भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे फल हैं ? उसका उत्तर यह है कि आयु के रहने पर जो चिकित्सा की जाती है उसका फल वेदना (रोगजनित पीड़ा) का दूर होना है क्योंकि कहा भी है कि—जिस रोगी की आयु दीर्घ है किन्तु चिकित्सा न की जाय तो वह बिना औषध के रोग अनित पीड़ा से युक्त होकर जीवित रह सकता है किन्तु यदि उसका औषध किया जाय तो वह रोगमुक्त होकर जीवित रहता है ॥९॥ ❖ किञ्च आयुषि सत्यपि रोगो चिकित्सां विना उत्थातुं न शक्नोति । यत आह चरकः- सति चायुषि नोपायं विनोत्थातुं क्षमो रुजी। दर्शितश्चात्र दृष्टान्तः पङ्कमग्नो यथा गजः ।।१०।। किञ्च आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोग से मुक्त होकर नहीं उठ सकता क्योंकि इसी विषय में चरक ने कहा भी है कि—आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोगमुक्त होकर नहीं उठ सकता। इस विषय में कीचड़ में फँसे हुये हाथी का दृष्टान्त है अर्थात् जैसे कीचड़ में फँसा हाथी बिना उपाय किये उद्धार नहीं पाता वैसे ही रोगी भी बिना चिकित्सा किये रोग से छुटकारा नहीं पाता है ॥१०॥ ❖ किञ्च चिकित्सां विना आयुष्मानप्यवसीदति यत आह स एव- सति चायुषि नष्टः स्यादादयैश्चाचिकित्सतः । यथा सत्यपि तैलादौ दीपो निर्वाति वात्यया ।।११।। बिना चिकित्सा के आयुष्मान् अर्थात् जिस की आयु अवशिष्ट है ऐसा भी रोगी अवसन्न अर्थात् मर जाता है क्योंकि इसी विषय में उन्हीं चरक ने कहा है कि—आयु रहने पर भी चिकित्सा न करने से रोगों के बढ़ जाने से रोगी नष्ट हो जाता है, जैसे कि—तैलादि के रहने पर भी हवा से दीपक बुझ जाता है ॥११॥ ❖ अत एवोक्तम्- साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्या गच्छन्त्यसाध्यताम् । घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ।। १२ ।। इति ।। अतएव कहा है कि—जिसकी चिकित्सा नहीं होती उस रोगी के क्रमशः साध्य रोग ‘याप्य’ होकर असाध्य हो जाते हैं तथा असाध्य रोग प्राणों को नष्ट कर देते हैं ॥१२॥ ❖ चिकित्सा तु अनिश्चितायुषोऽपि कर्तव्या यत आह- तावत्प्रतिक्रिया कार्या यावच्छ्वसिति मानवः । कदाचिद्देवयोगेन दृष्टारिष्टोऽपि जीवति ।। १३ ।। अनिश्चित आयु वालों की भी चिकित्सा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि कहा भी है कि रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये जब तक वह श्वास लेता रहे क्योंकि कभी कभी दैवयोग से ऐसा रोगी भी जीवित होते देखा गया है जिसके कि सभी अरिष्ट के लक्षण प्रकट हो गये थे। अतः चिकित्सा करना प्रत्येक अवस्था में उचित ही है ॥१३॥ ❖ इति तु यस्यासाध्यत्वं सन्दिग्धं तं प्रत्युक्तम् । येषु तु असाध्यता शास्त्रेण अनुभवेन विनिश्चता ते पुनर्न चिकित्स्याः । यत उक्तम्- सद्वैद्यास्ते न येऽसाध्यानारभन्ते चिकित्सितुम् ।। १४ ।। इति ८६-८७ ।। किन्तु उपर्युक्त वचन उन्हीं रोगियों के सम्बन्ध में समझना चाहिये जिन रोगियों की असाध्यता सन्दिग्धावस्था में हो और जिनकी असाध्यता शास्त्र तथा अनुभव से निश्चितावस्था में प्राप्त हो गई है अर्थात् जो निश्चयपूर्वक असाध्य हो गये १. ‘प्रतीच्छन्ती’ति पाठः ।