भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे इसी सम्बन्ध में अन्य वचन—अडूसा, नीम, परवल, केवड़ा, बला (खिरेटी या वरियारा), पेठा, सतावर, वर्षाभू (पुनर्नवा), कुड़ा, कन्द (कमल का कन्द आदि), गन्धप्रसारणी, गिलोय, इन्द्रवारुणी (इन्द्रायन), गुलशकरी, कटसरैया, सौंफ और दूर्वा ये सब ओषधियाँ वैद्यों को सभी कार्यों में सदा गीली ही लेनी चाहिये तथा गीली होने से कभी दूनी मात्रा में नहीं किन्तु समभाग में ही लेनी चाहिये ।।१०९।। ❖ १'इन्दीवरी=शतावरी। पूतिगन्धा=गन्धप्रसारणी। ऐन्द्री=इन्द्रवारुणी। नागबला=गुलशकरी। कुरण्टकः=पीतपुष्पः (कटसरैया)। पुरो=गुग्गुलः ।।१०९।। यहाँ 'इन्दीवरी' से 'सतावर', 'पूतिगन्धा' से 'गन्धप्रसारणी', 'ऐन्द्री' से इन्द्रवारुणी (इन्द्रायन), 'नागबला' से 'गुलशकरी' 'कुरण्टक' से 'पीले फूल वाली 'कटसरैया' और 'पुर' से 'गुग्गुलु' का ग्रहण करना चाहिये ।।१०९।। घृतं तैलं च पानीयं कषायं व्यञ्जनादिकम्। पक्त्वा शीतीकृतं चोष्णं तत्सर्वं स्याद्विषोपमम् ।।११०।। घी, तैल, जल, क्वाथ (काढ़ा) और व्यञ्जन (भोज्यपदार्थ शाक) आदि ये सब द्रव्य अग्नि पर रखने से परिपक्व होकर शीतल होने पर पुनः आग पर रख कर यदि गरम किये जायँ तो विष की भाँति विकार युक्त हो जाते हैं अतः पुनः गरम नहीं करना चाहिये ।।११०।। अथ द्रव्याणां परीक्षामाह- सूक्ष्मास्थिर्मांसला पथ्या सर्वकर्माणि पूजिता। क्षिप्ताऽम्भसि निमज्जेद्या भल्लातक्यस्तथोत्तमाः ।।१११।। वराहमूर्द्धवत्कन्दो वाराहीकन्दसंज्ञकः। सौवर्चलं तु काचाभं सैन्धवं स्फटिक प्रभम् ।।११२।। सुवर्णच्छविकं ज्ञेयं स्वर्णमाक्षिकमुत्तमम्। २ओड्रपुष्पप्रतीकाशा मनोह्वा चोत्तमामृता ।।११३।। श्रेष्ठं शिलाजतु ज्ञेयं प्रक्षिप्तं न विशीर्यते। तोयपूर्णे कांस्यपात्रे प्रतानेन विवर्धते ।।११४।। कर्पूरस्तुवरः स्निग्ध एला सूक्ष्मफला वरा। श्वेतचन्दनमत्यन्तं सुगन्धि गुरुपूजितम् ।।११५।। रक्तचन्दनमत्यन्तं लोहितं प्रवरं मतम्। काकतुण्डनिभः स्निग्धो गुरुः श्रेष्ठो गुरुर्मतः ।।११६।। सुगन्धि लघु रूक्षं च सुरदारु वरं मतम्। सरलं स्निग्धमत्यर्थं सुगन्धि च गुणावहम् ।।११७।। अतिपीता प्रशस्ता तु ज्ञेया दारुनिशा बुधैः। जातीफलं गुरु स्निग्धं समं शुभ्रान्तरं वरम् ।।११८।। ओषधियों की परीक्षा—जिस हरड़ में गुठली छोटी और गूदे अधिक हों तथा जो जल में डालने पर डूब जाय वह भी सभी कार्यों में लेने के लिये उत्तम होता है इसी प्रकार पतली गुठली से युक्त अधिक गूदे वाला एवं जल में डालने पर डूब जाने वाला भिलावा भी अच्छा होता है। जो वाराहीकन्द सूअर के शिर के आकार का होता है वह उत्तम है। साँभरनोन काँच के सदृश होने से उत्तम होता है। सेंधानमक स्फटिक के समान होने से उत्तम है। सोना मक्खी सोने के समान कान्ति वाली होने से उत्तम होती है। मैनशिल जवाकुसुम के समान वर्ण वाला होने से उत्तम होता है। शिलाजीत वही उत्तम कहलाता है जो जल से पूर्ण काँसे के पात्र में डालने से गल न जाय किन्तु उससे सूत के सदृश निकल कर चारो ओर बढ़े। कपूर कसैला तथा स्निग्ध होने से उत्तम होता है। सफेद चन्दन अत्यन्त सुगन्धित तथा गुरु (भारी) होने से उत्तम होता है। लालचन्दन अत्यन्त लाल होने से उत्तम होता है। अगर आकार में कौवे की चोंच के समान, स्निग्ध तथा गुरु (भारी) होने से उत्तम होता है। देवदारु सुगन्ध युक्त, हल्का और रूखा होने से उत्तम होता है। सरल (चीर की लकड़ी) अत्यन्त स्निग्ध और सुगन्ध युक्त होने से गुणकारी होता है। दारुहल्दी अत्यन्त पीली होने से उत्तम समझी जाती है। जायफल गुरु (भारी), स्निग्ध, सम आकार वाली और भीतर से सफेद होने से उत्तम होता है ।।१११-११८।। १. 'इन्दी' इति पाठः क्वचिन्नोपलभ्यते। २. 'इन्द्रे'ति पाठः।