भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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से उत्पन्न होने वाली होती हैं अत एव 'आगन्तुक' कहलाती हैं। यहाँ 'आगन्तुक' से उत्पन्न होकर भी जो 'आगन्तुक' ही कहलाती है उसका कारण यह है कि कार्य और कारण का दार्शनिकों ने अभेद माना है अतः लाक्षणिक प्रयोग समझना चाहिये ॥ ❖ आगन्तवो हेतवो यथा-विषभक्षणमजीर्णमत्यन्तभोजनं च, दुर्देशजलपानम्, तथाऽतिबलवैरि- व्याघ्रवनमहिषमत्तमातङ्गादिभिर्युद्धम्, दन्दशूकेन क्रीडनम्, अत्युच्चवृक्षाग्रारोहणम्, बाहुभ्यां महातरङ्गिणीतरणम्, एकाकिनो रात्रौ दुर्गे मार्गे गमनमित्यादि ।।५।। आगन्तुक हेतु—विष भक्षण, अजीर्ण और अत्यन्त भोजन, दुष्ट देशों का (जहाँ का पानी लगता हो ऐसे देशों का) जल पीना तथा अत्यन्त बलवान् वैरी, व्याघ्र, जङ्गली भैंसा और मतवाला हाथी आदि के साथ युद्ध करना, विषधर सर्पादिकों के साथ खेल करना, अत्यन्त ऊँचे वृक्षों के अग्र