भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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१७.६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सार्थ युद्ध करना इत्यादि हैं इन सब कारणों से उत्पन्न होनेवाली जो सौ प्रकार की मृत्यु हैं उनसे और वैद्य तथा पुरोहित ये दोनों कैसे सौ प्रकार की मृत्युओं को हटाने में समर्थ हो सकते हैं? इस शङ्का की निवृत्ति करने के लिये कहते हैं- क्योंकि वे दोनों रसमन्त्र विशारद हैं अर्थात् वैद्य रसविशारद है और पुरोहित मन्त्रविशारद है उसमें प्रथम वैद्य दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या में कहे हुए आहार तथा विहार कराने से वात, पित्त, कफ इन धातुओं को तथा मल को समान भाव से रखकर रक्षा करे तदनन्तर वह रसविशारद अर्थात् रस का जानने वाला है अत एव रस जो मृत्युञ्जयादि हैं उनके द्वारा जो निषिद्ध आहार तथा बिहार के करने से दूषित हुए दोषों से उत्पन्न होने वाले मृत्यु के कारण स्वरूप विकार (रोग) हैं उनको दूर करे और मन्त्री अर्थात् पुरोहित सद्बुद्धि (अच्छी सलाह) देने के द्वारा मृत्यु के कारण जो निषिद्ध विहार बलवान् शत्रुओं के साथ लड़ना आदि है उनसे राजा को दूर रखे। इससे आगन्तुक मृत्यु निवारण करने के योग्य ही होती है न कि अवश्यम्भावी (नहीं निवारण करने के योग्य) होती है ॥८।५३॥ अथायुर्विचारमाह- भिषगादौ परीक्षेत रुग्णस्यायुः प्रयत्नतः। तत आयुषि विस्तीर्णे चिकित्सा सफला भवेत् ॥५४॥ रोगी के प्रथम आयु का विचार-वैद्य प्रथम यत्नपूर्वक रोगी के आयु की परीक्षा करे क्योंकि आयु रहने पर ही चिकित्सा सफल होती है ॥५४॥ अथ दीर्घायुषो लक्षणान्याह- सौम्या दृष्टिर्भवेद्यस्य श्रोत्रं वक्त्रं तथैव च। स्वादु गन्धं विजानाति स साध्यो नात्र संशयः ॥५५॥ पाणिपादौ च यस्योष्णौ दाहः स्वल्पतरो भवेत्। जिह्वा तु कोमला यस्य स रोगी न विनश्यति ॥५६॥ स्वेदहीनो ज्वरो यस्य श्वासो नासिकया चरेत्। कण्ठश्च कफहीनः स्यात्स रोगी जीवति ध्रुवम् ॥५७॥ यस्य निद्रा सुखेन स्याच्छरीरं द्युतिमद्भवेत्। इन्द्रियाणि प्रसन्नानि स रोगी नैव नश्यति ॥५८॥ दीर्घायु रोगी के लक्षण-जिस रोगी के आँख, कान तथा मुख सौम्य (विकृति भाव को न प्राप्त) हों तथा जो रस का स्वाद तथा गन्ध की भलाई-बुराई को भली भाँति जानता हो वह रोगी निःसंशय साध्य होता है अर्थात् चिकित्सा करने से निश्चय आरोग्य लाभ करता है। जिस रोगी के हाथ पैर गर्म हों, दाह बहुत थोड़ा होता हो, जिह्वा कोमल हो, स्वेद (पसीना) से रहित ज्वर हो, नासिका से श्वास चलता हो, गले में कफ न हो, सुखपूर्वक निद्रा आती हो, शरीर में कान्ति हो और इन्द्रियाँ प्रसन्न हों वह रोगी नहीं मरता है ॥५५-५८॥ अथ स्वल्पायुषो लक्षणान्याह- शरीरशीलयोर्यस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत्। तदरिष्टं समासेन व्यासतः शृणु निबोध मे ॥५९॥ शृणोति विविधाञ्छब्दान्विपरीताञ्छृणोति च। यो न शृणोति चाकस्मात्तं वदन्ति गतायुषम् ॥६०॥ स्वल्प आयुवाले रोगियों के लक्षण-जिस रोगी के स्वाभाविक शरीर तथा स्वभाव में अन्तर पड़ गया हो, वह उसके लिये अरिष्ट के लक्षण होता है, यह संक्षेप से समझना चाहिये। विस्तृत रूप से अरिष्ट का कारण यह है कि जो रोगी शब्द न होने पर भी अनेक प्रकार के शब्दों को बराबर सुनता हो वा विपरीत शब्दों को सुनता हो अथवा अकस्मात् नहीं सुनने लगता हो उसे गतायु कहते हैं ॥५९-६०॥ यस्तूष्णमिव गृह्णाति शीतमुष्णं च शीतवत्। उष्णागात्रोऽतिमात्रं यो भृशं शीतेन कम्पते ॥६१॥ जो शीतल वस्तु को उष्ण वस्तु की भाँति और उष्ण वस्तु को शीतल वस्तु की भाँति ग्रहण करता हो तथा जिसका शरीर वस्त्रादि के ओढ़ने से गर्म होते हुये भी शीत से अत्यन्त काँपता हो उसे भी गतायु कहते हैं ॥६१॥