भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें❖ तमपि गतायुषं वदन्तीत्यन्वयः ।। ६१ ।। यहाँ 'उसे भी लोग गतायु कहते हैं' 'यह अन्वय ऊपर के ६० श्लोक से लाकर किया जाता है। प्रहारं नैव जानाति योऽङ्गच्छेदमथापि¹ वा। पांशुनेवावकीर्णानि यश्च गात्राणि मन्यते ।। ६२ ।। वर्णान्यता वा राज्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि। स्नातानुलिप्तं यं चापि भजन्ते नीलमाक्षिकाः² ।। ६३ ।। विपरीतेन गृह्णाति रसान्यश्चोपयोजितान्। यो वा रसान्न संवेत्ति³ तं गतासुं प्रचक्षते ।। ६४ ।। जो प्रहार नहीं जानता अर्थात् मारने पर जिसे चोट नहीं मालूम पड़ती या अङ्गों के काटने पर भी जिसे कुछ नहीं मालूम पड़ता और जो अपने अङ्गों को धूलि से भरा हुआ समझता है। एवं जिसके शरीर का वर्णभिन्न प्रकार का या उसमें बहुत सी रेखायें हो जायें और स्नान और चन्दनादि का अनुलेपन कर चुकने पर भी जिसके ऊपर नीली मक्खियाँ आकर बैठने लगें और जो जिस रस का उपयोग करता हो उसे उसके विरुद्ध अर्थात् मधुर को अम्ल और अम्ल को मधुर समझे [L10