भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥६॥
Line 29: तेन कालेन संयुक्तः संहाराय नियुक्तः सोऽवश्यम्भावी । शेषाः शतं मृत्यवः, आगन्तवः=आगन्तु-
Line 30: रूपहेतुजन्मानः कार्यकारणयोरभेदोपचारात् ।
Line 31: इस प्रकार काल संयुक्त जो मृत्यु है वह सम्पूर्ण जगत् के संहार करने के लिये नियुक्त है अत एव वह अवश्य
Line 32: होने वाली मृत्यु कहलाती है। शेष जो १०० प्रकार की मृत्यु हैं ये 'आगन्तुक' कहलाती हैं अर्थात् 'आगन्तुक' रूप कारणों
Line 33 (Footnote): १. 'व्यथाया' इति पा. ।
Everything is accounted for accurately.१७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ वैद्यस्य कर्माह- व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः। एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः ॥५३॥ वैद्य का कर्त्तव्य—रोग का यथार्थरूप से समझना तथा रोगी के कष्ट को दूर करना ये ही वस्तुतः वैद्य के मुख्य कर्म हैं, आयु का प्रभु तो वैद्य नहीं (भगवान् होता) है अर्थात् रोगी के मृत्यु को हटाना वैद्य का कर्म नहीं है ॥५३॥