भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८३ क्वचिन्मूलं क्वचित्कन्दः क्वचित्पत्रं क्वचित्फलम् । क्वचित्पुष्पं क्वचित्सर्वं क्वचित्सारः क्वचित्त्वचः ।।१०१।। चित्रकं सूरणं निम्बो वासा च त्रिफला क्रमात् । धातकी कण्टकारी च खदिरः क्षीरपादपः ।।१०२।। क्वचिन्निम्बस्य गृह्णीयात्पत्राभावे त्वचामपि । बालं फलं तु बिल्वस्य पक्वमारग्वधस्य च ।।१०३।। अङ्गेऽनुक्ते जटा ग्राह्या भागेऽनुक्तेऽखिलं समम् । पात्रेऽनुक्ते मृदुः पात्रं कालेऽनुक्ते त्वहर्मुखम् ।।१०४।। और भी कहा है कि—जिन ओषधियों के मूल भाग बड़े (स्थूल) हों और उनके अन्दर लकड़ी हो तो उनके छिल्कों को और जिनके मूलभाग छोटे (पतले) हों उनके सभी भागों को ग्रहण करे तथा बड़ा आदि वृक्षों की छाल और विजयसार आदि वृक्षों का सार (भीतर की लकड़ी) तथा तालीसपत्रादि के पत्र एवं त्रिफला आदि के फल लेने चाहिये । इस प्रकार और भी किसी ओषधियों का मूल, किसी का कन्द, किसी का पत्र, किसी का फल, किसी का पुष्प, किसी का सभी भाग, किसी का सारभाग और किसी का छिल्का ही ग्रहण किया जाता है । जैसे—चित्त का मूल, सूरन का कन्द, नीम और अडूसे की पत्ती, त्रिफला (आँवरा, हर्रा और बहेड़ा) का फल, धाय का फूल, कटेरी (भटकटैया) का सर्वाङ्ग, खैर का सारभाग (ककड़ी) और दूध वाले वृक्षों की छाल ही ली जाती है । नीम का पत्र यदि समय पर न मिले तो उसका छिल्का ही लेवे और बेल का कच्चा फल तथा अमलतास का पक्का फल लेवे । जहाँ पर जिस ओषधि के किसी विशेष भाग का उल्लेख न हो वहाँ उसका मूल भाग ही लेना चाहिये और जहाँ ओषधियों का परिमाण (तौल) नहीं लिखा हो वहाँ उन सबों को समभाग में लेना चाहिये । जहाँ कोई विशेष पात्र (बर्तन) का उल्लेख न हो वहाँ मिट्टी का पात्र लेना चाहिये और जहाँ किसी विशेष काल का निर्देश न किया गया हो वहाँ प्रातःकाल का ही ग्रहण करना चाहिये ।।९९-१०४।। नवान्येव हि योज्यानि द्रव्याण्यखिलकर्मसु । विना विडङ्गकृष्णाभ्यां गुडधान्याज्यमाक्षिकैः ।।१०५।। सभी कार्यों में नवीन ही ओषधियाँ लेनी चाहिये किन्तु वायविडङ्ग, पीपर, गुड़, धान्य, घृत और शहद को पुराना ही लेना चाहिये ।।१०५।। ❖ धान्यमन्नम् ।।१०५।। यहाँ 'धान्य' पद से 'अन्न अर्थात् चावल' का ग्रहण करना चाहिये ।।१०५।। पुराणं तु प्रशस्तं स्यात्ताम्बूलं काञ्जिकं तथा । शुष्कं नवीनद्रव्यं तु योज्यं सकलकर्मसु ।।१०६।। आर्द्रांन्तु द्विगुणं युञ्ज्यादेष सर्वत्र निश्चयः । गुडूची कुटजो वासा कूष्माण्डश्च शतावरी ।।१०७।। अश्वगन्धा सहचरः शतपुष्पा प्रसारिणी । प्रयोक्तव्याः सदैवार्द्राद्विगुणं नैव कारयेत् ।।१०८।। ताम्बूल (पान) और कांजी पुराना ही अच्छा होता है। सभी कार्यों में नवीन द्रव्य सुखाकर लेना चाहिये । जो गीली ओषधियाँ हैं उन्हें अन्य ओषधियों की अपेक्षा निश्चयपूर्वक सर्वत्र दूनी ही लेनी चाहिये । किन्तु गुरुच, कुड़ा (कोरैया), अडूसा, कूष्माण्ड (पेठा), सतावर, अश्वगन्धा, कटसरैया, सौंफ और प्रसारिणी (गन्धप्रसारणी या पसरन) ये सभी ओषधियाँ यद्यपि सदा गीली ही लेने का विधान है तथापि दूनी नहीं लेनी चाहिये अर्थात् और ओषधियों के बराबर ही लेनी चाहिये ।।१०६-१०८।। ❖ सहचरः=कुरण्टकः, 'कटसरैया' इति लोके ।।१०६-१०८।। यहाँ 'सहचर' से 'कुरण्टक अर्थात् लोक में प्रसिद्ध कटसरैया' का ही ग्रहण करना चाहिये ।। अन्यञ्च वासानिम्बपटोलकेतकबलाकूष्माण्डकेन्दीवरीवर्षभूकुटजाश्च कन्दसहिता सा पूतिगन्धाऽमृता । ऐन्द्री नागबला कुरुण्टकपुरच्छत्राऽमृताः सर्वदा सार्द्रा एव तु न क्वचिद् द्विगुणिताः कार्येषु योज्या बुधैः१ ।।१०९।। १. 'वासा निम्बपटोलकेतकबलाकूष्माण्डकेन्दीवरी-वर्षभूकुटजाश्वगन्धसहितास्ताः पूतिगन्धाऽमृता। मांसी नागबला कुरण्टकपुरौ हिङ्ग्वाद्रैकक्षैक्षवम् गृह्णीयात् सरमान्यमूनि न पुनः कुर्याद् द्विभागानि चे'ति पाठन्तरम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA