भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८१ हैं ऐसे रोगी तो पुनः चिकित्सा करने के योग्य नहीं ही हैं। क्योंकि कहा भी है कि—जो सद्वैद्य होते हैं वे असाध्य रोगियों की चिकित्सा करना प्रारम्भ ही नहीं करते ॥१४॥८६-८७॥ अथ द्रव्यावश्यकतामाह- सर्वे द्रव्यमपेक्षन्ते रोगिप्रभृतयो यतः। विना वित्तं न भेषज्यं चिकित्साऽङ्गं ततो धनम् ॥८८॥ चिकित्सा में द्रव्य की आवश्यकता—रोगी, रोग आदि जितने हैं सभी द्रव्य (धन) की अपेक्षा करते हैं क्योंकि बिना द्रव्य के औषधि तैयार हो नहीं सकती। अतः द्रव्य भी चिकित्सा का अङ्ग माना गया है ॥८८॥ अथ परिचारकस्य लक्षणमाह- स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान्युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तो युज्यते परिचारकः ॥८९॥ रोगी की परिचर्या करनेवाले (परिचारक) का लक्षण—रोगियों की परिचर्या करने के लिये वही परिचारक योग्य होता है, जो स्नेहयुक्त अर्थात् रोगी के ऊपर प्रसन्न रहने वाला तथा उसकी निन्दा नहीं करनेवाला, बलवान्, रोगी की रक्षा करने में तत्पर रहनेवाला, वैद्य के कथनानुसार कार्य करनेवाला और परिचर्या करने में नहीं थकने वाला हो ॥८९॥ ❖ स्निग्धः=प्रीतः, अजुगुप्सुः=अनिन्दकः ॥८९॥ यहाँ 'स्निग्ध' पद से 'रोगी के ऊपर प्रसन्न करने वाला' तथा 'अजुगुप्सु' पद से 'रोगी की निन्दा नहीं करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ॥८९॥ अथ भेषजस्य लक्षणमाह- वैद्यो व्याधिं हरेद्येन तद्द्रव्यं प्रोक्तमौषधम्। तद्यादृशमवश्यं स्याद्रोगघ्नं तादृशं ब्रुवे ॥९०॥ औषध के लक्षण—वैद्य जिस द्रव्य से व्याधि दूर करता है उसी को औषध कहते हैं। वह (औषध) जैसा होने से रोग को अवश्य दूर करने वाला होता है वैसा आगे कहते हैं ॥९०॥ अथौषधग्रहणपरिभाषामाह- प्रशस्तदेशे सञ्जातं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्। अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥९१॥ दोषघ्नमग्लानिकरमधिकं न विकारि यत्। समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं स्याद् गुणावहम् ॥९२॥ औषध ग्रहण करने की परिभाषा—जो ओषधि अच्छे देश (स्थान) में उत्पन्न और अच्छे दिन में उखाड़ी हुई हो और जो थोड़ी मात्रा में देने से भी फल देने वाली हो और बहुत गुण से युक्त हो, एवं जो स्वाभाविक-गन्ध, वर्ण और रस से युक्त हो तथा जो दोषों को दूर करने वाली, ग्लानि नहीं उत्पन्न करनेवाली और अधिक मात्रा हो जाने पर भी कोई विकार नहीं उत्पन्न करने वाली हो वही ओषधि यदि विचार करके समय उपस्थित होने पर दी जाय तो गुणकारक होती है ॥९१-९२॥ आग्नेया विन्ध्यशैलाद्याः सौम्यो हिमगिरिः स्मृतः। अतस्तदौषधानि स्युरनुरूपाणि हेतुभिः ॥९३॥ विन्ध्याचल आदि पर्वत 'आग्नेय' हैं और हिमालय पर्वत 'सौम्य' है। अतएव विन्ध्याचलादि पर्वतों पर उत्पन्न हुई ओषधियाँ भी अपने उत्पन्न होने के हेतुओं के अनुरूप ही आग्नेयादि गुण विशिष्ट होती हैं ॥९३॥ ❖ आग्नेयाः=अधिकाग्न्यंशाः, सौम्यः=अधिकसोमांशः। ओषधय एवौषधानि। अत्र स्वार्थे अण्। अनुरूपाणि=सदृशानि ॥९३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA