः चक्षुरिन्द्रिय के साथ-साथ जिसकी और भी इन्द्रियाँ नाक, कान आदि अपने-अपने विषयों के ग्रहण करने योग्य बनी हों एवं 'चिकित्स्य' पद से 'रोग से मुक्त करने योग्य अर्थात् चिकित्सा करने के योग्य' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३९।। अन्यच्च- आयुष्मान्सत्त्ववान्साध्यो द्रव्यवान्मित्रवानपि । चिकित्स्यो भिषजां रोगी वैद्यवाक्यकृदास्तिकः ।।४०।। और भी कहा है कि वैद्य को उसी रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये—जिसकी आयु शेष हो अर्थात् जो आयुष्मान् हो और सत्त्ववान्, साध्य रोग से युक्त, द्रव्यवान्, मित्रवान् (हितैषी), वैद्य के कथनानुसार कार्य करनेवाला और आस्तिक हो ।।४०।। ❖ आयुर्वेदोऽस्तीति मतिर्यस्य स आस्तिकः ।।४०।। यहाँ 'आस्तिक' से 'आयुर्वेद शास्त्र है ऐसी मति जिसकी हो, वह आस्तिक कहलाता है' ।।४०।। अथाचिकित्स्यस्य लक्षणमाह- चण्डः साहसिको भीरुः कृतघ्नो व्यग्र एव च । शोकाकुलो मुमूर्षुश्च विहीनःकरणैश्च यः ।।४१।। वैरी वैद्यविदग्धश्च श्रद्धाहीनश्च शङ्कितः । भिषजामविधेयः स्युर्नोपक्रम्या भिषग्विधाः ।।४२।। अचिकित्स्य रोगी के लक्षण—अत्यन्त क्रोधी, बिना विचार किये कार्य करने वाला, भीरु, कृतघ्न, व्यग्र, शोक से आकुल, मृत्यु की इच्छा रखने वाला, इन्द्रियों से विहीन, वैरी, वैद्यों के साथ धूर्तता करनेवाला तथा वैद्यों के वचनों पर न चलनेवाला एवं अपने को वैद्यों के समान माननेवाला रोगी चिकित्सा करने के योग्य नहीं होता है ।।४१-४२।। ❖ चण्डोऽत्यन्तक्रोधशीलः । साहसिकः=अविचार्यकारी । भीरुर्भयशीलः । कृतघ्नो=वैद्यकृतोपकार- लोपकः । व्यग्रः=व्याकुलः । विहीनः करणैश्च यः=१नेत्रादीन्द्रियशक्तिरहितः ।। वैरी न चिकित्स्यः १. 'निजेन्द्रिये'ति पाठः ।
१७२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कदाचिद्रोगोद्रेकेऽपवादभयात् । वैद्यविदग्धो=वैद्यधूर्त्तः । शंकितो=वैद्यविश्वासरहितः । भिषजाम्- विधेयाः=वैद्यवचनाविधायिनः । भिषग्विधाः=वैद्यतुल्याः । एते न उपक्रम्याः=न चिकित्स्याः । तथा च सुश्रुतः- स न सिद्ध्यति वैद्यस्तु गृहे यस्य न पूज्यते ।।४१'-४२।। यहाँ 'चण्ड' से 'अत्यन्त क्रोध करने का जिसका स्वभाव हो;' 'साहसिकः' से 'बिना विचार किये कार्य करने वाला' । 'भीरुः' से 'डरपोक' । 'कृतघ्नः' से 'वैद्य के किये हुये उपकार को न मानने वाला' । 'व्यग्रः' से 'व्याकुल चित्त वाला' और 'विहीनः करणैश्च यः' से 'जो नेत्रादि इन्द्रियों की शक्ति से रहित हो' यह अर्थ समझना चाहिये । और 'वैरी' का नाम इसलिये लिया गया है, कि यदि उसकी चिकित्सा की जाय और बाद में कदाचित् उसका रोग बढ़ जाय तो वह अपवाद लगावेगा इस भय से वह अचिकित्स्य है । 'वैद्यविदग्धः' से 'वैद्यों के साथ धूर्त्तता करने वाला' । 'शङ्कितः' से 'वैद्य के ऊपर विश्वास नहीं रखते वाला' । 'भिषजामविधेयाः' से 'वैद्यों के वचन को न करने वाला' । 'भिषग्विधाः' से 'अपने को वैद्यों के समान मानने वाला' । 'एते न उपक्रम्याः' अर्थात् 'ये चिकित्सा करने के योग्य नहीं होते हैं। यह अर्थ समझना चाहिये । इसी विषय में 'सुश्रुत' कहते हैं कि—'वह रोगी आरोग्य लाभ नहीं कर सकता जिसके गृह में वैद्य का सम्मान नहीं होता है' ।।