भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 236

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८५ मृद्वीका सोत्तमा ज्ञेया या स्याद्गोस्तनसन्निभा । करमर्दफलाकारा मध्यमा सा प्रकीर्तिता ।।११८।। जो दाख आकार में गौ के स्तन के समान हो वह उत्तम और जो आकार में करौंदे के समान हो उसे गुण में मध्यम समझना चाहिये ।।११९।। ❖ गोस्तनसन्निभा 'मुनक्का' इति लोके । करमर्दफलाकारा 'करम्बा' इति लोके ।।११९।। जो दाख आकार में गौ के स्तन के समान होता है, उसे लोक 'मुनक्का' कहते हैं और जो आकार में करौंदे के फल के समान होती है, उसे लोक 'करम्बा' (किसमिस) कहते हैं ।।११९।। खण्डं तु विमलं श्रेष्ठं चन्द्रकान्तसमप्रभम् । गव्याज्यसदृशं रुच्यं गन्धं मधुवरं मतम् ।।१२०।। जो खांड निर्मल तथा चन्द्रकान्त मणि के समान सफेद पीलाई लिये हुये हो वह उत्तम होती है। जो मधु (शहद) रङ्ग में गाय के घी के समान, रुचिकारक और सुगन्धित हो वह उत्तम समझा जाता है ।।१२०।। अथ स्वभावतो हितानि द्रव्याण्याह- शालीनां लोहितः शालिः षष्टिकेषु च षष्टिकः । शूकधान्येष्वपि यवो गोधूमः प्रवरो मतः ।।१२१।। शिम्बीधान्ये वरो मुद्गो मसूरश्चाढकी तथा । रसेषु मधुरः श्रेष्ठो लवणेषु च सैन्धवः ।।१२२।। स्वभावतः हितकारक द्रव्य—शाली धानों में लाल शाली धान्य, षष्टिक (६० दिन में पकनेवाले) धान्यों में षष्टिक (साठी) धान्य, शूक (टूँडीदार) धान्यों में यव (जौ) तथा गेहूँ उत्तम होता है। शिम्बो (फलीवाले) धान्यों में मूँग, मसूर तथा अरहर उत्तम होता है। छः प्रकार के रसों में मधुर रस उत्तम होता है। और नमक में सेंधानमक उत्तम होता है ।।१२१-१२२।। दाडिमामलकं द्राक्षा खर्जूरं च परूषकम् । राजादनं मातुलुंगं फलवर्गेषु शस्यते ।।१२३।। फलों के वर्गों में—अनार, आँवला, दाख (अंगूर), खर्जूर (छुहारा), फालसा, खिरनी और बिजौरा निम्बू ये सब उत्तम होते हैं ।।१२३।। ❖ परूषकं 'फालसा' इति लोके । राजादनं 'खिरणी' इति लोके । मातुलुंगं 'बिजउरा' इति लोके ।।१२३।। यहाँ 'परूषक' से लोक में प्रसिद्ध 'फालसा' और 'राजादन' से लोकप्रसिद्ध 'खिरनी' तथा 'मातुलुङ्ग' से लोक में प्रसिद्ध 'बिजउरा नींबू' समझना चाहिये ।।१२३।। पत्रशाकेषु वास्तूकं जीवन्ती पोतिका वरा । पटोलं फलशाकेषु कन्दशाकेषु सूरणम् ।।१२४।। एणः कुरङ्गो हरिणो जाङ्गलेषु प्रशस्यते । पक्षिणां तित्तिरिलावो वरो मत्स्येषु रोहितः ।।१२५।। हरिणस्ताम्रवर्णः स्यादेणः कृष्णतया मतः । कुरङ्गस्ताम्र उद्दिष्टो हरिणाकृति को महान् ।।१२६।। जलेषु दिव्यं दुग्धेषु गव्यमाज्येषु गोभवम् । तैलेषु तिलजं तैलमैक्षवेषु सिता हिता ।।१२७।। पत्ते के शाकों में बथुआ, जीवन्ती और पोई ये सब उत्तम होते हैं। फल के शाकों में 'परवल' और कन्द के शाकों में 'सूरन' उत्तम होता है। जङ्गली जीवों के मांसों में एण, कुरङ्ग तथा हरिण का मांस उत्तम होता है। पक्षियों में तीतर तथा लवा का मांस उत्तम होता है। मछलियों में 'रोहू मछली' का मांस उत्तम होता है। एण, कुरङ्ग तथा हरिण का परस्पर भेद यह है कि—हरिण तांबे के समान वर्ण वाला होता है तथा एण कृष्ण वर्ण का होता है एवं कुरङ्ग भी यद्यपि हरिण के समान ताम्रवर्ण का ही होता है तथापि उसकी अपेक्षा बड़ा होता है। जलों में आकाश का जल, दूधों में गाय का दूध, घृतों में गाय का घी, तेलों में तिल का तेल, ईख से बने हुये गुड़ादि में शक्कर ये सब उत्तम (हितकर) होते हैं ।।१२४-१२७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA