भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७९ नाहरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः। एकाग्रदृष्टिर्मूढात्मा सद्यः प्राणान्विमुञ्चति ।।८०।। उत्थाप्यमानो बहुशः संमोहं योऽधिगच्छति। बलवान्दुर्बलो वापि तं पक्वं भिषगादिशेत् ।।८१।। निद्रा निरन्तरं यस्य यो जागर्त्ति च सर्वदा। मुहोद्वा वक्तुकामश्च प्रत्याख्येयः स जानता ।।८२।। जो रोगी मुख में रखे हुए अन्न को नहीं निगल सके या शिर धारण न कर सके अर्थात् जिसका शिर सीधा करने पर भी लटक जाय या जिसकी दृष्टि एकाग्र अर्थात् एक ही लक्ष्य पर स्थिर हो जाय या जिसका मन भ्रान्त हो गया हो और जो बारंबार उठाने पर भी मोह को प्राप्त हो जाय ऐसा रोगी चाहे बलवान् हो अथवा दुर्बल हो किन्तु उसे वैद्य गण मरने के विषय में पक्व अर्थात् शीघ्र मरने वाला समझें, या जिसे निरन्तर नींद आती हो अथवा जो सदा जागता ही रहता हो या जो कुछ कहने की इच्छा करता हो किन्तु मोह को प्राप्त हो जाय अर्थात् जो कहना चाहे उसे भूल जाय ऐसे रोगी को, जो ज्ञानवान् वैद्य हों, उन्हें चाहिये कि चिकित्सा करने के सम्बन्ध में प्रत्याख्यान (