४१-४२।। अथाचिकित्स्यानां चिकित्सानिषेधमाह- एतानुपाचरन् वैद्यो बहून् दोषानवाप्नुयात् ।।४३।। अचिकित्स्य रोगियों की चिकित्सा का निषेध—पूर्वोक्त अचिकित्स्य रोगियों की यदि कोई वैद्य चिकित्सा करता है तो वह अनेक दोषों को प्राप्त करता है ।।४३।। अथ दूतस्य लक्षणमाह- यश्चिकित्सकमानेतुं याति दूतः स कथ्यते । स च यादृक् समुचितस्तादृगत्र निगद्यते ।।४४।। दूताः सुजातयोऽव्यङ्गाः पटवो निर्मलाम्बराः । सुखिनोऽश्ववृषारूढाः शुभ्रपुष्पफलैर्युताः ।।४५।। सजातयः सुचेष्टाश्च सजीवदिशि सङ्गताः । भिषजं समये प्राप्ता रोगिणः सुखहेतवे ।।४६।। दूत के लक्षण—जो चिकित्सक को ले आने के लिये जाता है उसे दूत कहते हैं, वह जैसा उचित होता है वैसा कहते हैं—जो दूत होकर वैद्य के पास जाय वह अच्छी जाति का हो एवं किसी अङ्ग से हीन न हो तथा चतुर, स्वच्छ वस्त्र पहने हुये, सुखी (प्रसन्न चित्त), घोड़ा या बैलगाड़ी पर चढ़ा हुआ सफेद पुष्प एवं फल से युक्त सजातिक, अच्छी चेष्टा से युक्त, वैद्य के पास जाकर सजीव अर्थात् नासिका के जिस भाग से श्वास चलता हो उसी भाग में बैठने वाला और वैद्य के मिलने का जो समय हो उसी में उसके घर पहुँचने वाला इस प्रकार के जो दूत होते हैं वे ही रोगी के सुख के हेतु (सुख पहुँचाने वाले) होते हैं ।।४४-४६।। सजातयः=रोगिसमानजातयः । यस्यां प्राणमरुद्धाति सा नाडी जीवसंज्ञिता ।।५।।४६।। यहाँ 'सजातयः' से 'रोगी के समान जातिवाले' और 'सजीवदिशि सङ्गताः' पद में स्थित 'जीव' पद से यह अर्थ समझना चाहिये कि 'जिस नासिका में प्राणवायु अर्थात् श्वास बहता हो वह नाड़ी जीवसंज्ञक कहलाती है' और इससे यह भी समझना चाहिये कि 'यदि दाहिना श्वास चलता हो तो दाहिनी ओर बायाँ श्वास चलता हो तो बायीं ओर वैद्य के पास जाकर बैठे' ।।५।।४६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
-shaped on the left, connector, vertical stem: that is 100% identical to 'स'! And then 'मग्निम्'! So the printed text in the book LITERALLY says: "प्रदीप्तसमग्निम् ॥४७॥" Wait, or is it: Wait, could it be "प्रदीप्तसद्मग्निम्"? No. Could it be: "प्रदीप्तं समग्निम्"? No, there is no anusvara on 'प्त'. It is printed as: "प्रदीप्तसमग्निम् ॥४७॥"! Wait, whether it was intended as "प्रदीप्तमग्निम्" (with an accidental extra 'स' by the typesetter) or "प्रदीप्तसमग्निम्", the user prompt specifically instructs: "Transcribe the image ... line by line into pure, clean Markdown in Devanagari." Wait, let's look at the instruction: "Transcribe the ... page line by line into pure, clean Markdown in Devanagari. Include all Sanskrit shlokas, yogas, pharmaceutical formulations, bhasma preparations, disease descriptions, Hindi translation, and footnotes. Prefix each line with line marker like , ." So our goal is to accurately transcribe what is printed on the page! Let's check every single line carefully.
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Page Header: अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७३ Wait, is it "षष्ठम" or
॥६॥
Line 29: तेन कालेन संयुक्तः संहाराय नियुक्तः सोऽवश्यम्भावी । शेषाः शतं मृत्यवः, आगन्तवः=आगन्तु-
Line 30: रूपहेतुजन्मानः कार्यकारणयोरभेदोपचारात् ।
Line 31: इस प्रकार काल संयुक्त जो मृत्यु है वह सम्पूर्ण जगत् के संहार करने के लिये नियुक्त है अत एव वह अवश्य
Line 32: होने वाली मृत्यु कहलाती है। शेष जो १०० प्रकार की मृत्यु हैं ये 'आगन्तुक' कहलाती हैं अर्थात् 'आगन्तुक' रूप कारणों
Line 33 (Footnote): १. 'व्यथाया' इति पा. ।
Everything is accounted for accurately.१७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ वैद्यस्य कर्माह- व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः। एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः ॥५३॥ वैद्य का कर्त्तव्य—रोग का यथार्थरूप से समझना तथा रोगी के कष्ट को दूर करना ये ही वस्तुतः वैद्य के मुख्य कर्म हैं, आयु का प्रभु तो वैद्य नहीं (भगवान् होता) है अर्थात् रोगी के मृत्यु को हटाना वैद्य का कर्म नहीं है ॥५३॥
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से उत्पन्न होने वाली होती हैं अत एव 'आगन्तुक' कहलाती हैं। यहाँ 'आगन्तुक' से उत्पन्न होकर भी जो 'आगन्तुक' ही कहलाती है उसका कारण यह है कि कार्य और कारण का दार्शनिकों ने अभेद माना है अतः लाक्षणिक प्रयोग समझना चाहिये ॥ ❖ आगन्तवो हेतवो यथा-विषभक्षणमजीर्णमत्यन्तभोजनं च, दुर्देशजलपानम्, तथाऽतिबलवैरि- व्याघ्रवनमहिषमत्तमातङ्गादिभिर्युद्धम्, दन्दशूकेन क्रीडनम्, अत्युच्चवृक्षाग्रारोहणम्, बाहुभ्यां महातरङ्गिणीतरणम्, एकाकिनो रात्रौ दुर्गे मार्गे गमनमित्यादि ।।५।। आगन्तुक हेतु—विष भक्षण, अजीर्ण और अत्यन्त भोजन, दुष्ट देशों का (जहाँ का पानी लगता हो ऐसे देशों का) जल पीना तथा अत्यन्त बलवान् वैरी, व्याघ्र, जङ्गली भैंसा और मतवाला हाथी आदि के साथ युद्ध करना, विषधर सर्पादिकों के साथ खेल करना, अत्यन्त ऊँचे वृक्षों के अग्र
१७.६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सार्थ युद्ध करना इत्यादि हैं इन सब कारणों से उत्पन्न होनेवाली जो सौ प्रकार की मृत्यु हैं उनसे और वैद्य तथा पुरोहित ये दोनों कैसे सौ प्रकार की मृत्युओं को हटाने में समर्थ हो सकते हैं? इस शङ्का की निवृत्ति करने के लिये कहते हैं- क्योंकि वे दोनों रसमन्त्र विशारद हैं अर्थात् वैद्य रसविशारद है और पुरोहित मन्त्रविशारद है उसमें प्रथम वैद्य दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या में कहे हुए आहार तथा विहार कराने से वात, पित्त, कफ इन धातुओं को तथा मल को समान भाव से रखकर रक्षा करे तदनन्तर वह रसविशारद