भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे

अथ स्वभावादहितानि द्रव्याण्याह- शिम्बीषु माषान्ग्रीष्मर्त्तौ लवणेष्बौषरं त्यजेत् । फलेषु लकुचं शाके सार्षपं न हितं मतम् ।।१२८।। स्वभावतः अहितकर द्रव्य—शिम्बीधान्यों में उरद और नमक में खारी (ऊसर पृथ्वी से उत्पन्न हुआ) नमक का ग्रीष्म ऋतु में सेवन करना छोड़ देना चाहिये, क्योंकि अहितकर होते हैं। फलों में बड़हर और शाकों में सरसों का शाक हितकर नहीं होता है ॥१२८॥ गोमांसं ग्राम्यमांसेषु न हितं महिषीवसा । मेषीपयः कुसुम्भस्य तैलं त्याज्यं च फाणितम् ।।१२९।। गाँव के जीवों के मांसों में गोमांस और वसा (चर्बी) में भैंस की वसा, दूधों में भेड़ी का दूध, तेलों में कुसुम का तेल और ईख के बने हुये पदार्थों में फाणित (राव) त्यागने के योग्य (अहितकर) होता है ।।१२९॥ ❖ इक्षुरसः परिपक्वो योऽर्धघनः फाणितम् । तद्वि 'छोयाराव' इति लोके ।।१२९।। यहाँ 'फाणित' से यह समझना चाहिये कि जो ईख का रस पकाकर आधा पतला आधा गाढ़ा के हालत में रहता है, जिसे लोक में 'छोया राब (राब)' कहते हैं ॥१२९॥

अथ संयोगविरुद्धानि द्रव्याण्याह- मत्स्यमानूपमांसं च दुग्धयुक्तं विवर्जयेत् । कपोतं सर्षपस्नेहभर्जितं परिवर्जयेत् ।।१३०।। मत्स्यानिक्षोर्विकारेण तथा क्षौद्रेण वर्जयेत् । सक्तून्मांसपयोयुक्तानुष्णोदधि विवर्जयेत् ।।१३१।। उष्णैर्नभोऽम्बुना क्षौद्रं पायसं कृसरान्वितम् । रम्भाफलं त्यजेत्तक्रदधिबिल्वफलान्वितम् ।।१३२।। दशाहामुषितं सर्पिः कांस्ये मधुघृतं समम् । कृतान्नं च कषायं च पुनरुष्णीकृतं त्यजेत् ।।१३३।। एकत्र बहुमांसानि विरुध्यन्ते परस्परम् । मधु सर्पिर्वसा तैलं पानीयं वा पयस्तथा ।।१३४।। संयोग होने से विरुद्ध गुणकारी द्रव्य—दूध के साथ मछली या अनूप देश के जीवों का मांस, सरसों के तेल में भुना हुआ कबूतर का मांस भोजन नहीं करना चाहिये एवं मछलियों को ईख के बने हुये गुड़ या शहद के साथ नहीं खाना चाहिये। इसी प्रकार मांस और दूध मिलाकर सत्तू, उष्ण द्रव्यों के साथ दही, द्रव्य तथा वर्षा के जल के साथ शहद, खिचड़ी के साथ शहद, खिचड़ी के साथ खीर और मट्ठा, दही या बेल का फल, इनमें से किसी के भी साथ केले का फल नहीं खाना चाहिये। दश दिन तक कांसे के पात्र में रखा हुआ घी या समभाग में मिला हुआ शहद तथा घृत ये दोनों संयोग विरुद्ध होने से त्याज्य है। पकाया हुआ अन्न या पकाया हुआ काढ़ा शीतल होने पर पुनः यदि उष्ण किया गया हो तो ये दोनों भी त्याज्य हैं। अनेक प्रकार के मांस एकत्र पकाने से परस्पर विरुद्ध हो जाते हैं तथा शहद, घी, चर्बी, तेल, जल और दूध भी एकत्र पकाने से परस्पर विरुद्ध हो जाते हैं अतः ये सब भोजन के लिये सदा त्याज्य हैं ॥१३०-१३४॥

अथ भेषजग्रहणसङ्केतमाह- लवणं सैन्धवं प्रोक्तं चन्दनं रक्तचन्दनम् । चूर्णलेहासवस्नेहः साध्या धवलचन्दनैः ।। कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम् ।।१३५।। अन्तः सम्मार्जने ज्ञेया ह्यजमोदा यवानिका । बहिः सम्मार्जने सैव विज्ञातव्याऽजमोदिका ।।१३६।। पथ्यः सर्पिः प्रयोगेषु गव्यमेव हि गृह्यते । शकृद्रसो मोमयको मूत्रं गोमूत्रमुच्यते ।।१३७।। ओषधियों के लेने का सङ्केत—केवल 'लवण' कहने से सेंधा नमक' और 'चन्दन' कहने से लाल चन्दन का सर्वत्र ग्रहण करना चाहिये। चूर्ण, अवलेह, आसव तथा तैल बनाने में 'सफेद चन्दन' ही लेना चाहिये। प्रायः करके काढ़ा

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