भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

१८२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे इसका भाव यह है—विन्ध्यादि पर्वतों में अग्नि के अंश अधिक होने से वे 'आग्नेय' हैं और हिमालय में (सोमचन्द्रमा) का अधिक अंश होने से वह 'सौम्य' है। अतएव पूर्वोक्त इन स्थानों में उत्पन्न हुए औषध अपने उत्पन्न होने के हेतुओं के अनुरूप आग्नेयादि होते हैं अर्थात् आग्नेय संज्ञक विन्ध्याचल में उत्पन्न हुई ओषधियाँ 'आग्नेय' अर्थात् अधिक उष्णता से युक्त तथा सौम्यसंज्ञक हिमालय में उत्पन्न हुई ओषधियाँ 'सौम्य' अधिक शीतलता से युक्त होती हैं। यहाँ पर यह और समझना चाहिये कि ओषधियाँ ही औषध कहलाती हैं। क्योंकि-ओषधि शब्द से स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने से 'यस्येति च' इस सूत्र से ओषधि के इकार का लोप होने से णित्वमान कर ओषधि के ओकार की आदि वृद्धि होने से औषध शब्द की सिद्धि होती है ॥९३॥ अन्येष्वपि प्ररोहन्ति वनेषूपवनेषु च। गृह्णीयात्तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे ।।९४।। आदित्यसम्मुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि। साधारणधराद्रव्यं गृह्णीयादुत्तराश्रितम् ।।९५।। इसके अतिरिक्त अन्य स्थान वन और उपवनों में भी ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और पूर्वोक्त स्थानों में उत्पन्न होने वाली उन ओषधियों को प्रसन्न चित्त तथा पवित्र होकर शुभ दिनों में प्रातःकाल सूर्य की ओर मुख किये हुये मौन होकर तथा ध्यान द्वारा, हृदय स्थित शिवजी को नमस्कार कर ग्रहण करना चाहिये और साधारण पृथ्वी में उत्पन्न हुई ओषधियों को तो जहाँ पर स्वयं खड़ा हो वहाँ से उत्तर दिशा में उगी हुई हों उन्हीं को ग्रहण करना चाहिये ।।९४-९५।। ❖ साधारणधराद्रव्यं=सर्वभूमिभवं द्रव्यम्। उत्तराश्रितं=स्वस्मादुत्तरदिग्भवम् ।। यहाँ 'साधारणधराद्रव्यम्' पद का 'साधारण पृथ्वी में उत्पन्न हुई ओषधियों को' और 'उत्तराश्रितम्' पद का 'जहाँ पर स्वयं खड़ा हो वहाँ से जो उत्तर दिशा में उगी हुई हों उन्हीं को' यह अर्थ समझना चाहिये ।।९४-९५।। वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः । जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसाधिकाः ।।९६।। जो ओषधियाँ वल्मीक (विमौट), अशुद्ध स्थान, अनूप (प्रायः करके जल से युक्त) देश, श्मशान, ऊसर भूमि और मार्ग इन स्थानों में उत्पन्न हुई हों तथा जो जीवों से भुक्त या अग्नि अथवा बर्फ से झुलस गई हों ऐसी ओषधियाँ कार्य सिद्ध करने वाली नहीं होतीं अर्थात् इनसे रोग दूर नहीं होता है ।।९६।। शरद्यखिलकार्यार्थ ग्राह्यं सरसमौषधम् । विरेकवमनार्थं तु वसन्तान्ते समाहरेत् ।।९७।। प्रत्येक कार्यों के लिये रस युक्त ओषधियों का शरद ऋतु में और वमन तथा विरेचन के लिये वसन्त ऋतु के मध्य में ओषधियों का संग्रह करना चाहिये ।।९७।। ❖ वसन्तान्ते=वसन्तमध्ये। समाहरेत्=संगृह्णीयात् ।।९७।। यहाँ 'वसन्तमध्ये' का 'वसन्त ऋतु के मध्य में' तथा 'समाहरेत्' का 'संग्रह करना चाहिये' यह अर्थ समझना चाहिये ।।९७।। अतिस्थूलजटा याः स्युस्तासां ग्राह्यास्त्वचोध्रुवम् । गृह्णीयात्सूक्ष्ममूलानिसकलान्यपि बुद्धिमान् ।। बुद्धिमान् व्यक्ति जिन ओषधियों के मूल भाग अत्यन्त स्थूल हों निश्चय ही उनके छिल्कों का और जिनके मूल भाग सूक्ष्म (पतले) हों उनके सभी अङ्गों को ग्रहण करें ।।९८।। अन्यञ्च- महान्ति येषां मूलानि काष्ठगर्भाणि सर्वतः । तेषां तु वल्कलं ग्राह्यं ह्रस्वमूलानि सर्वशः ।।९९।। न्यग्रोधादेस्त्वचो ग्राह्याः सारः स्याद्वीजकादितः । ताली सादेश्च पत्राणि फलं स्यात् त्रिफलादितः ।।१००।।