अर्थात् रस का जानने वाला है अत एव रस जो मृत्युञ्जयादि हैं उनके द्वारा जो निषिद्ध आहार तथा बिहार के करने से दूषित हुए दोषों से उत्पन्न होने वाले मृत्यु के कारण स्वरूप विकार (रोग) हैं उनको दूर करे और मन्त्री अर्थात् पुरोहित सद्बुद्धि (अच्छी सलाह) देने के द्वारा मृत्यु के कारण जो निषिद्ध विहार बलवान् शत्रुओं के साथ लड़ना आदि है उनसे राजा को दूर रखे। इससे आगन्तुक मृत्यु निवारण करने के योग्य ही होती है न कि अवश्यम्भावी (नहीं निवारण करने के योग्य) होती है ॥८।५३॥ अथायुर्विचारमाह- भिषगादौ परीक्षेत रुग्णस्यायुः प्रयत्नतः। तत आयुषि विस्तीर्णे चिकित्सा सफला भवेत् ॥५४॥ रोगी के प्रथम आयु का विचार-वैद्य प्रथम यत्नपूर्वक रोगी के आयु की परीक्षा करे क्योंकि आयु रहने पर ही चिकित्सा सफल होती है ॥५४॥ अथ दीर्घायुषो लक्षणान्याह- सौम्या दृष्टिर्भवेद्यस्य श्रोत्रं वक्त्रं तथैव च। स्वादु गन्धं विजानाति स साध्यो नात्र संशयः ॥५५॥ पाणिपादौ च यस्योष्णौ दाहः स्वल्पतरो भवेत्। जिह्वा तु कोमला यस्य स रोगी न विनश्यति ॥५६॥ स्वेदहीनो ज्वरो यस्य श्वासो नासिकया चरेत्। कण्ठश्च कफहीनः स्यात्स रोगी जीवति ध्रुवम् ॥५७॥ यस्य निद्रा सुखेन स्याच्छरीरं द्युतिमद्भवेत्। इन्द्रियाणि प्रसन्नानि स रोगी नैव नश्यति ॥५८॥ दीर्घायु रोगी के लक्षण-जिस रोगी के आँख, कान तथा मुख सौम्य (विकृति भाव को न प्राप्त) हों तथा जो रस का स्वाद तथा गन्ध की भलाई-बुराई को भली भाँति जानता हो वह रोगी निःसंशय साध्य होता है अर्थात् चिकित्सा करने से निश्चय आरोग्य लाभ करता है। जिस रोगी के हाथ पैर गर्म हों, दाह बहुत थोड़ा होता हो, जिह्वा कोमल हो, स्वेद (पसीना) से रहित ज्वर हो, नासिका से श्वास चलता हो, गले में कफ न हो, सुखपूर्वक निद्रा आती हो, शरीर में कान्ति हो और इन्द्रियाँ प्रसन्न हों वह रोगी नहीं मरता है ॥५५-५८॥ अथ स्वल्पायुषो लक्षणान्याह- शरीरशीलयोर्यस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत्। तदरिष्टं समासेन व्यासतः शृणु निबोध मे ॥५९॥ शृणोति विविधाञ्छब्दान्विपरीताञ्छृणोति च। यो न शृणोति चाकस्मात्तं वदन्ति गतायुषम् ॥६०॥ स्वल्प आयुवाले रोगियों के लक्षण-जिस रोगी के स्वाभाविक शरीर तथा स्वभाव में अन्तर पड़ गया हो, वह उसके लिये अरिष्ट के लक्षण होता है, यह संक्षेप से समझना चाहिये। विस्तृत रूप से अरिष्ट का कारण यह है कि जो रोगी शब्द न होने पर भी अनेक प्रकार के शब्दों को बराबर सुनता हो वा विपरीत शब्दों को सुनता हो अथवा अकस्मात् नहीं सुनने लगता हो उसे गतायु कहते हैं ॥५९-६०॥ यस्तूष्णमिव गृह्णाति शीतमुष्णं च शीतवत्। उष्णागात्रोऽतिमात्रं यो भृशं शीतेन कम्पते ॥६१॥ जो शीतल वस्तु को उष्ण वस्तु की भाँति और उष्ण वस्तु को शीतल वस्तु की भाँति ग्रहण करता हो तथा जिसका शरीर वस्त्रादि के ओढ़ने से गर्म होते हुये भी शीत से अत्यन्त काँपता हो उसे भी गतायु कहते हैं ॥६१॥
❖ तमपि गतायुषं वदन्तीत्यन्वयः ।। ६१ ।। यहाँ 'उसे भी लोग गतायु कहते हैं' 'यह अन्वय ऊपर के ६० श्लोक से लाकर किया जाता है। प्रहारं नैव जानाति योऽङ्गच्छेदमथापि¹ वा। पांशुनेवावकीर्णानि यश्च गात्राणि मन्यते ।। ६२ ।। वर्णान्यता वा राज्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि। स्नातानुलिप्तं यं चापि भजन्ते नीलमाक्षिकाः² ।। ६३ ।। विपरीतेन गृह्णाति रसान्यश्चोपयोजितान्। यो वा रसान्न संवेत्ति³ तं गतासुं प्रचक्षते ।। ६४ ।। जो प्रहार नहीं जानता अर्थात् मारने पर जिसे चोट नहीं मालूम पड़ती या अङ्गों के काटने पर भी जिसे कुछ नहीं मालूम पड़ता और जो अपने अङ्गों को धूलि से भरा हुआ समझता है। एवं जिसके शरीर का वर्णभिन्न प्रकार का या उसमें बहुत सी रेखायें हो जायें और स्नान और चन्दनादि का अनुलेपन कर चुकने पर भी जिसके ऊपर नीली मक्खियाँ आकर बैठने लगें और जो जिस रस का उपयोग करता हो उसे उसके विरुद्ध अर्थात् मधुर को अम्ल और अम्ल को मधुर समझे [L10
१७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तो उसे गतायु कहते हैं और जो दर्पण, जल वा धूप में अपने प्रतिबिम्ब को न देखता हो अथवा अपने प्रतिबिम्ब या छाया को एक किसी अङ्ग से हीन या विकृति रूपवाली, या कुत्ता, कौवा, कङ्कपक्षी, गिद्ध, प्रेत, यक्ष और राक्षस की अथवा इनसे अन्य किसी प्राणी की छाया के समान देखे तो यदि वह रोगी हो तो उस की मृत्यु निकट होती है और स्वस्थ हो तो उसे शीघ्र रोग होने की संभावना रहती है ॥६७-७२॥ ह्रीश्रियौ नश्यतो यस्य तेन ओजः स्मृतिः प्रभा । अकस्माच्च भजन्ते यं स गतासुरसंशयम् ।।७३।। अकस्मात् जिसकी लज्जा, शोभा, तेज, ओज, स्मरणशक्ति और प्रतिभा ये सब नष्ट हो जायँ या अकस्मात् ये सब प्राप्त हो जावें तो उसे निःसन्देह गतायु समझना चाहिये ॥७३॥ ❖ प्रभा=प्रतिभा ।।७३।। यहाँ 'प्रभा' का 'प्रतिभा' अर्थ समझना चाहिये ।।७३।। यस्याधरोष्ठः पतितः क्षिप्तोश्चोर्ध्वं तथोत्तरः । उभौ वा जाम्बवाभासौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ।।७४।। आरक्ता दशना यस्य श्यावा वा स्युः पतन्ति वा । खञ्जनप्रतिभा१ वापि तं गतायुषमादिशेत् ।।७५।। कृष्णा तथाऽनुलिप्ता च जिह्वा शून्या च यस्य वै । कर्कशा वा भवेद्यस्य सोऽचिराद्विजहात्यसून् ।।७६।। जिसका नीचेवाला ओष्ठ नीचे को लटक जाय और ऊपर का ओष्ठ ऊपर की ओर उठ जाय अथवा जामुन के रङ्ग का हो जाय तो उसका जीना दुर्लभ समझना चाहिये और जिसके सब दाँत लाल वर्ण तथा श्याव अर्थात् धूम्र वर्ण के हो जायँ या गिर जायँ या खंजन पक्षी के तुल्य वर्ण के हो जायँ तो उसे गतायु समझना चाहिये और जिसकी जिह्वा काली पड़ जाय या मल से लिपटी हुई तथा रस ग्रहण करने में सुख या कर्कश अर्थात् खुरदरी हो जाय तो वह बहुत शीघ्र प्राणों को छोड़ता है (मर जाता है) ।।७४-७६।। कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का वा यस्य नासिका । अवस्फूर्जति भग्ना वा स न जीवति मानवः ।।७७।। जिसकी नाक टेढ़ी, फटी सूखी वा झुकी सी हो या श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो तो वह मनुष्य नहीं जीता है ॥७७॥ स्फूर्जति=श्वासवेगेनोच्चैः शब्दं करोतीत्यर्थः ।।७७।। 'स्फूर्जति' का 'श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७७॥ संक्षिप्ते विषमे स्तब्धे रूक्षे सास्त्रे च लोचने । स्यातां परिश्रुते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुवम् ।।७८।। जिसके दोनों नेत्र सङ्कुचित, विषम (छोटे बड़े), पथराये हुये, रूखे, आँसुओं से भरे अथवा आँसू गिरते हुये हों तो निश्चय उस मनुष्य को गतायु समझना चाहिये ॥७८॥ केशाः सीमन्तिनो यस्य संक्षिप्ते विनते भ्रुवौ । लुठन्ति चाक्षिपक्ष्माणि सोऽचिराद्याति मृत्यवे ।।७९।। जिसके बालों में कङ्घी से सँवारने के समान बीच में सीमन्त (माँग) बन जाय एवं दोनों भौंहें सिकुड़ी तथा झुकी हुई हो जायँ या आँखों के ऊपर वे बप्ल (बरौनी) झड़ जायँ तो वह शीघ्र मृत्यु को प्राप्त करता है ॥७९॥ लुठन्ति=पतन्ति ।।७९।। 'लुठन्ति' का 'गिर जायँ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७९॥ १. 'प्रतिमे'
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७९ नाहरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः। एकाग्रदृष्टिर्मूढात्मा सद्यः प्राणान्विमुञ्चति ।।८०।। उत्थाप्यमानो बहुशः संमोहं योऽधिगच्छति। बलवान्दुर्बलो वापि तं पक्वं भिषगादिशेत् ।।८१।। निद्रा निरन्तरं यस्य यो जागर्त्ति च सर्वदा। मुहोद्वा वक्तुकामश्च प्रत्याख्येयः स जानता ।।८२।। जो रोगी मुख में रखे हुए अन्न को नहीं निगल सके या शिर धारण न कर सके अर्थात् जिसका शिर सीधा करने पर भी लटक जाय या जिसकी दृष्टि एकाग्र अर्थात् एक ही लक्ष्य पर स्थिर हो जाय या जिसका मन भ्रान्त हो गया हो और जो बारंबार उठाने पर भी मोह को प्राप्त हो जाय ऐसा रोगी चाहे बलवान् हो अथवा दुर्बल हो किन्तु उसे वैद्य गण मरने के विषय में पक्व अर्थात् शीघ्र मरने वाला समझें, या जिसे निरन्तर नींद आती हो अथवा जो सदा जागता ही रहता हो या जो कुछ कहने की इच्छा करता हो किन्तु मोह को प्राप्त हो जाय अर्थात् जो कहना चाहे उसे भूल जाय ऐसे रोगी को, जो ज्ञानवान् वैद्य हों, उन्हें चाहिये कि चिकित्सा करने के सम्बन्ध में प्रत्याख्यान (
१८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे फल हैं ? उसका उत्तर यह है कि आयु के रहने पर जो चिकित्सा की जाती है उसका फल वेदना (रोगजनित पीड़ा) का दूर होना है क्योंकि कहा भी है कि—जिस रोगी की आयु दीर्घ है किन्तु चिकित्सा न की जाय तो वह बिना औषध के रोग अनित पीड़ा से युक्त होकर जीवित रह सकता है किन्तु यदि उसका औषध किया जाय तो वह रोगमुक्त होकर जीवित रहता है ॥९॥ ❖ किञ्च आयुषि सत्यपि रोगो चिकित्सां विना उत्थातुं न शक्नोति । यत आह चरकः- सति चायुषि नोपायं विनोत्थातुं क्षमो रुजी। दर्शितश्चात्र दृष्टान्तः पङ्कमग्नो यथा गजः ।।१०।। किञ्च आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोग से मुक्त होकर नहीं उठ सकता क्योंकि इसी विषय में चरक ने कहा भी है कि—आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोगमुक्त होकर नहीं उठ सकता। इस विषय में कीचड़ में फँसे हुये हाथी का दृष्टान्त है अर्थात् जैसे कीचड़ में फँसा हाथी बिना उपाय किये उद्धार नहीं पाता वैसे ही रोगी भी बिना चिकित्सा किये रोग से छुटकारा नहीं पाता है ॥१०॥ ❖ किञ्च चिकित्सां विना आयुष्मानप्यवसीदति यत आह स एव- सति चायुषि नष्टः स्यादादयैश्चाचिकित्सतः । यथा सत्यपि तैलादौ दीपो निर्वाति वात्यया ।।११।। बिना चिकित्सा के आयुष्मान् अर्थात् जिस की आयु अवशिष्ट है ऐसा भी रोगी अवसन्न अर्थात् मर जाता है क्योंकि इसी विषय में उन्हीं चरक ने कहा है कि—आयु रहने पर भी चिकित्सा न करने से रोगों के बढ़ जाने से रोगी नष्ट हो जाता है, जैसे कि—तैलादि के रहने पर भी हवा से दीपक बुझ जाता है ॥११॥ ❖ अत एवोक्तम्- साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्या गच्छन्त्यसाध्यताम् । घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ।। १२ ।। इति ।। अतएव कहा है कि—जिसकी चिकित्सा नहीं होती उस रोगी के क्रमशः साध्य रोग ‘याप्य’ होकर असाध्य हो जाते हैं तथा असाध्य रोग प्राणों को नष्ट कर देते हैं ॥१२॥ ❖ चिकित्सा तु अनिश्चितायुषोऽपि कर्तव्या यत आह- तावत्प्रतिक्रिया कार्या यावच्छ्वसिति मानवः । कदाचिद्देवयोगेन दृष्टारिष्टोऽपि जीवति ।। १३ ।। अनिश्चित आयु वालों की भी चिकित्सा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि कहा भी है कि रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये जब तक वह श्वास लेता रहे क्योंकि कभी कभी दैवयोग से ऐसा रोगी भी जीवित होते देखा गया है जिसके कि सभी अरिष्ट के लक्षण प्रकट हो गये थे। अतः चिकित्सा करना प्रत्येक अवस्था में उचित ही है ॥१३॥ ❖ इति तु यस्यासाध्यत्वं सन्दिग्धं तं प्रत्युक्तम् । येषु तु असाध्यता शास्त्रेण अनुभवेन विनिश्चता ते पुनर्न चिकित्स्याः । यत उक्तम्- सद्वैद्यास्ते न येऽसाध्यानारभन्ते चिकित्सितुम् ।। १४ ।। इति ८६-८७ ।। किन्तु उपर्युक्त वचन उन्हीं रोगियों के सम्बन्ध में समझना चाहिये जिन रोगियों की असाध्यता सन्दिग्धावस्था में हो और जिनकी असाध्यता शास्त्र तथा अनुभव से निश्चितावस्था में प्राप्त हो गई है अर्थात् जो निश्चयपूर्वक असाध्य हो गये १. ‘प्रतीच्छन्ती’ति पाठः ।